कैसे बचेगी हमारी धरती

० ज्ञानेन्द्र रावत ० 
आज के हालात में यह बेहद जरूरी है कि हम जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल पर तत्काल रोक लगावें। अमीर देशों को तो 2030 तक और गरीब देशों को 2040 तक इनका इस्तेमाल पूरी तरह खत्म करना होगा। विकसित देशों को 2035 तक कार्बन मुक्त बिजली उत्पादन का लक्ष्य पूरा करना होगा। यही नहीं गैस आधारित या यों कहैं कि गैस संचालित पावर प्लांट भी पूरी तरह बंद करने होंगे। अब इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज धरती विनाश के कगार पर है। विडम्बना यह है कि हम सब इसके बावजूद सब कुछ जानते-समझते हुए भी मौन हैं। 
दुनिया के अध्ययन-शोध इस तथ्य के जीते-जागते सबूत हैं कि यदि धरती को बचाना है तो सभी देशों को पहले से ज्यादा गंभीरता और तेजी से कदम उठाने होंगे। कारण जलवायु परिवर्तन के चलते विनाश की घड़ी की टिक-टिक हमें यह बताने के लिए काफी है कि अब बहुत कुछ हो गया, अब हमें कुछ करना ही होगा अन्यथा बहुत देर हो जायेगी और उस दशा में हाथ मलते रहने के सिवा हमारे पास करने को कुछ नहीं होगा। हालात गवाह हैं कि अब ऐसी स्थिति आ गयी है कि अब नहीं तो फिर कभी भी नहीं। संयुक्त राष्ट्र के अंतर सरकारी पैनल आईपीसीसी की ताजा रिपोर्ट इसी खतरे की ओर इशारा कर रही है। यही वह अहम वजह है कि यू एन महासचिव एंटोनियो गुटारेस को यह कहना पड़ रहा है कि अब हर मोर्चे पर,हर ओर तेजी से कदम उठाने की जरूरत है।

दरअसल औसत वैश्विकरण तापमान में बढ़ोतरी को औद्यौगिक काल से पहले की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस पर रोकने की दिशा में अब तक किये गये सारे के सारे प्रयास नाकाम साबित हुए हैं। सच्चाई तो यह है कि औसत तापमान में अभी तक 1.1 डिग्री की बढ़ोतरी हो चुकी है। आईपीसीसी की हालिया रिपोर्ट से गर्म होती धरती की भयावह तस्वीर सामने आयी है जो यह बताने के लिए काफी है कि ग्लोबल वार्मिंग के खतरे से बचने के लिए 2040 तक यानी आने वाले 17 सालों में हमें जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल खत्म करना होगा। सबसे बड़ी बात यह कि औसत वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी को लक्ष्य के भीतर रोकने के लिए 2019 की तुलना में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को 2035 तक 60 फीसदी कम करना होगा। 

यू एन महासचिव एंटोनियो गुटारेस कहते हैं कि आज के हालात में यह बेहद जरूरी है कि हम जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल पर तत्काल रोक लगावें। अमीर देशों को तो 2030 तक और गरीब देशों को 2040 तक इनका इस्तेमाल पूरी तरह खत्म करना होगा। विकसित देशों को 2035 तक कार्बन मुक्त बिजली उत्पादन का लक्ष्य पूरा करना होगा। यही नहीं गैस आधारित या यों कहैं कि गैस संचालित पावर प्लांट भी पूरी तरह बंद करने होंगे। सच्चाई यह है कि इस रिपोर्ट में 2015 में जलवायु परिवर्तन के खतरों से बचने की ख़ातिर हुए पेरिस समझौते के बाद से अबरक आई सभी रिपोर्टें को सार रूप में समाहित किया गया है। गौरतलब है कि इस रिपोर्ट के कुछ बिन्दुओं पर चीन, ब्राजील, सऊदी अरब और अमेरिका आदि बहुतेरे देशों को आपत्तियां थीं लेकिन बाद में उसमें इस पर आम सहमति बनी और फिर इसे जारी किया गया। 

यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है जबकि अमरीका में अलास्का के बड़े विलो आयल ड्रिलिंग प्रोजेक्ट को सरकार ने मंजूरी दी है। इस प्रोजेक्ट की प्रतिदिन की क्षमता 1,80,000 बैरल पैट्रोलियम की है। इसे विसंगति नहीं तो और क्या कहेंगे। जबकि दुनिया के 3.3 से लेकर 3.6 अरब लोगों पर जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा खतरा मंडरा रहा है। इससे बाढ़, सूखा और दूसरी आपदाओं से ऐसे लोगों की जान जाने का खतरा 15 गुणा और बढ़ जाता है। जबकि घरेलू उत्सर्जन की बात करें तो 10 फीसदी परिवार ऐसे हैं जो दुनिया में सर्वाधिक ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करते हैं जिनकी कुल घरेलू उत्सर्जन में हिस्सेदारी 34 से 45 फीसदी तक है। यही नहीं 50 फीसदी परिवार ऐसे हैं जो दुनिया में सबसे कम ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करते हैं जिनकी कुल घरेलू उत्सर्जन में हिस्सेदारी 13 से लेकर 15 फीसदी तक है।

चिंता की बात यह है कि हम यह कभी नहीं सोचते कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को क्या दे रहे हैं और उसे किन हालात में छोड़कर जा रहे हैं। हम यह भी नहीं सोचते कि हम उसके सामने कैसी विषम परिस्थितियां खडी़ कर रहे हैं। इनका मुकाबला कर पाना हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए आसान नहीं होगा बल्कि वह बहुत ही दुष्कर होगा। क्योंकि मानवीय स्वार्थ ने पृथ्वी, प्रकृति और पर्यावरण पर जो दुष्प्रभाव डाला है, उससे पृथ्वी बची रह पायेगी, आज यह मुद्दा सर्वत्र चर्चा का विषय बना हुआ है जो चिंतनीय है। शोध और अध्ययन सबूत हैं कि अभी तक छह बार धरती का विनाश हो चुका है और अब धरती एक बार फिर सामूहिक विनाश की ओर बढ़ रही है। 

इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हमने अपने स्वार्थ और सुख-सुविधाओं की अंधी चाहत के चलते धरती को कबाड़खाने में तबदील कर दिया है। यदि हम धरती के बीते 500 सालों के इतिहास पर नजर डालें तो धरती पर तकरीब 13 फीसदी से ज्यादा प्रजातियां अभी तक विलुप्त हो चुकी हैं और हजारों की तादाद में प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर हैं। यह जैव विविधता के गिरावट के भयावह संकट का संकेत है। इसका सबसे बडा़ कारण प्रकृति का बेतहाशा दोहन, शोषण और बढ़ता प्रदूषण है। जलवायु परिवर्तन ने इसमें अहम भूमिका निबाही है। इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता। यह भी कि जलवायु परिवर्तन ने पेड़-पौधों पर पानी का दबाव बढा़ दिया है।

इसका कारण बारिश के स्वरूपों में दिन-ब-दिन तेजी से आ रहा बदलाव है जिसके चलते बारिश पर निर्भर फसलों पर इसका ज्यादा असर पड़ा है। क्योंकि जब पेड़-पौधों की जड़ें पानी से अपना संपर्क गंवा देती हैं, उस दशा में वह अपनी शाखाएँ बढ़ाना तक बंद कर देती हैं। ब्रिटेन के वैज्ञानिकों के हालिया अध्ययन इसके जीते-जागते सबूत हैं। असलियत तो यह है कि जलवायु परिवर्तन के खतरे अब हर ओर दिखाई देने लगे हैं। लेकिन विडम्बना यह है कि इसके दुष्प्रभावों से पर्वतों पर दिनोंदिन कम होती जा रही बर्फ की ओर कम ध्यान दिया जा रहा है। दुनिया में पानी के एकमात्र स्रोत ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। आने वाले दशकों में इन स्रोतों से पानी गायब हो सकता है, इसकी चिंता किसी को नहीं है। इन हालात में अगले लगभग छह दशकों में एक अनुमान के मुताबिक इनका या तो नामोनिशान मिट जायेगा या ना के बराबर रह जाएंगे। तात्पर्य यह कि ये पर्वत बर्फ विहीन हो जायेंगे।

यही नहीं जलवायु परिवर्तन के कारण शुष्क मौसम के चलते दुनिया में गिटार, वायलिन और अन्य वाद्ययंत्र बनाने में इस्तेमाल की जाने वाली दुर्लभ लकडी़ के फ्रांस और स्विट्ज़रलैंड के पर्वतीय इलाकों में फैले 20 से 60 मीटर तक की ऊंचाई के स्प्रूस ट्री के जंगल हमेशा-हमेशा के लिए सूख जायेंगे। जीव - जंतुओं की हजारों प्रजातियों, प्राकृतिक स्रोतों और वनस्पतियों की तेजी से हो रही विलुप्ति के चलते पृथ्वी दिन-ब-दिन असंतुलित हो रही है। आधुनिकीकरण के मोहपाश के बंधन के चलते दिनोंदिन बढ़ता तापमान, बेतहाशा हो रही प्रदूषण वृद्धि, पर्यावरण और ओजोन परत का बढ़ता ह्वास, प्राकृतिक संसाधनों का अति दोहन, ग्रीन हाउस गैसों का दुष्प्रभाव, तेजी से जहरीली और बंजर होती जा रही जमीन, वनस्पतियों की बढ़ती विषाक्तता आदि यह सब हमारी जीवनशैली में हो रहे बदलाव का भीषण दुष्परिणाम है। सच कहा जाये तो इसमें जनसंख्या वृद्धि के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। इसने पर्यावरण, प्रकृति और हमारी धरती के लिए भीषण खतरा पैदा कर दिया है।

हम यह नहीं सोचते कि यदि प्राकृतिक संसाधन और हमारी जैव संपदा ही खत्म हो गयी तब क्या होगा? जैव विविधता के ह्वास की दिशा में यदि हम वैश्विक स्तर पर नजर डालें तो लैटिन अमरीका और कैरेबियन क्षेत्र सर्वाधिक प्रभावित हैं। क्योंकि 52 फीसदी कृषि उत्पादन से जुडी़ भूमि विकृत हो चुकी है, 70 फीसदी जैविक नुकसान में खाद्य उत्पादन से जुडे़ कारक जिम्मेवार हैं। 28 फीसदी ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए खाद्य प्रणाली जिम्मेवार है। 80 फीसदी वैश्विक वनों की कटाई के लिए हमारी कृषि जिम्मेवार है और 50 फीसदी मीठे पानी की प्रजातियों के नुकसान के लिए खाद्य उत्पादन से जुडे़ कारक जिम्मेवार हैं। यदि अब भी हम अपनी जैव विविधता को संरक्षित करने में नाकाम रहे और मानवीय गतिविधियां इसी तरह जारी रहीं तो मनुष्य का स्वास्थ्य तो प्रभावित होगा ही, विस्थापन बढे़गा, 

गरीब इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे, तकरीब 85 फीसदी आद्र भूमि का खात्मा हो जायेगा, कीट-पतंगों के साथ बडे़ प्राणियों पर सबसे ज्यादा खतरा मंडराने लगेगा और प्राकृतिक संपदा में 40 फीसदी से ज्यादा की कमी आ जायेगी। इसलिए समय की मांग है कि हम अपनी जीवन शैली में बदलाव लाएं, प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित करें, सुविधावाद को तिलांजलि दे बढ़ते प्रदूषण पर अंकुश लगाएं अन्यथा मानव सभ्यता बची रह पायेगी, इसकी आशा बेमानी होगी।

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