दिल्ली में उत्तराखंडी महिलाएं कोई बड़ा सामाजिक या बौद्धिक नेतृत्व देने या पैदा करने में असफल रही हैं


० योगेश भट्ट ० 
नई दिल्ली। महिला उत्तरजन सोसाइटी, दिल्ली चैप्टर द्वारा अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2026 के उपलक्ष्य में उत्तराखंड की महिलाओं को केंद्र में रखकर यूथ हॉस्टल एसोसिएशन ऑफ इण्डिया, चाणक्यपुरी, नई दिल्ली में एक महिला विमर्श का आयोजन किया गया , जिसमें पैनल चर्चाए उत्तराखंड राज्य के 25 वर्ष : महिलाओं की वास्तविक स्थिति, उपलब्धिया° और चुनौतिया विषय पर केंद्रित थी । इसमें उत्तराखंड राज्य निर्माण के 25 वर्षों में महिलाओं की स्थिति पर चर्चा की गई । 
वास्तविक रूप में स्त्रियां अभी भी न केवल पीछे हैं बल्कि वे असुरक्षा के एक नए संकट का सामना कर रही हैं। इसलिए राज्य में स्त्रियों की सुरक्षा, महिला अपराधों के बढ़ते ग्रॉफ के प्रति स्त्री चिन्ताओं पर बात करना जरूरी था । यह एक गम्भीर मुद्दा है और भविष्य के एक बडे़ खतरे का संकेत है। इस मामले में उत्तराखंड नौ पर्वतीय राज्यों में शीर्ष पर है।
दूसरी चर्चा में दिल्ली में उत्तराखंड मूल की महिलाओं की सामाजिक भागीदारी और सामाजिक नेतृत्व के सवाल को उठाना था। जैसा कि दिल्ली स्थित अधिकांश उत्तराखंडी महिलाए° सांस्वमतिक गतिविधियां में संलग्न हैं, लेकिन वे कोई बड़ा सामाजिक या बौद्धिक नेतृत्व देने या पैदा करने में असफल रही हैं। सामाजिक बदलावा के मूल मुद्दे और स्वर कहीं खो गए हैं। इसलिए यह विमर्श उन्हें सांस्वमतिक भागीदारी से
इतर अगले वैचारिक चरण में ले जाने और भविष्य के लिए 
बौद्धिक नेतृत्व के साथ सामाजिक नेतृत्व के लिए तैयार होने या करने पर केंद्रित होगा ताकि वे आगे चलकर प्रभावी सामाजिक हस्तक्षेप कर सकें।
 आज़ादी के बाद उत्तराखंड मूल की एक बड़ी आबादी दिल्ली में रच-बस तो गई परन्तु आबादी के अनुपात में उनकी सामाजिक या बौद्धिक उपस्थिति बहुत कम नज़र आती है न वह कोई प्रभावी सामाजिक नेतृत्व करती दिखती, न उनका सामाजिक प्रभाव दिखता। दिल्ली में पर्वतीय मूल की महिलाआें की आबादी लगभग 15 लाख के आसपास है इसमें मुख्यधारा में उत्तराखंडी महिला रचनाकारों का सवाल हो या स्त्री विमर्श का। उनकी भी सामाजिक या बौद्धिक उपस्थिति बहुत कम नज़र आती है न वह कोई प्रभावी सामाजिक नेतृत्व करती दिखती, न उनका सामाजिक प्रभाव दिखता।
चर्चा में कहा गया कि अकादमिक जगत से जुड़ी महिलाओं को इन विषयों पर अध्ययन और शोध की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। समाज को उनके रचनात्मक और वैचारिक योगदान और भूमिका की जरूरत है। बौद्धिक नेतृत्व की ही जिम्मेदारी है कि वह समाज के सवालों को उठाए और उनके समाधान के रास्ते सुझाए।
 सवाल इससे भी आगे का है कि जब वर्ष 2027 में संविधान द्वारा नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 लागू होगा और महिलाओं को देश में नेतृत्व करने के अवसर मिलेंगे क्या तब उत्तराखंडी महिलाए° सही अर्थ में नेतृत्व प्रदान करने में समक्ष या समर्थ होंगी या वर्तमान की तरह ही अधकचरा, अपरिपक्व, पिछलग्गू, प्रधानपति जैसा नेतृत्व प्रदान करेंगी।
 जाहिर है कि उत्तराखंडी महिलाए° इसको लेकर बहुत सजग नहीं हैं जबकि सवाल भविष्य के लिए एक नई
महिला शक्ति तैयार करने का है। हमें यह बात नई पीढ़ी की बेटियों के एजेण्डा में लानी होगी। हम यह विषय पिछले वर्ष भी उठा चुके हैं। इसलिए इस विमर्श का मुख्य उद्देश्य उत्तराखंडी महिलाशक्ति का ध्यान इस ओर आकर्षित करना है ताकि वे भविष्य के लिए स्वयं के साथ नई पीढ़ी को तैयार कर सकें और समाज के सरोकारों का सही प्रतिनिधित्व कर सकें। 
इसलिए जरूरी है कि हम इसके लिए अपने महिला नेतृत्व को सामाजिक या बौद्धिक स्तर पर तैयार या विकसित करने के लिए कार्य करें और उनके बीच इस पर बौद्धिक-वैचारिक और रचनात्मक विमर्श हो। सामाजिक नेतृत्व का रास्ता बौद्धिक नेतृत्व से निकलता है। इसलिए उनके बौद्धिक गु्रप भी बनें।
इसके साथ ही नए और मजबूत समाज का निर्माण में लगी उन नायिकाओं की खोज और उन पर चर्चा होगी जो धरातल पर कार्य कर रही हैं और समय में अपनी जगह बना रही हैं। यह नेतृत्व उद्यमिता, उत्पादकता, पर्यावरण, शिक्षा तथा नीति निर्माण आदि क्षेत्रों में दिखाई पड़ रहा है। इसे चि त करने व सामाजिक स्वीवमति दिलाने की आवश्यकता है। कार्यक्रम में  6 महिलाओं को सम्मानित किया गया उत्तराखंड की महिलाएं अपने अपने क्षेत्र में बहुत अच्छा कार्य कर रही हैं और हमारे उत्तराखंड का नाम रोशन कर रही हैं।

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