कविता // जीवन भूल-भुलैया


विजय सिंह बिष्ट


जीवन भूल-भुलैया
सहारा जब लिया जिसका,
वही दूर हो जाता,
किनारा था जिसे समझा,
वही मंझधार बन जाता।


अनोखी राह है सबकी,
अपना शत्रु बन जाता,
राम -रावण दोनों लड़ पड़े,
विभीषण मित्र बन जाता।


शिथिल है तन बदन सारा,
न आंखें देख सकती हैं,
कर्णद्वार भी बंद हो चले,
न बुद्धि ही सोच सकती है।


किया जिन कदमों से भ्रभण,
अब नहीं वे साथ चलते हैं 
किया हस्तकौशल जिन हाथों,
अब वे भी कांपने लगते हैं।


तेरा मेरा करके बीता जीवन,
साथ न कोई ले जा पाया,
भगवान राम ने ली जल समाधि,
बधिक ने कृष्ण को बाण लगाया,


सच में साधों यह भूल- भुलैया,
इसका आर न पारा,
सांस रुकी तब लुटा सारा संसारा।


किया दान जिसने अपना अर्पण,
वही दानी कर्ण , दधीचि कहलाया,
सत्य की राह दुःख झेला जिसने,
वही सत्य हरिश्चन्द्र कहलाया।
     


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

IFWJ के पत्रकारों का सिस्टम के विरुद्ध अनिश्चितकालीन धरना

ईद मिलन एवं सैफी सम्मान समारोह में दिखी एकता की मिसाल,संस्थाओं को किया गया सम्मानित

ईद मिलन एवं सैफी सम्मान समारोह 5 अप्रैल को दिल्ली में

स्वर्ण जयंती पर ‘उत्कर्ष’ अनुशासन, शिष्टाचार और उत्कृष्टता का संगम

फोर स्कूल ऑफ मैनेजमेंट ने सशक्त नारियों में सिलाई मशीन वितरित की

उत्तराखंडी फिल्म “कंडाली” का पोस्टर विमोचन समारोह दिल्ली में होगा आयोजित

असंगठित श्रमिकों के अधिकारों पर राष्ट्रीय मंथन,सामाजिक सुरक्षा को लेकर उठी आवाज

जयपुर बाल महोत्सव में 15 अप्रैल तक कर सकते है फ्री रजिस्ट्रेशन

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर प्रहार के विरोध में IFWJ का ‘हल्ला बोल’ धरना

30+ स्टार्टअप्स,एक विज़न : हेल्थ एक्सचेंज 2026 से हेल्थ इनोवेशन को नई दिशा