गाँधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा की दिवंगत मंत्री बीना हांडा की स्मृतियों को समर्पित
० योगेश भट्ट ०
नयी दिल्ली : ‘सुधि न लीनी जब से गये, नैनवा लगाय के’ ये बोल थे दिल्ली के युवा गायक वेदांश मोहन द्वारा प्रस्तुत दादरा के जो श्रोताओं को झूमने को मजबूर कर रहे थे। प्रतिभा सम्पन्न युवा कलाकारों को समर्पित एवं प्राचीन कला केंद्र के सहयोग से आयोजित यह अलग तरह का आयोजन है जो विगत 22 वर्षों से प्रत्येक गांधी हिंदुस्तानी साहित्य सभा के सभागार में आयोजित हो रहा है।प्राचीन कला केंद्र देश की ऐसी अग्रणी संस्था है जो भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रचार-प्रसार में विगत सात दशकों से सतत प्रयत्नशील है तथा देश की कोने-कोने में संगीत के विविध आयोजन करती चली आ रही है। इसी श्रृंखला में दिल्ली में गांधी हिंदुस्तानी साहित्य सभा, राजघाट, नई दिल्ली द्वारा संचालित नवोदित कलाकार समिति एवं प्राचीन कला केन्द्र के संयुक्त तत्वावधान में गाँधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा के सभागार में मासिक संगीत समारोह सम्पन्न हुआ।
यह समारोह गाँधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा की हाल ही में दिवंगत मंत्री बीना हांडा की पावन स्मृतियों को समर्पित था। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि संगीत रसिक सुभाष पलसुले एवं सुप्रसिद्ध तबला वादक पंडित प्रदीप सरकार द्वारा माँ सरस्वती एवं बहन बीना हांडा के चित्र पर माल्यार्पण से हुआ। पंडित ज्ञानेन्द्र शर्मा एवं पंडित प्रदीप सरकार ने मुख्य अतिथि सुभाष पलसुले का पुष्पहार एवं उत्तरीय से सम्मानित किया।
कार्यक्रम के प्रारम्भ में प्रोफेसर रमेश भारद्वाज, पूर्व कुलपति, महर्षि वाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय, कैथल द्वारा बीना हांडा के सांगीतिक समर्पण एवं संगीत के प्रचार - प्रसार में योगदान पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम में तीन प्रस्तुतियाँ सम्पन्न हुईं प्रथम प्रस्तुति थी अमृतेश शांडिल्य के सुयोग्य शिष्य नीरज शर्मा एवं अभिदेव पलसुले का युगल तबला वादन।
कार्यक्रम के प्रारम्भ में प्रोफेसर रमेश भारद्वाज, पूर्व कुलपति, महर्षि वाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय, कैथल द्वारा बीना हांडा के सांगीतिक समर्पण एवं संगीत के प्रचार - प्रसार में योगदान पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम में तीन प्रस्तुतियाँ सम्पन्न हुईं प्रथम प्रस्तुति थी अमृतेश शांडिल्य के सुयोग्य शिष्य नीरज शर्मा एवं अभिदेव पलसुले का युगल तबला वादन।
नीरज और अभिदेव ने तीनताल की सुन्दर अवतारणा करते हुए तीनताल में पेशकार, कायदे, और टुकड़ा आदि प्रस्तुत किये। आपके साथ सारंगी पर अकरम हुसैन ने सुन्दर संगत करके प्रस्तुति को सराहनीय बना दिया। दूसरी प्रस्तुति दिल्ली के होनहार युवा गायक वेदांश मोहन का शास्त्रीय गायन। किराना घराने के मूर्धन्य गायक पंडित जगदीश मोहन के पौत्र वेदांश पंडित मुकुल कुलकर्णी (पुणे) के सुयोग्य हैं।
वेदांश ने राग गोरख कल्याण की सुन्दर अवतारणा करते हुए दो बन्दिश प्रस्तुत कीं। विलंबित एकताल में निबद्ध प्रथम बन्दिश थी ‘धन धन भाग जागे हो, तथा मध्यलय तीनताल में निबद्ध मूर्धन्य संगीत गुरु पंडित अरुण कशालकर ‘रसदास’ द्वारा रचित बन्दिश के बोल थे ‘नैया मोरी कैसे लागे पार’। अपने गायन का समापन राग खमाज में दादरा ‘सुधि न लीनी जब से गये, नैनवा लगाय के’ से किया।
राग की सिलसिलेवार बढ़त, सुन्दर बोल बनाव, हिय लुभावन बहलावे, आकार और स्वर की तैयार तानें श्रोताओं को आनंद प्रदान कर रही थीं। हारमोनियम पर आपके साथ आपके पिता पंडित दीपक शर्मा ने लाजवाब संगत की। तबले पर प्रणय रंजन पाण्डेय की संगत भी सराहनीय थी।
कार्यक्रम की अंतिम प्रस्तुति दिल्ली के प्रतिष्ठित तबला वादक अमृतेश शांडिल्य का एकल तबला वादन। ताल योगी पंडित सुरेश तलवलकर के सुयोग्य शिष्य अमृतेश शाण्डित्य ताल योगी परम्परा के सुयोग्य संवाहक हैं। अमृतेश ने तीनताल में सुन्दर शुभारंभ करके लयदार पेशकार, सुन्दर और विद्वतापूर्ण कायदे और तिहाई आदि प्रस्तुत कीं। प्रत्येक रचना अपनी श्रेष्ठता की कहानी स्वयं बता रही थी। आपके साथ सारंगी पर अकरम हुसैन ने सहयोगात्मक और सधी हुई संगत की।
कार्यक्रम में सभी कलाकारों को पुष्पहार, उत्तरीय एवं ‘कला निधि सम्मान’ से सम्मानित किया। कार्यक्रम का संचालन पंडित देवेन्द्र वर्मा ने किया। बहन कुसुम शाह, पंडित दिशारी चक्रवर्ती, पंडित प्रभाकर पाण्डेय, पंडित प्रसेनजित अधिकारी, पंडित रवीन्द्र सोनी, डा.मधुरलता भटनागर, मालविका मंडल, मालविका भट्टाचार्य, अमित राॅय आदि सदस्यों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को गरिमा प्रदान की।
राग की सिलसिलेवार बढ़त, सुन्दर बोल बनाव, हिय लुभावन बहलावे, आकार और स्वर की तैयार तानें श्रोताओं को आनंद प्रदान कर रही थीं। हारमोनियम पर आपके साथ आपके पिता पंडित दीपक शर्मा ने लाजवाब संगत की। तबले पर प्रणय रंजन पाण्डेय की संगत भी सराहनीय थी।
कार्यक्रम की अंतिम प्रस्तुति दिल्ली के प्रतिष्ठित तबला वादक अमृतेश शांडिल्य का एकल तबला वादन। ताल योगी पंडित सुरेश तलवलकर के सुयोग्य शिष्य अमृतेश शाण्डित्य ताल योगी परम्परा के सुयोग्य संवाहक हैं। अमृतेश ने तीनताल में सुन्दर शुभारंभ करके लयदार पेशकार, सुन्दर और विद्वतापूर्ण कायदे और तिहाई आदि प्रस्तुत कीं। प्रत्येक रचना अपनी श्रेष्ठता की कहानी स्वयं बता रही थी। आपके साथ सारंगी पर अकरम हुसैन ने सहयोगात्मक और सधी हुई संगत की।
कार्यक्रम में सभी कलाकारों को पुष्पहार, उत्तरीय एवं ‘कला निधि सम्मान’ से सम्मानित किया। कार्यक्रम का संचालन पंडित देवेन्द्र वर्मा ने किया। बहन कुसुम शाह, पंडित दिशारी चक्रवर्ती, पंडित प्रभाकर पाण्डेय, पंडित प्रसेनजित अधिकारी, पंडित रवीन्द्र सोनी, डा.मधुरलता भटनागर, मालविका मंडल, मालविका भट्टाचार्य, अमित राॅय आदि सदस्यों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को गरिमा प्रदान की।
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