स्किल आधारित शिक्षा ही विकसित भारत की सबसे बड़ी ताकत बनेगी : प्रो.अशोक कुमार नगावत

इरफ़ान राही ० 
देश की शिक्षा व्यवस्था तेजी से बदलाव के दौर से गुजर रही है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति, उद्योगों की बदलती जरूरतें और नई तकनीकों के आगमन ने उच्च शिक्षा के स्वरूप को नई दिशा दी है। ऐसे समय में दिल्ली कौशल एवं उद्यमिता विश्वविद्यालय (डीएसईयू) कौशल आधारित शिक्षा का एक सशक्त मॉडल बनकर उभरा है। इस परिवर्तन के केंद्र में हैं विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.अशोक कुमार नगावत
प्रो. नगावत देश के प्रतिष्ठित शिक्षाविद्, सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी तथा उच्च शिक्षा और कौशल विकास के क्षेत्र के अनुभवी प्रशासक हैं। उन्हें शिक्षण, अनुसंधान, विश्वविद्यालय प्रशासन और शिक्षा नीति के क्षेत्र में चार दशक से अधिक का अनुभव प्राप्त है। जुलाई 2023 में उन्होंने दिल्ली कौशल एवं उद्यमिता विश्वविद्यालय के कुलपति का कार्यभार संभाला। उनके नेतृत्व में विश्वविद्यालय ने भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए उद्योगों से जुड़ी शिक्षा, कौशल आधारित प्रशिक्षण, अनुसंधान, नवाचार और रोजगारोन्मुख पाठ्यक्रमों को नई गति दी है।
पिछले तीन वर्षों के दौरान प्रो. नगावत ने विश्वविद्यालय के लिए एक दीर्घकालिक रोडमैप तैयार किया, जिसके तहत विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों की मांग का अध्ययन किया गया और उसी के अनुरूप नए पाठ्यक्रम विकसित किए गए। विश्वविद्यालय ने "बी.टेक-एम.टेक इंटीग्रेटेड प्रोग्राम इन इमर्जिंग टेक्नोलॉजीज" जैसे अत्याधुनिक कार्यक्रम शुरू किए हैं। इसके अलावा हॉस्पिटल मैनेजमेंट, मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग, रोबोटिक्स, ऑटोमेशन, हेल्थकेयर, इलेक्ट्रिक व्हीकल, लॉजिस्टिक्स, जेम्स एंड ज्वेलरी सहित अनेक क्षेत्रों में उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप कौशल आधारित शिक्षा उपलब्ध कराई जा रही है।

प्रो. नगावत का स्पष्ट मानना है कि केवल डिग्री देना विश्वविद्यालय का उद्देश्य नहीं होना चाहिए, बल्कि विद्यार्थियों को ऐसा कौशल देना चाहिए जिससे वे रोजगार प्राप्त करने के साथ-साथ स्वयं रोजगार सृजित करने की क्षमता भी विकसित कर सकें। उनका कहना है कि भविष्य उसी का होगा जो लगातार सीखने, स्वयं को नई तकनीकों के अनुरूप ढालने और अपने कौशल को निरंतर निखारने के लिए तैयार रहेगा। प्रस्तुत हैं प्रो. अशोक कुमार नगावत से हुई विशेष बातचीत के प्रमुख अंश।

प्रश्न: पिछले तीन वर्षों में कुलपति के रूप में आपने डीएसईयू के लिए किस प्रकार का विजन तैयार किया है?
उत्तर : जब मैंने विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी संभाली, तब हमारा सबसे बड़ा उद्देश्य यह था कि डीएसईयू को पारंपरिक विश्वविद्यालय नहीं बल्कि भविष्य की अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं के अनुरूप एक कौशल विश्वविद्यालय बनाया जाए। हमने उद्योगों, विशेषज्ञों और रोजगार क्षेत्र की जरूरतों का विस्तृत अध्ययन किया। आज तकनीक हर कुछ वर्षों में बदल रही है, इसलिए विश्वविद्यालयों को भी उतनी ही तेजी से स्वयं को बदलना होगा। हमारा विजन है कि यहां से निकलने वाला प्रत्येक विद्यार्थी केवल डिग्रीधारी नहीं बल्कि उद्योग के लिए तैयार एक दक्ष प्रोफेशनल हो।

प्रश्न: आपने "बी.टेक-एम.टेक इंटीग्रेटेड प्रोग्राम इन इमर्जिंग टेक्नोलॉजीज" जैसे नए पाठ्यक्रम शुरू किए हैं। इसकी सोच क्या रही ?
उत्तर : आने वाला दशक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, डेटा साइंस, साइबर सुरक्षा, ऑटोमेशन और उभरती तकनीकों का दशक होगा। यदि हमारे विश्वविद्यालय आज से इसकी तैयारी नहीं करेंगे तो हमारे विद्यार्थी वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पीछे रह जाएंगे। इसी सोच के साथ हमने ऐसा पाठ्यक्रम तैयार किया है जिसमें विद्यार्थी केवल सैद्धांतिक ज्ञान नहीं, बल्कि आधुनिक तकनीकों पर व्यावहारिक दक्षता भी प्राप्त करें। हमारा प्रयास है कि वे भविष्य की नौकरियों के लिए नहीं बल्कि भविष्य का नेतृत्व करने के लिए तैयार हों।

प्रश्न: आप अक्सर कहते हैं कि शिक्षा ज्ञान देती है और कौशल रोजगार देता है। इसे कैसे समझाया जा सकता है ?
उत्तर : ज्ञान व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता का विकास करता है, लेकिन कौशल उस ज्ञान को व्यवहार में बदलता है। केवल डिग्री किसी को सफल नहीं बनाती। सफलता तब मिलती है जब व्यक्ति अपने ज्ञान को कार्यकुशलता में परिवर्तित कर सके। यदि कोई विद्यार्थी अपनी रुचि के क्षेत्र में लगातार अभ्यास करता है, स्वयं को बेहतर बनाता है और सीखना नहीं छोड़ता, तो वह निश्चित रूप से उत्कृष्टता प्राप्त करता है। आज दुनिया में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिन्होंने अपने कौशल के बल पर नई पहचान बनाई है।

 इसलिए मैं हमेशा कहता हूं कि डिग्री महत्वपूर्ण है, लेकिन कौशल उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण विश्व प्रसिद्ध सैद्धांतिक भौतिक वैज्ञानिक लियोनार्ड सस्काइंड हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने अपने जीवन के शुरुआती दौर में अपने पिता के साथ प्लंबर का काम किया था। आर्थिक परिस्थितियाँ कठिन थीं, लेकिन उन्होंने सीखना नहीं छोड़ा। 

आगे चलकर उन्होंने भौतिकी में उच्च शिक्षा प्राप्त की और दुनिया के महान वैज्ञानिकों में गिने जाने लगे। यह उदाहरण बताता है कि कोई भी काम छोटा नहीं होता और यदि व्यक्ति अपने कौशल को लगातार निखारता रहे तो वह किसी भी क्षेत्र में नई ऊँचाइयाँ हासिल कर सकता है।

प्रश्न: आपने शिक्षकों की भूमिका को लेकर भी कई बार महत्वपूर्ण बातें कही हैं। आप उनसे क्या अपेक्षा रखते हैं ?
उत्तर : शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पढ़ाने वाले व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि वे भविष्य का निर्माण करते हैं। इसलिए उनका निरंतर सीखते रहना अत्यंत आवश्यक है। मैं चाहता हूं कि हमारे शिक्षक उद्योगों, अनुसंधान संस्थानों और नई तकनीकों के साथ लगातार जुड़े रहें। जब शिक्षक स्वयं अपडेट रहेंगे तभी वे विद्यार्थियों को भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप तैयार कर पाएंगे। सीखना केवल विद्यार्थियों के लिए नहीं, बल्कि शिक्षकों के लिए भी आजीवन प्रक्रिया है।

प्रश्न: डीएसईयू में उद्योगों के साथ साझेदारी को कितना महत्व दिया जा रहा है ?
उत्तर : हमारी प्राथमिकता है कि विश्वविद्यालय और उद्योग के बीच की दूरी समाप्त हो। इसी उद्देश्य से विभिन्न औद्योगिक संस्थानों और संगठनों के साथ साझेदारी विकसित की जा रही है। इससे विद्यार्थियों को प्रशिक्षण, इंटर्नशिप, लाइव प्रोजेक्ट और रोजगार के बेहतर अवसर मिलते हैं। जब उद्योग और विश्वविद्यालय साथ मिलकर काम करते हैं तो शिक्षा अधिक प्रासंगिक और परिणामकारी बनती है।

 आज विश्वविद्यालयों को उद्योगों से सीधे जुड़ना होगा। यदि शिक्षा और उद्योग के बीच दूरी रहेगी तो विद्यार्थियों के सामने रोजगार की चुनौती बनी रहेगी। इसी सोच के साथ डीएसईयू ने विभिन्न औद्योगिक संस्थानों के साथ सहयोग बढ़ाया है। जेम्स एंड ज्वेलरी क्षेत्र भारत के प्रमुख निर्यात क्षेत्रों में से एक है और इसमें कुशल मानव संसाधन की लगातार आवश्यकता रहती है। 

इसी उद्देश्य से हमने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ जेम्स एंड ज्वेलरी के साथ भी सहयोग स्थापित किया है, ताकि विद्यार्थियों को इस क्षेत्र की आधुनिक तकनीकों, डिज़ाइन, निर्माण प्रक्रिया और उद्योग की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुरूप प्रशिक्षण मिल सके। हमारा प्रयास है कि हर पाठ्यक्रम सीधे उद्योग की जरूरतों से जुड़ा हो, जिससे विद्यार्थी पढ़ाई पूरी करते ही रोजगार के लिए तैयार हों।

प्रश्न: विद्यार्थियों को व्यवहारिक शिक्षा देने के लिए विश्वविद्यालय ने क्या प्रयास किए हैं ?
उत्तर : आज उद्योग ऐसे युवाओं की मांग कर रहे हैं जिन्हें पहले दिन से काम करना आता हो। इसलिए हमने प्रयोगशालाओं को आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित करने, उद्योगों जैसी कार्यशालाएं विकसित करने और वास्तविक मशीनों पर प्रशिक्षण देने पर विशेष बल दिया है। हमारा उद्देश्य यह है कि विद्यार्थी केवल किताबों से नहीं बल्कि वास्तविक कार्य वातावरण में सीखें।

 अनुभव आधारित शिक्षा ही उन्हें आत्मविश्वासी और रोजगार योग्य बनाती है। मेरा हमेशा से मानना रहा है कि इंजीनियरिंग और कौशल आधारित शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रह सकती। जब तक विद्यार्थी वास्तविक मशीनों, उपकरणों और औद्योगिक तकनीकों पर काम नहीं करेगा, तब तक उसका आत्मविश्वास और दक्षता विकसित नहीं होगी। 

इसी सोच के साथ हमने जी.बी. पंत डीएसईयू परिसर में अत्याधुनिक ऑटोमोटिव मेकाट्रॉनिक्स रिसर्च सेंटर को मजबूत किया है, जहाँ विद्यार्थियों को वास्तविक मर्सिडीज-बेंज कार पर प्रशिक्षण दिया जाता है। इससे उन्हें आधुनिक ऑटोमोबाइल तकनीक, डायग्नोस्टिक्स और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम की व्यावहारिक समझ मिलती है। हमारा उद्देश्य है कि विद्यार्थी जब उद्योग में जाए तो उसे दोबारा प्रशिक्षण की आवश्यकता न पड़े, बल्कि वह पहले दिन से ही दक्ष प्रोफेशनल के रूप में काम कर सके।

प्रश्न: भारत की शिक्षा व्यवस्था में आपको सबसे बड़ी चुनौती क्या दिखाई देती है ?
उत्तर : हमारी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि आज भी अनेक विद्यार्थी अपनी रुचि, क्षमता और स्वाभाविक प्रतिभा को पहचाने बिना केवल सामाजिक दबाव, पारिवारिक अपेक्षाओं या प्रचलित धारणाओं के आधार पर विषय और करियर का चयन कर लेते हैं। शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि प्रत्येक विद्यार्थी की विशिष्ट क्षमता को पहचानकर उसे सही दिशा देना होना चाहिए।

 जब विद्यार्थी अपनी रुचि के अनुरूप शिक्षा और कौशल प्राप्त करता है, तभी वह उत्कृष्ट प्रदर्शन कर पाता है। दुनिया के कई देशों, जैसे जर्मनी, सिंगापुर, स्विट्जरलैंड और दक्षिण कोरिया ने कौशल आधारित शिक्षा को प्राथमिकता देकर अपनी अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। भारत भी राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से उसी दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। मेरा विश्वास है कि कौशल आधारित शिक्षा ही विकसित भारत की मजबूत नींव बनेगी।

दिल्ली कौशल एवं उद्यमिता विश्वविद्यालय में भी हमारा प्रयास है कि विद्यार्थियों को विश्वस्तरीय शिक्षण वातावरण उपलब्ध कराया जाए। इस दिशा में दिल्ली सरकार के नेतृत्व में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और शिक्षा एवं कौशल विकास मंत्री आशीष सूद के सहयोग से विश्वविद्यालय की प्रयोगशालाओं, आधुनिक उपकरणों, बुनियादी ढांचे और विद्यार्थियों को उपलब्ध कराई जाने वाली सुविधाओं को लगातार उन्नत करने की दिशा में कार्य किया जा रहा है। हमारा संकल्प है कि दिल्ली के युवाओं को ऐसी गुणवत्तापूर्ण कौशल आधारित शिक्षा मिले, जिससे वे राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकें।

प्रश्न: विकसित भारत के निर्माण में कौशल आधारित शिक्षा की क्या भूमिका होगी ?
उत्तर : मेरा दृढ़ विश्वास है कि विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब हमारे युवाओं के पास ज्ञान के साथ कौशल भी होगा। भारत दुनिया का सबसे युवा देश है और यही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है। यदि हम प्रत्येक युवा को उसकी क्षमता और रुचि के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण कौशल प्रदान कर दें तो भारत न केवल रोजगार देने वाला बल्कि दुनिया के लिए कुशल मानव संसाधन तैयार करने वाला अग्रणी राष्ट्र बन सकता है।

 डीएसईयू इसी लक्ष्य को लेकर निरंतर कार्य कर रहा है। आज भारत के प्रधानमंत्री ने इसका आगाज किया था स्किल इंडिया और मेक इन इण्डिया जैसी मुहीम चलाकर उसी पथ को सार्थक करने के लिए DSEU प्रत्येक वर्ष 15 हज़ार से अधिक छात्रों को कौशल ट्रेनिंग देकर हम भी अपना योगदान दे रहे हैं।

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