भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा के आध्यात्मिक महत्त्व

० विनोद तकियावाला ० 
नयी दिल्ली - भारत पर्व त्योहारो का देश है। जहाँ प्रत्येक दिन कोई कोई पर्व - त्योहार उत्सव होते रहता है। तभी तो भारतीय संस्कृति ने सम्पूर्ण विश्व में अपनी अलग पहचान बनाई है।यहाँ पर विभिन्न धर्म संप्रदाय के लोग आपस में अभी भी मिलकर रहते है। तभी तो भारत को विविधता का देश भी कहा जाता है।आज हम आपको आज से प्रराम्भ हुए भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा के बारे में चर्चा करने जा रहे है।हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार हिन्दी आषाढ़ के शुक्ल पक्ष की द्वितीय तिथि को भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के संग अपनी मौसी के घर जाते हैं। यह रथ यात्रा उडिसा राज्य के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर से तीन दिव्य रथों पर निकाली जाती हैं। इनमे से सबसे आगे बलभद्र जी का रथ,उनके पीछे बहन सुभद्रा जी का रथ और सबसे पीछे जगन्नाथ का रथ होता है।

इस साल जगन्नाथ यात्रा 20 जून से शुरू हो चुकी है। इस रथ यात्रा उत्सव का समापन 1 जुलाई को होगा। आज के दिन देश विभिन्न क्षेत्रों में भी श्रद्धालूओं के द्वारा रथ यात्रा के कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया जाता है। भगवान जगन्नाथ जी की यह रथ यात्रा । इसकी क्या मान्यता है। तो आप को मै बता दूँ कि इसके पीछे कई पौराणिक कथा व रहस्य छिपा है। जिसका वर्णन पद्म पुराण में उल्लेख मिलता है।पद्य पुराण के अनुसार भगवान जगन्नाथ की बहन ने एक बार नगर देखने की इच्छा जताई थी।जिसके बाद भगवान जगन्नाथ और बलभद्र जी ने अपनी लाडली बहन सुभद्रा को रथ पर बैठाकर नगर दिखाने निकल पड़े थें।
इस दौरान वे मौसी के घर गुंडिचा भी गए और यहां सात दिन ठहरे थें।तभी से जगन्नाथ यात्रा निकालने की परंपरा चली आ रही है। इस सम्बन्ध में नारद पुराण और ब्रह्म पुराण में भी इसका जिक्र है। धामिक मान्यताओं के मुताबिक, मौसी के घर पर भाई-बहन के साथ भगवान खूब पकवान खाते हैं और फिर वह बीमार पड़ जाते हैं।उसके बाद उनका इलाज किया जाता है और फिर स्वस्थ होने के बाद ही लोगों को दर्शन देते हैं।इस बर्ष भी भगवान

 जगन्नाथ रथ यात्रा प्रारंभ (गुंडिचा मौसी के घर जाने की परंपरा) 24 जून हेरा पंचमी(पहले पांच दिन भगवान गुंडिचा मंदिर में वास करते हैं। अगले हफ्ते 27 जून को संध्या दर्शन को दर्शन भगवान अपने भक्तों को देंगें।धार्मिक ग्रंथो व पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन जगन्नाथ के दर्शन करने से 10 साल तक श्रीहरि की पूजा के समान पुण्य मिलता है। 28 जून को बहुदा यात्रा(भगवान जगन्नाथ,बलभद्र और बहन सुभद्रा की घर वापसी) 29 जून सुनाबेसा(जगन्नाथ मंदिर लौटने के बाद भगवान अपने भाई-बहन के साथ शाही रूप लेते हैं।

30 जून आधर पनाआषाढ़ शुक्ल द्वादशी पर दिव्य रथों पर एक विशेष पेय चढ़ाया जाता है। इसे पना कहते हैं जो दूध,पनीर,चीनी और मेवा से बनता है। 1जुलाई नीलाद्री बीजे (जगन्नाथ रथ यात्रा के सबसे दिलचस्प अनुष्ठानों में एक है ।इस तरह से 11 दिवसीय कार्यक्रम का समापन होता है। 

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