गौ-आधारित जीवन पद्धति को जनांदोलन बनाने का आह्वान : जगदीश मुखी

० योगेश भट्ट ० 
नई दिल्ली। राष्ट्रीय गौधन महासंघ के तत्वावधान में दिल्ली के हौज खास स्थित ‘काउज़ोन’ परिसर में आगामी गौधन दीपावली मेला 2026 के आयोजन को लेकर एक बैठक आयोजित की गई। बैठक में 1 नवंबर से 7 नवंबर, 2026 तक आयोजित होने वाले इस राष्ट्रीय आयोजन की रूपरेखा, जनसहभागिता, गौ-संरक्षण, स्वदेशी अर्थव्यवस्था तथा पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विभिन्न आयामों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया।

बैठक में असम के पूर्व राज्यपाल प्रोफेसर जगदीश मुखी, राष्ट्र सेविका समिति की दिल्ली प्रांत संचालिका प्रोफेसर चारू भसीन कालरा, राष्ट्रीय गौधन महासंघ के मुख्य संयोजक विजय खुराना, नरेंद्र चावला, मदन लाल एन.सी. वाधवा तथा पूर्व विधायक राजेश सहित अनेक लोग उपस्थित रहे। पूर्व राज्यपाल प्रोफेसर जगदीश मुखी ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक और आर्थिक संरचना में गौ आधारित जीवन पद्धति का विशेष महत्व रहा है।

 उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में पर्यावरण संकट, प्रदूषण और रासायनिक खेती से उत्पन्न चुनौतियों के बीच गौ-आधारित प्राकृतिक जीवनशैली एक प्रभावी विकल्प के रूप में उभर रही है। उन्होंने कहा कि गौ-धन की जिस प्रकार उपेक्षा हो रही है, आने वाले समय में दूध से ज्यादा अभाव गोमूत्र का होगा। गोमूत्र औषधिय दृष्टि से जीवनदायिनी है। उन्होंने समाज के सभी वर्गों से इस अभियान को जनांदोलन का स्वरूप देने का आह्वान किया।

राष्ट्रीय गौधन महासंघ के मुख्य संयोजक विजय खुराना ने कहा कि गौधन दीपावली मेला 2026 केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत, पर्यावरण संरक्षण और रोजगार सृजन का व्यापक अभियान है। उन्होंने बताया कि गोबर आधारित उत्पाद, जैविक खेती, पंचगव्य, काउ डंग ब्रिकेटिंग मशीन तथा गौ-आधारित ऊर्जा मॉडल आज ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती प्रदान कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि महासंघ का उद्देश्य गौशालाओं को आत्मनिर्भर आर्थिक मॉडल के रूप में विकसित करना है, जिससे लाखों लोगों को रोजगार के अवसर प्राप्त हो सकें।

प्रोफेसर चारू भसीन कालरा ने कहा कि भारतीय संस्कृति में गौ केवल एक पशु नहीं, बल्कि जीवन, प्रकृति और संवेदना की प्रतीक है। उन्होंने कहा कि गौ-संरक्षण का विषय सामाजिक चेतना, पारिवारिक संस्कार और पर्यावरणीय संतुलन से गहराई से जुड़ा हुआ है। उन्होंने महिलाओं और युवाओं की सक्रिय भागीदारी पर बल देते हुए कहा कि ऐसे आयोजनों के माध्यम से समाज में सेवा, संवेदनशीलता और स्वदेशी जीवनशैली के प्रति जागरूकता को नई दिशा मिलती है।

बैठक में मेले के दौरान आयोजित होने वाली प्रदर्शनी, जनजागरूकता अभियान, स्वदेशी उत्पादों के प्रदर्शन, गौ-आधारित नवाचारों तथा युवाओं और महिलाओं की भागीदारी को लेकर रणनीति तैयार की गई। आयोजनकर्ताओं के अनुसार यह मेला गौ-संरक्षण, पर्यावरण संतुलन और स्वदेशी अर्थव्यवस्था को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाने का एक महत्वपूर्ण प्रयास सिद्ध होगा।

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