90 के दशक तक स्त्रियाँ घर-संसार से बंधी अपने कैरियर के प्रति उदासीन दुधारी तलवार पर चलती थीं : मीता दास

० मुज़फ्फर सिद्दीकी ० 
भोपाल : अंतर्राष्ट्रीय विश्वमैत्री मंच का अभिनव आयोजन, कहानी संवाद ‘दो कहानी दो समीक्षक’ गूगल मीट पर आयोजित किया गया। इस मौके पर संस्था की संस्थापक अध्यक्ष संतोष श्रीवास्तव ने कहा कि " एक सफलता के कई पहलू हैं, मापदंड हैं। आज के विज्ञापन युग में स्वयं को प्रूफ करते हुए बार - बार, हर जगह दस्तक देते हुए लेखक खुद ज़माने की जद्दो-जहद से गुज़रता है। कई लेखक तो उनकी रचनाओं का मूल्यांकन हुए बिना ही इस दुनिया से बिदा हो जाते हैं, मुक्तिबोध। उनकी मृत्यु के बाद ही उनकी रचनाओं का मूल्यांकन हुआ। लेखक का मुख्य उद्देश्य पाठक के दिल पर दस्तक देना ही होना चाहिए। "

अध्यक्षता कर रहीं वरिष्ठ साहित्यकार मीता दास ने पढ़ी गई दोनों कहानियों पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि दोनों कहानियों को सचेत कहानियों के अंतर्गत रखा जा सकता है। महिमा श्रीवास्तव वर्मा की कहानी 'निर्णय', आज के दौर के नारी सचेतन कैरियर की तरफ आकर्षित करती है। 90 के दशक तक स्त्रियाँ घर - संसार से बंधी अपने कैरियर के प्रति उदासीन या दबाव सहन करते हुए दुधारी तलवार पर चलती थीं।

जया आनंद की कहानी 'परीक्षा', आज के शिक्षा के क्षेत्र में चूहा दौड़ में शामिल, माँ - बेटे के संवादों और भावनाओं के उहापोह की कहानी है। मुख्य अतिथि, वरिष्ठ साहित्यकार गोविन्द शर्मा ने जया आनंद की कहानी पर अपनी समीक्षात्मक टिप्पणी देते हुए कहा कि आज के दौर में बच्चों को प्रोडक्ट बना दिया गया है। जिसकी मार्केटिंग कर, समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करना है। हम भूल जाते हैं कि बच्चा हमारी प्रॉपर्टी नहीं है। वह एक संवेदनशील मानव मन लिए हुए व्यक्ति है।

सञ्चालन कर रहे मुज़फ्फर सिद्दीकी ने अपनी भूमिका में कहा कि निश्चित ही दूसरों के साथ हुई घटना को सुनने और अपने अनुभव सुनाने की इच्छा आज भी हर मनुष्य में समान रूप से पाई जाती है। महिमा श्रीवास्तव वर्मा की कहानी 'निर्णय', और जया आनंद की कहानी 'परीक्षा' को श्रोताओं ने भी कमेंट बॉक्स में काफी सराहा। जया केतकी ने बहुत ही आत्मीय स्वागत वक्तव्य दिया तो अर्चना पंड्या ने बहादुर शाह जफर की गजल सुना कर सभी का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में देश - विदेश से अनेक साहित्यकार, पत्रकार एवं कला प्रेमी अंत तक जुड़े रहे।

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