जब तक पेट गुलाम रहेगा, कलम आजाद नहीं -रघु ठाकुर

० आशा पटेल ० 
नई दिल्ली। दिल्ली हरियाणा पत्रकार संघ द्वारा आयोजित कार्यक्रम "पत्रकारों की दशा एवं दिशा- पर चर्चा" दिल्ली के भगवान दास मार्ग पर आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता देश के जाने-माने समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर ने की। कार्यक्रम को आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सदस्य संजय सिंह, पूर्व सांसद महाबल मिश्रा, महेंद्र गोयल-विधायक रिठाला,  जयभगवान उपकार-विधायक बवाना, फिरोज़ चौधरी-कांग्रेस, कमर आलम-विधायक जदयू बिहार ने सम्बोधित किया।
कार्यक्रम में बोलते हुए आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सदस्य संजय सिंह ने कहा कि-"आज लोकतंत्र के चौथे खंबे कही जाने वाली पत्रकारिता की स्थिति बड़ी चिंताजनक हो गई है। पत्रकारों की स्थिति मालिकों के गुलाम जैसी बन गई है। वह निर्भीकता से, ईमानदारी से, अपनी पत्रकारिता नहीं कर पा रहे हैं। आज यदि पत्रकार को इमानदारी से पत्रकारिता करनी है तो उसकी कलम आजाद होनी चाहिए।" कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए रघु ठाकुर ने कहा कि-" आज बड़े महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा हो रही है। पत्रकार अपने आप को लोकतंत्र का चौथा खम्बा मानते हैं हालांकि संविधान में लोकतंत्र के तीन ही खंबे हैं।
लोकतंत्र का चौथा खंभा जिसको पत्रकारिता कहा जाता है वह स्वयंभू है। इसकी शुरुआत ब्रिटिश पार्लियामेंट से हुई थी जब एक सज्जन ने बोलते हुए पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा खंबा कहा था। लोकतंत्र में दूसरे की बात सुनना महत्वपूर्ण है। कभी-कभी अपनी आलोचना सुनने का साहस भी करना चाहिए।अपने लिए प्रिय कहना ही लोकतंत्र नहीं है, बल्कि, अपने खिलाफ सुनना सही लोकतंत्र है। आज लोग कह रहे हैं कि लोकतंत्र के चारों खम्बों में गड़बड़ियां हैं। मेरा मानना है कि चारों में कुछ अच्छाइयां भी हैं। त्याग की, कुर्बानी की, अपेक्षा जितनी राजनीति वालों से है, जितनी न्यायपालिका से है, जितनी नौकरशाही से है, उसी प्रकार पत्रकारों से भी है। 

पत्रकारों से जो अपेक्षा है, केवल उन्हीं से करेंगे और अन्य से नहीं करेंगे, यह पत्रकारों के साथ अन्याय होगा। आज पत्रकारों के साथ भी बड़ी समस्या है- क्या उनके पास आजादी है? पत्रकार जो लिखना चाहता है- क्या आज लिख पा रहा है? पत्रकार जो कुछ करना चाहता है- क्या वह कर पा रहा है? क्या पत्रकारिता आज मिशन है? या पेट की मजबूरी है!! यह सवाल आज बड़ा महत्वपूर्ण है। कई पत्रकारों ने पत्रकारिता के लिए, अपने पत्रकारिता के लक्ष्य के लिए, अपने जीवन को कुर्बान कर दिया। अपने आपको जोखिम में डालकर, देश के जरूरी सवालों को उठाया। इसी दिल्ली के कई पत्रकारों को मैं जानता हूँ, जिन्होंने, पत्रकारिता के लिए, अपने जीवन को जोखिम में डाला, लेकिन समझौता नहीं किया। 

नवभारत टाइम्स के हमारे एक मित्र पत्रकार थे  ओमप्रकाश तपस, जो आज जिंदा नहीं है। यहां दिल्ली में मजदूरों का एक बड़ा आंदोलन हुआ था। तापस ने उसकी खबर बनाई। मलिक ने उसको बुलाकर कहा यह आपने क्या किया ? तपस जी ने कहा मैं तो मजदूर की खबर लिख रहा हूं। उनके आंदोलन की खबर लिख रहा हूं। तपस ने दो-तीन दिन तक लगातार खबर बनाई। लेकिन उनकी खबर नवभारत टाइम्स अखबार में नहीं छपी। तपस जी, स्वाभिमानी पत्रकार थे। उन्होंने अखबार से इस्तीफा दे दिया। तपस , आज जिंदा नहीं है। मैं उनको सलाम करता हूं। 

1980 में बिहार में एक प्रेस बिल आया। जो प्रेस पर अंकुश लगाने का बिल था। जिस पर न केवल बिहार में बल्कि पूरे देश के पत्रकारों ने आंदोलन चलाया। आखिरकार बिहार सरकार को झुकना पड़ा और बिल वापस लेना पड़ा। पत्रकारिता में बड़ी ताकत है, जिसने बिहार सरकार को झुका दिया। इस ताकत को आज हमें पुनः पैदा करना है। तभी पत्रकारिता की दशा और दिशा सुधरेगी। आज पत्रकार भी कई स्तर के हैं। एक महानगर के पत्रकार हैं- जिनको कई-कई लाख रू महीने की तनख्वाह मिलती है। दूसरे बीच के पत्रकार हैं। तीसरे वे पत्रकार हैं जो कस्बा स्तर पर पत्रकारिता करते हैं।

 उनकी बड़ी दयनीय स्थिति है। वे खबर भी इकठ्ठी करते हैं, समाचार भी बनाते हैं और अपने अखबार के लिए विज्ञापन भी घूम-घूम कर इकट्ठा करते हैं।क्योंकि जब तक विज्ञापन अपने मालिक को नहीं देंगे तब तक उनको तनख्वाह नहीं मिलेगी। आज राजनीति के लोगों की यह स्थिति बन गई है कि यदि वह हमें छापता है तो बड़ा अच्छा अखबार है, अच्छा पत्रकार है और यदि वह हमें नहीं छाप रहा तो वह बड़ा खराब है। ईमानदारी से यदि हम कहें तो आज एक प्रकार से पत्रकारिता खत्म हो रही है। आज जो पत्रकारिता को बचा रहा है वह सोशल मीडिया या यूट्यूब चैनल वाले पत्रकार हैं।

 यहां इतनी आजादी है कि व्यक्ति जो चाहे बोल सकता है। लोगों तक उसकी बात जा सकती है। आज जो बड़े-बड़े अखबार हैं, बड़े-बड़े चैनल हैं, उनके यहां आजादी नाम की कोई चीज नहीं है। आज यदि आपको पत्रकारिता की दशा और दिशा को सुधारना है तो आपको कुछ जोखिम भी लेने पड़ेंगे और कुछ सवालों के ऊपर आपको बड़ी गंभीरता से सोचना भी पड़ेगा। आज आपको नीति पर भी बात करनी चाहिए। नीति की मांग करनी चाहिए। सरकार को कानून पारित कर महानगर और अन्य नगरों में मकान बनाकर पत्रकारों को देने चाहिएं। पत्रकारों को 60 या 65 साल के बाद- वे क्या करें?

 यह एक बड़ा प्रश्न उसके सामने है? जो पत्रकार अपनी कलम के लिए जोखिम झेलने को तैयार हैं। आज भारत सरकार से क्यों नहीं आपको माँग करनी चाहिए कि जितने भी रजिस्टर्ड पत्रकार हैं उनको 60 या 65 वर्ष की आयु के बाद एक निश्चित पेंशन राशि प्रतिमाह दी जानी चाहिए। पत्रकारों को जब तक आर्थिक आजादी नहीं होगी तब तक पत्रकारिता से आप आजादी की उम्मीद नहीं कर सकते। आजादी अकेले लिखने की ही नहीं होती - आजादी पेट की भी होती है। जब तक पेट गुलाम रहेगा- कलम आजाद नहीं हो सकती। अगर कलम की आजादी चाहिए तो- पेट को भी आजाद करना होगा। तुलसीदास जी ने भी कहा है- भूखे पेट भजन नहीं होय गोपाला-ले तेरी कंठी ले तेरी माला। 

हम सरकार से लड़ेंगे हम अपने अधिकारों के लिए सरकार से भीख नहीं मांगेंगे। हम अधिकारों के लिए निवेदन नहीं करेंगे। आपको मुख्यमंत्री से, प्रधानमंत्री से मांग करना पड़े- यह स्थिति नहीं आनी चाहिए। बल्कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री आपके पास आकर कहें कि- हम आपके लिए यह कर रहे हैं। राष्ट्र पत्रकारों के प्रति कृतज्ञ है। सरकार समझे कि कृतज्ञता का भाव क्या है? पत्रकारिता की दिशा- हमारा समाज और हमारा देश होना चाहिए।लोकतान्त्रिक समाजवादी पार्टी के राष्ट्रिय महासचिव अरुण प्रताप सिंह ने बताया की कार्यक्रम में लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुकेश चंद्रा, पत्रकार हरेंद्र कौशल, रामानंद राय, वशिष्ठ, एस एस नेहरा-एडवोकेट, अमित आर्य मुख्य रूप से उपस्थित रहे।

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