चीलाराय - चीफ पेट्रोन ऑफ आसामिज लैंग्वेज, कल्चर एंड ग्रेट असम" का विमोचन

० योगेश भट्ट ० 
नई दिल्ली : प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में 16 वीं शताब्दी में कोच वंश के शासन में मुख्य सेनापति रहे वीर चीलाराय पर लिखी पुस्तक "चीलाराय - चीफ पेट्रोन ऑफ आसामिज लैंग्वेज, कल्चर एंड ग्रेट आसाम" का विमोचन किया गया। इस अवसर पर पुस्तक के लेखक शुभ्रा ज्योति भोराली उपस्थित थे। भोराली की यह पुस्तक वीर चीलाराय पर लिखी उनके समाचार पत्रों में लिखे लेखों का संकलन है। पिछले एक दशक से वह इस पर काम कर रहे हैं और "आसोमी" नामक संस्था के फाउंडर भी है। इस पुस्तक में उन्होंने विस्तार से बताया है कि कैसे चीलाराय ने अपनी शक्ति और निपुणता से कोच वंश का विस्तार किया और पूर्वी भारत का पहला सनातनी हिंदू साम्राज्य स्थापित किया और मुगलों को आगे बढ़ने से रोका।

 कोच वंश का साम्राज्य अभी के असम,मेघालय,मणिपुर,नागालैंड,सिक्किम,भूटान,आधा पश्चिम बंगाल, कुछ हिस्सा अब के बांग्ला- देश,म्यांमार,नेपाल और बंगाल की खाड़ी तक फैला हुआ था। पुस्तक के अनुसार,वीर चीलाराय अपने बड़े भाई नर नारायण (उस समय के शासक) के प्रधान सेनापति थे। कोच वंश के शासन काल में भाषा,संस्कृति,कला और संगीत काफी समृद्ध हुआ। इसका कारण रहा उनकी शिक्ष-दीक्षा सबसे प्राचीन शहर काशी (बनारस) में हुई। इसी दौरान श्रीमंत शंकरदेव के नव वैष्णव आंदोलन का उदय हुआ। यहां तक कि उनके देखरेख में वृंदावनी वस्त्र बनाने का काम हुआ और प्रचलित हुआ। उनके शासन में ही मां कामाख्या मंदिर के ढांचे का नवनिर्माण हुआ।

विमोचन के अवसर पर उपस्थित कोच साम्राज्य के वर्तमान वंशज कुमार जितेंद्र नारायण ने पुस्तक को 16 वीं शताब्दी के कोच साम्राज्य का कागजी दस्तावेज बताया । उन्होंने भारत सरकार से कोच वंश के नाम पर एक कामता पुर राज्य की मांग रखी है। योगी अनिमेष प्रियव्रत ने पुस्तक को चीलाराय का आध्यात्मिक बंधन बताया। नेपाल हिन्दू राष्ट्र पुनर्स्थापना मंच के डॉ.विष्णु प्रसाद बराल ने जोर देकर कहा कि भारत सरकार को कामतापुर की मांग पर विचार करना चाहिए,

खासतौर से कोच वंश के हिस्सा रहे असम और पश्चिम बंगाल के क्षेत्र में। पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी के सांसद डॉ. जयंत कुमार रॉय ने भी इसका समर्थन किया। वहीं असम के करीमगंज के सांसद कृपानाथ मल्लाह ने वीर चीलाराय के द्वारा 6 लाख सेना की कुशलता और साहस को अद्भुत बताया। उन्होंने लेखक भोराली से अनुरोध किया कि इस पुस्तक को हिंदी में भी प्रकाशित करें। जिससे केवल असम ही नहीं,बल्कि बाकी देश और दुनिया भी वीर चीलाराय की कहानी को जान सके।

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