हिमालय को सुरंगों से बचाओ

० सुरेश भाई ० 
उत्तराखंड में 12 नवंबर से ऑल वेदर रोड के लिए निर्माणाधीन सिल्क्यारा सुरंग में भारी भू-धंसाव के कारण 40 से अधिक मजदूर फंसे हुए हैं। इस सुरंग की लंबाई 4.5 किमी है। जिस स्थान पर भूस्खलन हुआ है वह सुरंग के मुहाने से 230 मीटर अंदर है। इसके आगे काम कर रहे मजदूर जिंदगी और मौत के बीच फंसे हैं। उन्हें सकुशल बाहर निकालने के लिए स्थानीय प्रशासन से लेकर राज्य और केंद्र की सरकार ने अनेकों मशीन देश-विदेश से मंगा दी है।

लेकिन मलवा हटाते समय मशीनें जल्दी ही खराब हो रही है। सुरंग के अंदर आये मलवे में भारी पत्थर जमा हो रखे हैं ।जैसे-जैसे उनको हटाने का प्रयास होता है तो वहां उतना ही मलवा फिर से गिरकर जमा हो जाता है। वैसे यह स्थिति तब तक बरकरार रहती है, जब तक पूरा मलवा नीचे नहीं उतरता है।क्योंकि सुरंगों का निर्माण अधिकांश विस्फोटों से किया जाता है। जिसके कारण पूरा पहाड़ हिल जाता है।भूकंप भी इस क्षेत्र में लगातार आ रहे हैं और धरती में दरारें पड़ रही है।
बारिश के समय पानी भी इसमें जमा होने से पहाड़ नासूर होकर दरकने शूरु।होते है।यहां स्थिति इसलिए भी गंभीर बनती जा रही है कि जिस स्थान पर सुरंग के अंदर भारी मलवा जमा हो गया है ।वहां पहले भी ऊपर से भूस्खलन होता रहा है। लेकिन उसको नजरअंदाज किया गया।

निर्माण एजेंसी अपना काम आगे बढ़ाती रही। लेकिन पहले से बने संवेदनशील हिस्से का उपचार करना छोड़ दिया।यदि वे समय रहते काम करते तो शायद यह नौबत नहीं आती। उत्तराखंड में सुरंग आधारित परियोजनाओं के निर्माण में ऐसी अनेक लापरवाही नजर आती है। जिस पर सन् 2000 से सवाल खड़े होते रहे हैं।

यहां सुरंग में फंसे मजदूरों को बाहर निकालने के लिए बहुत मेहनत से काम किया जा रहा है। जिसके चलते उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि वे सुरंग आधारित परियोजनाओं पर पुनर्विचार करेंगे।अच्छा हो कि मजदूर सकुशल बाहर आ जाएं इसके बाद यदि वे अपने बयान पर टिके रहते हैं तो उत्तराखंड हिमालय की संवेदनशीलता को देखकर सुरंग आधारित परियोजनाओं के निर्माण को त्याग देंगे? यदि इस घटना के बाद संभल जाते हैं तो आधे से अधिक पहाड़ को भूस्खलन से बचाया जा सकता है।

लेकिन दूसरी ओर गौर करें तो उत्तराखंड में सुरंग आधारित परियोजनाओं के लिए राज्य सरकार बहुत उत्साहित दिखाई देती है। यहां सड़क, रेल लाइन, पार्किंग जैसी व्यवस्था को सुरंगों के अंदर ले जाने के लिए चिंतन मनन चल रहा है। पिछले दिनों देहरादून में सुरंग विशेषज्ञों को बुलाकर सुझाव भी मांगे गए है।चारधाम यात्रा को पूरी तरह पर्यटन में तब्दील करने के लिए सुरंग आधारित परियोजनाओं को अधिक महत्व देने का अर्थ है कि कम समय में अधिक दूरी तय की जाए। 

लेकिन सरकार यह भूल रही है कि जिन तीर्थ स्थलों और पर्यटन क्षेत्र तक पहुंचने के लिए बीच में छोटे-छोटे बाजार बने हैं। लोगों के रोजगार के कई साधन खड़े हुए हैं। बाहर से आने वाले लोग होटलों में रुकते हैं। सामान खरीदते हैं। फिर आगे बढ़ते हैं। क्या उन्हें सुरंग के बाहर धकेले दिया जाएगा और पर्यटन से रोजगार देने की बात किसके लिए हो रही है? यह तो केवल एक पहलू ही है।दूसरा हिमालय के इस पर्वतीय भू-भाग की संवेदनशीलता के बारे में हर स्तर से कहा जा रहा है कि इस युवा पर्वत पर देश में कुल भूस्खलनों में उत्तर पश्चिम हिमालय का योगदान 67% के बराबर है। 

हिमाचल और उत्तराखंड में हो रहे भूस्खलन की घटनाओं के बारे में विशेषज्ञ कह रहे हैं कि यहां पर अवैज्ञानिक निर्माण, घटते वन क्षेत्र, नदियों के पास पानी के प्रवाह को अवरुद्ध करने वाली संरचनाएं भूस्खलन बढ़ा रही है। सड़कों का चौड़ीकरण, सुरंगों और जल विद्युत परियोजनाओं के लिए विस्फोट में लगातार वृद्धि भूस्खलन की बढ़ती घटनाओं के मुख्य कारण है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2000 से 2017 के बीच हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू कश्मीर और लद्दाख में 20196 भूस्खलन की घटनाएं हुई है। 

हिमाचल प्रदेश में 1674, उत्तराखंड में 11219, जम्मू कश्मीर में 7280 और लद्दाख में 23 घटनायें हुई है। भूस्खलन की घटनाएं केवल बरसात में नहीं बल्कि सभी मौसमों में हो रही है याद करना चाहिए कि फरवरी 2021 में ऋषि गंगा मे आई भीषण बाढ़ के कारण तपोवन टनल में 206 मजदूर मलवे में दब गए थे। इसी तरह सन् 1991 के उत्तरकाशी भूकंप में सुरंग के ऊपर बसे जामक गांव में सबसे अधिक मौतें हुई थी। सन् 2005 में जोशियाडा- धरासू सुरंग में भी 20 मजदूर 14 घंटे तक फंसे रहे हैं। 

सन् 2013 की केदारनाथ आपदा के समय भी सुरंग आधारित परियोजनाओं से जमा हुए मलवे के कारण ही अधिकांश जिंदगियां बर्बाद हुई है। हाल ही में चर्चित जोशीमठ भू-धंसाव का कारण भी स्थानीय लोग यहां नीचे टनल निर्माण को ही मानते हैं। ऋषिकेश- कर्णप्रयाग रेल लाइन का अधिकांश हिस्सा सुरंग के रूप में निर्माणाधीन है। यहां भी सुरंग के ऊपर आने वाले लगभग 30 गांव के घरों में दरारें पड़ चुकी है। गांव का जल स्रोत प्रभावित हो रहे है। खेती की नमी सूख रही है। आदि ऐसे अनेकों कारण है जो सुरंग निर्माण से पैदा हो रहे हैं। 

सुरंग के इन दुष्प्रभावों के बाद भी रानी पोखरी- टिहरी झील तक 32 किमी, घुत्तू -गुप्तकाशी तक 11 किमी, देहरादून से मसूरी तक, देहरादून - गंगोत्री रेल मार्ग निर्माण के लिए लगभग 70 किलोमीटर से अधिक सुरंग के निर्माण पर विचार हो रहा है। इसके साथ ही उत्तराखंड में प्रस्तावित 558 बांधों से भी लगभग 1500 किमी लंबी सुरंगें बन सकती है। इस बारे में सोशल मीडिया पर पर्यावरणविद् और आमजन लिख रहे हैं कि क्या इन सुरंगों के अंदर जानेवाली रेलगाड़ी और वाहनों में जिंदगी अटकने की संभावनाओं से कोई इन्कार कर सकता है?

अतः हिमालय को लालच की वस्तु न समझा जाए। यहां की पारिस्थितिकी को केवल आर्थिक लाभ के लिए न तौला जाए। हिमालय देश का मुकुट है। इसे पर्यटकों का ऐशगाह न बनायें। हिमालय की संवेदनशीलता को समझते हुए अनियोजित विकास पर नियंत्रण करना बहुत जरूरी हो गया है।

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