लेगेसी से चलने वाली डेमोक्रेसी मुख्य डेमोक्रेसी नहीं है : मनसुख मांडविया

० आनंद चौधरी ० 
नई दिल्ली : प्रबोधनी के नेतृत्व में इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ डेमोक्रेटिक लीडरशिप की 8वीं दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि केंद्रीय मंत्री डॉ मनसुख मांडविया और विशेष अतिथि के तौर पर दिल्ली भाजपा अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा ने भाग लिया। आरएसएस के वरिष्ठ नेता विनय सहस्त्रबुद्धे की अध्यक्षता में आयोजित दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि मनसुख मांडविया और वीरेंद्र सचदेवा ने इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ डेमोक्रेटिक लीडरशिप द्वारा पास हुए बच्चों को सर्टिफिकेट और स्मृति चिह्न देकर बधाई दी।
मनसुख मांडविया ने कहा कि लीडरशिप कई तरीके से हो सकते हैं आर्थिक, सामाजिक लेकिन आप लोगों ने राजनीति क्षेत्र में लीडरशिप को चुना है और अगर सचमुच लीडर बनना है तो अपने लक्ष्य को निर्धारित करने होंगे। दूसरा आपको भविष्य में अगर लीडरशिप करना है तो एक साल का प्रशिक्षण आपके लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है ताकि इस बात की जानकारी मिल सके कि आपको कब और कितना बोलना है।
मांडविया ने कहा कि लेगेसी से चलने वाली डेमोक्रेसी मुख्य डेमोक्रेसी नहीं है बल्कि देश में रहने वाले सभी लोगों को देश में अपना योगदान देने के लिए अवसर मिलना चाहिए इसलिए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि देश में 1 लाख युवा लीडरशिप चाहिए। उन्होंने कहा कि देश आपको मौका दे रहा है कि आप आइए और इस डेमोक्रेसी का हिस्सा बनिए। आपके जज्बे, काम करने का तरीका और देश के प्रति अपने समर्पण से लीडरशिप आती है।

दिल्ली भाजपा अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा ने कहा कि भारत इस समय एक रोचक दौर से गुजर रहा है। यह आकांक्षाओं का युग है, एक बेहतर जीवन की चाह हर दिशा में दिखाई देती है। इन जन आकांक्षाओं को पूर्ण करने की ज़िम्मेदारी उन सभी पर है जो समाज का नेतृत्व करते हैं। राजनीति, मीडिया और स्वयंसेवी संगठनों से जुड़े नेताओं की भूमिका इन आकांक्षाओं को आकार देने और उन्हें साकार करने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करने में अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।

उन्होंने कहा कि जहाँ जन्मजात नेता सदैव कम ही होते हैं, वहीं आज ऐसे लोगों की भी भारी कमी है जो स्वयं में नेतृत्व की क्षमताओं को विकसित करने का प्रयास करें और अपने को एक प्रभावी नेता के रूप में ढालें। सच्चा नेतृत्व केवल पहल, साहस और व्यक्तित्व से ही नहीं बनता, वह प्रेरणा से उपजता है, उसका साहस दृढ़ विश्वास पर आधारित होता है और उसके मूल में सिद्धांत होते हैं।

विनय सहस्त्रबुद्धे ने कहा कि सिर्फ देश में ही नहीं पूरे विश्व में एक गलतफहमी था और स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपेयी भी उसका उल्लेख करते थे कि राजनीति, फ़िल्म लाइन में और मीडिया जगत के लिए किसी प्रशिक्षण की जरूरत नहीं है लेकिन अब समय बदल रहा है और प्रबोधनी ने अपने ही संस्थान इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ डेमोक्रेटिक लीडरशिप के माध्यम से इस पर ध्यान दिया और ऐसे युवाओं का निर्माण करने का काम पिछले 8 वर्षों से शुरू कर चुकी है। उन्होंने कहा कि आज के युवाओं को आकलन नहीं होता है और युवाओं के अंदर ऐसी धारणा बन गई कि राजनीति भी एक तरह की संस्था बन गई है। लेकिन प्रबोधनी आज इस मिथ को तोड़ने में सफल रहा है।

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