पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिजीज (PID) का फर्टिलिटी पर क्‍या होता है असर

० योगेश भट्ट ० 
आज के समय में महिलाओं में इंटिमेट एरिया में संक्रमण का खतरा अधिक बड़ गया है, इसलिए उनको अपने सेक्सुअल हेल्थ के प्रति जागरूक रहना बहुत जरूरी है। उन्हें अपने इंटिमेट स्वच्छता पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है। कभी एसटीआई तो कभी यूटीआई के साथ-साथ मूत्राशय में संक्रमण और प्रजनन संबंधी समस्याएं महिलाओं के लिए परेशानी का कारण बनती हैं। एसटीआई और यूटीआई समस्याओं के बारे में तो आप सभी जानते होंगे लेकिन क्या आप पेल्विक इंफ्लेमेटरी बीमारी के बारे में जानते हैं?

आशा आयुर्वेदा की डायरेक्टर और सीनियर फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट डॉ. चंचल शर्मा कहती है कि पीआईडी एक आम स्वास्थ्य समस्या है जो दुनिया भर में कई महिलाओं को प्रभावित कर रही है। वैसे तो यह समस्या किसी भी उम्र की महिलाओं को हो सकती है, लेकिन यौन रूप से सक्रिय युवा महिलाओं में यह आम है। एक्सपर्ट पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिजीज महिला प्रजनन अंगों का एक संक्रमण है। यह स्थिति महिला के प्रजनन अंगों को प्रभावित करती है, जिसमें गर्भाशय, अंडाशय और फैलोपियन ट्यूब शामिल हैं। आमतौर पर संक्रमण बैक्टीरिया के कारण होता है और योनि से शुरू होता है। फिर, यह गर्भाशय ग्रीवा और अन्य प्रजनन अंगों तक फैल जाता है।

डॉ. चंचल बताती है कि विशेषज्ञों के अनुसार, कई अलग-अलग प्रकार के बैक्टीरिया पीआईडी का कारण बन सकते हैं। इसके लिए भी वही बैक्टीरिया जिम्मेदार होते हैं जो आमतौर पर सेक्सुअली ट्रांसमिटेड इंफेक्‍शन जैसे की गोनोरिया और क्लैमाइडिया का कारण बनते हैं। इसके अलावा एक से ज्यादा यौन साथी होना, बिना कंडोम का उपयोग किये सेक्स करना, आईयूडी उपकरण के कारण, पेल्विक एरिया में सूजन की बीमारी का इतिहास होना और नियमित रूप से योनि को रासायनिक द्रव से साफ करना जिससे योनि में अच्छे और बूरे दोनों बैक्टीरिया का संतुलन बिगड़ जाता है।

डॉ. चंचल बताती है कि पीआईडी एक संक्रमण है जो गर्भाशय, अंडाशय और फैलोपियन ट्यूब सहित महिला के प्रजनन अंगों को प्रभावित करता है। आमतौर पर संक्रमण बैक्टीरिया के कारण होता है और योनि में शुरू होता है। फिर, यह गर्भाशय ग्रीवा और अन्य प्रजनन अंगों तक फैल जाता है। जिससे महिला को गर्भधारण में दिक्कत आ सकती है। हालांकि, पीआईडी का उपचार संक्रमण के कारण हुए घावों को ठीक नहीं कर सकता है। जिसके कारण अगर शरीर में संक्रमण लंबे समय तक बना रहे तो निसंतानता का खतरा बढ़ जाता है। इलाज की बात करें तो आयुर्वेद में इसका इलाज संभव है। आयुर्वेद के अनुसार पीआईडी पित्त और वात दोष के खराब होने के कारण होता है।

उन्होंने बताया कि आयुर्वेद में माना जाता है कि अगर पीआईडी प्रारंभिक चरण में है, इसका मतलब पेल्विक सूजन बहुत पुरानी नहीं है तो रोग का इलाज आयुर्वेदिक दवाइयों से ही किया जाता है। पेशेंट की पूरी हिस्ट्री जानने के बाद, आयुर्वेद डॉक्टर दवा का निर्णय लेते हैं और आहार और जीवनशैली में बदलाव करने की सलाह देते हैं। वहीं पीआईडी के पुराने मामलों में, आयुर्वेदिक औषधियों के साथ पंचकर्म चिकित्सा शामिल है। रोगी को हर्बल औषधियों के साथ-साथ पंचकर्म चिकित्सा में उततर बस्ती, अभ्यंग और विरेचन की भी आवश्यकता होती है। जिस तरह एलोपैथी विज्ञान में आईवीएफ एक तरीका है, उसी तरह आयुर्वेद में भी प्राकृतिक इलाज संभव है।

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