विचन्श की तीसरी पुण्यतिथि पर स्मृति सभा

० मेघ पांडेय ० 
नयी दिल्ली - कवि-कथाकार-संपादक विष्णु चंद्र शर्मा की तीसरी पुण्यतिथि पर 'मित्रनिधि' की ओर से एक स्मृति सभा का आयोजन सादतपुर, दिल्ली में किया गया। इस अवसर पर वरिष्ठ कवि रामकुमार कृषक, राधेश्याम तिवारी, शीला त्यागी, ओम पीयूष, दुर्गाप्रसाद कश्यप, मनीष सिन्हा, मेघ पांडेय और महेश दर्पण ने अपने प्रिय कवि विष्णु चंद्र शर्मा की चुनी हुई कविताओं का पाठ किया। घर की हंसी खुशी, जड़ों वाला कवि, सब कुछ करीने से है यहां, समानांतर घर, आश्चर्यलोक में निराला, खाली कमरों के बीच, तीन ताल और कला भवन जैसी बहुचर्चित विचन्श की कविताओं के साथ ही लगभग दो दर्जन कविताओं का पाठ इस दौरान किया गया।
अपने संदेशों सहित मन से उपस्थित अनेक साहित्यकार इस सभा की विशेषता रहे। वरिष्ठ आलोचक आनंद प्रकाश का कहना था-"विष्णुजी ने लगातार प्रतिबद्ध लेखकों को रेखांकित किया। उनका तर्क विकास के नए दौरों में नई प्राथमिकताओं का वाहक बना। वह निर्भीक भी थे, असहमति या विरोध से न डरते थे। हम लोगों के लिए वह हमेशा मिसाल रहे।

दिनेश द्विवेदी ने लिखा- नूतन-पुरातन ब्रह्मांड उनके रोम-रोम में बसता था। वह प्राचीन-अर्वाचीन कला-साहित्य-संस्कृति के जाग्रत शक्तिपीठ की तरह थे। जब वह बोलते, अनेक युग प्रतिध्वनित होते। वाचस्पति के अनुसार- उनका परिचय त्रिलोचन जी ने बनारस में 1967 में विचन्श से कराया। उनमें भाई महेश शर्मा और सत्या बहन के प्रति अंत तक अनुराग बना रहा। उन जैसे कठिन नैतिक आग्रही लेखक रेयर हैं। हिंदी समाज को इस टाइप के रचनाकार से एलर्जी है। उनकी रचनावली का प्रकाशन होना चाहिए।

पीयूष कुमार ने कहा आज़ादी के बाद से अब तक के समय को अपने लेखन में नापने-तौलने वाले विष्णु जी की लेखकीय प्रतिबद्धता दुर्लभ है। उनकी राजनीतिक चेतना, रूढ़ि विरोध, यात्रा साहित्य, वैश्विक साहित्य, अनुभव पर दृष्टि से उनका लिखा समृद्धि पाता है। काजल पांडेय का कहना था कि विष्णुजी की अनुपस्थिति में सब कुछ अधूरा लगता रहा। लेखन में मेरी पहचान उन्हीं के प्रोत्साहन के कारण बनी। डॉ. रत्नेश गुप्ता ने अपने सन्देश से विचन्श को श्रद्धांजलि अर्पित की।

टिप्पणियाँ

darpan mahesh ने कहा…
रिपोर्ट पढ़कर खुशी हुई। विष्णु जी का स्मरण आज प्रासंगिक है।

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