हलमा – अपनी समस्या अपना समाधान ; भील समुदाय की परंपरा
० श्याम कुमार कोलारे ०
"जब गांव का कोई व्यक्ति किसी संकट में फंस जाता है और अपनी पूरी कोशिश के बावजूद उससे बाहर नहीं निकल पाता, जैसे किसी की फसल कटाई के लिए तैयार है लेकिन मज़दूरों को मेहनताना देने के लिए पैसे नहीं हैं, किसी को घर या कुआँ बनवाना है, खेत तैयार करना है- तो वह हलमा का आह्वान करता है।"
जहाँ चाह, वहाँ राह! इसी कहावत को पूर्णतः चरितार्थ करती हुई गौरवपूर्ण एवं सम्मानजनक परंपरा के बारे में बताने जा रहा हूँ, जिसे जानकर मन सम्मान और उत्साह से भर उठेगा। यह मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल्य क्षेत्र झाबुआ जिला की एक विशेष परंपरा या यू कहें तो झाबुआ के भील समुदाय की पूर्वजों से चली आ रही परंपरा की एक सजीव कहानी है जिससे सुनने के बाद सम्मान देने व अनुकरण करने का मन करने लगेगा। भारत अपनी विविधता और लोक संस्कृति के लिए मशहूर रहा है।
"जब गांव का कोई व्यक्ति किसी संकट में फंस जाता है और अपनी पूरी कोशिश के बावजूद उससे बाहर नहीं निकल पाता, जैसे किसी की फसल कटाई के लिए तैयार है लेकिन मज़दूरों को मेहनताना देने के लिए पैसे नहीं हैं, किसी को घर या कुआँ बनवाना है, खेत तैयार करना है- तो वह हलमा का आह्वान करता है।"
जहाँ चाह, वहाँ राह! इसी कहावत को पूर्णतः चरितार्थ करती हुई गौरवपूर्ण एवं सम्मानजनक परंपरा के बारे में बताने जा रहा हूँ, जिसे जानकर मन सम्मान और उत्साह से भर उठेगा। यह मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल्य क्षेत्र झाबुआ जिला की एक विशेष परंपरा या यू कहें तो झाबुआ के भील समुदाय की पूर्वजों से चली आ रही परंपरा की एक सजीव कहानी है जिससे सुनने के बाद सम्मान देने व अनुकरण करने का मन करने लगेगा। भारत अपनी विविधता और लोक संस्कृति के लिए मशहूर रहा है।
हर जनजाति की अपनी खास पहचान होती है, जैसे उनकी भाषा, पोशाक, रहन-सहन, लोक नृत्य, कला और परंपराएं। ये सब उनकी सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा हैं और यही गुण उनको सभी से अलग पहचान दिलाती हैं। इसी कड़ी में मध्यप्रदेश के भील समुदाय, जो अपनी ‘हलमा’ परंपरा के लिए जाना जाता है- के बारे में जानेंगे। हलमा एक खास किस्म का लोक सांस्कृतिक है, जो झाबुआ के कई हिस्सों में प्रचलित है। यह विशेष रूप से आदिवासी इलाकों में सामूहिक एकता और सहयोग को बढ़ावा देने के लिए मनाया जाता है।
हलमा भील समाज की एक ‘मदद करने की परंपरा’ है। जब कोई व्यक्ति या परिवार किसी संकट में फँस जाता है और खुद उससे नहीं निकल पाता, तो पूरे गांव के लोग उसकी मदद के लिए एकजुट हो जाते हैं। जब गांव का कोई व्यक्ति किसी संकट में फंस जाता है और अपनी पूरी कोशिश के बावजूद उससे बाहर नहीं निकल पाता, जैसे किसी की फसल कटाई के लिए तैयार है लेकिन मज़दूरों को मेहनताना देने के लिए पैसे नहीं हैं, किसी को घर या कुआँ बनवाना है, खेत तैयार करना है- तो वह हलमा का आह्वान करता है।
आज हलमा जल और पर्यावरण संरक्षण का एक बहुत बड़ा मिशन बन गया है। हलमा से मध्यप्रदेश के झाबुआ जिला के गांवों को पानी की कमी के कारण पलायन करने से बचाया गया है। हलमा उन लोगों के लिए एक संदेश है, जो सामाजिक एकता, भाईचारे और अपनी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं। लेकिन हलमा हमें सिखाता है कि हमें मिलकर रहना चाहिए, साथ चलना चाहिए और अपनी संस्कृति व परंपराओं को सहेजना चाहिए।
आज हलमा जल और पर्यावरण संरक्षण का एक बहुत बड़ा मिशन बन गया है। हलमा से मध्यप्रदेश के झाबुआ जिला के गांवों को पानी की कमी के कारण पलायन करने से बचाया गया है। हलमा उन लोगों के लिए एक संदेश है, जो सामाजिक एकता, भाईचारे और अपनी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं। लेकिन हलमा हमें सिखाता है कि हमें मिलकर रहना चाहिए, साथ चलना चाहिए और अपनी संस्कृति व परंपराओं को सहेजना चाहिए।
भील जनजाति के लोग आज भी इस परंपरा को निभा रहे हैं और आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। हलमा भील समुदाय की एक प्राचीन परंपरा है इसका शाब्दिक अर्थ ‘साथ चलना’, ‘साथ काम करना’ या ‘मदद के लिए पुकारना’ होता है। इसका मुख्य उद्देश्य सामूहिक एवं सामुदायिक प्रयास या श्रम को सम्मान और आपसी एकता को बढ़ावा देना है। हलमा, भील समुदाय की एक अनूठी मदद करने की परंपरा है। गांव के लोग सामाजिक दायित्व निभाते हुए मदद के लिए आगे आते हैं।
हलमा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें सभी लोग निस्वार्थ भाव से श्रमदान करते हैं। इसमें आदिवासी समुदाय के लोग और किसान शामिल होते हैं, और उनके सामूहिक प्रयास से यह परंपरा आगे बढ़ती जा रही है। यह आदिवासी समाज में कृषि के कामों और सामाजिक ज़िम्मेदारियों को साझा करने का एक माध्यम भी है। भील समुदाय के लोग बताते है कि हलमा उनके पूर्वजों से चला आ रहा है। जरूरत पड़ने पर गांव के लोग एकजुट होकर जरूरतमंद की बड़े स्तर पर मदद करते हैं।
झाबुआ एक आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है और उसके आस-पास के गांवों में ज़्यादातर छोटे किसान रहते हैं, यहाँ खेती ही आजीविका का मुख्य साधन है। यह क्षेत्र गर्मियों में पानी की भारी किल्लत से जूझता था, जिससे खेती करना संभव नहीं हो पाती थी। पीने के पानी भी मुश्किल से जुटा पाते थे । इस प्रकार पानी की कमी के कारण गांवों में कई मुश्किलें खड़ी हो जाती थीं। इसी समस्या के समाधान के लिए हलमा को जल संरक्षण के लिए अपनाया गया।
झाबुआ एक आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है और उसके आस-पास के गांवों में ज़्यादातर छोटे किसान रहते हैं, यहाँ खेती ही आजीविका का मुख्य साधन है। यह क्षेत्र गर्मियों में पानी की भारी किल्लत से जूझता था, जिससे खेती करना संभव नहीं हो पाती थी। पीने के पानी भी मुश्किल से जुटा पाते थे । इस प्रकार पानी की कमी के कारण गांवों में कई मुश्किलें खड़ी हो जाती थीं। इसी समस्या के समाधान के लिए हलमा को जल संरक्षण के लिए अपनाया गया।
पहले हलमा में पुरुषों की भागीदारी अधिक थी, लेकिन अब महिलाओं और बच्चों की संख्या ज़्यादा होती है। उनका कहना है कि महिलाएं पानी की अहमियत समझती हैं, क्योंकि कुएँ-तालाब से पानी लाने से लेकर घर के सभी कामों में इसकी ज़रूरत होती है। वहीं, पाली अमलियार बताती हैं, “हलमा हमारे लिए एक त्योहार की तरह है, जिसमें ज़रूरतमंदों की मदद की जाती है। महिलाएँ इसमें अपनी स्वेच्छा से शामिल होती हैं, उन पर कोई दबाव नहीं होता।”
महिलाओं की सक्रिय भागीदारी हलमा को और अधिक समावेशी बनाती है। वे जल संरक्षण और सामुदायिक विकास में योगदान देकर समाज को सशक्त बना रही हैं। हलमा भील आदिवासी समाज और किसानों की संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। पुराने समय में संसाधनों की कमी के कारण लोग अकेले खेतों का काम नहीं कर पाते थे, तब पूरा गाँव एक-दूसरे की मदद करता था।” आज भील समुदाय ने हलमा को जल संरक्षण और पर्यावरण बचाव के लिए एक नई दिशा दी है।
हलमा के महत्व, जल संकट और जल संरक्षण के महत्व को समझने के लिए इस क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण पर कार्य कर रही गैर सरकारी संस्था शिवगंगा के सराहनीय प्रयास से इसे और गति मिली। लोगों को बताया कि जब किसी व्यक्ति पर संकट आता है, तो हलमा के माध्यम से उसकी सहायता की जाती है। आज पूरा क्षेत्र जल संकट से जूझ रहा है, इसलिए इस समस्या के समाधान के लिए भी हलमा को अपनाने की ज़रूरत थी।
इस जागरूकता अभियान के ज़रिए जल संरक्षण की प्रक्रिया हलमा के माध्यम से शुरू हुई।” झाबुआ के 300 से अधिक गावों में पर्यावरण संरक्षण दृष्टि से तालाब, झील, बोरी बंधान, स्टॉप डैम, कंटूर ट्रेंचेस, हैंडपंप का निर्माण, आदि कितने ही जल संरचनाओं का निर्माण हलमा द्वारा किया गया है। वर्तमान समय में हलमा एक बड़े आंदोलन और उत्सव का रूप ले चुका है, जो जल संरक्षण के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण का भी काम करता है।
झाबुआ ज़िले के 12000 हेक्टेयर में फैली हाथीपावा पहाड़ी पर करीब 235000 कंटूर ट्रेंच बनाए गए, जो पानी के संरक्षण और कृषि सुधार के लिए महत्वपूर्ण तकनीक है। आज हलमा जल संरक्षण से जन आंदोलन बन गया है। यह अब झाबुआ के जनजातीय समुदाय के लिए एक उत्सव और वार्षिक आयोजन का रूप ले चुका है, जिसमें छात्र, शोधार्थी, विशेषज्ञ और विभिन्न संस्थाओं के लोग भाग लेते हैं। हलमा न सिर्फ़ पारंपरिक एकजुटता का प्रतीक है, बल्कि जलवायु संकट के समाधान का भी एक महत्वपूर्ण मॉडल बन चुका है।

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