जन शिक्षा के लिए राजनीतिक दलों और मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण~उपराष्ट्रपति


नयी दिल्ली - चुनाव की First Past The Post प्रणाली की सीमाओं पर चर्चा करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि इस प्रणाली के तहत 50% से बहुत कम मत पाने वाले भी चुन लिए जाते हैं जिससे संसदीय प्रशासन के प्रतिनिधि चरित्र पर प्रश्नचिन्ह लगता रहा है। उपराष्ट्रपति ने संतोष व्यक्त किया कि 17वीं लोकसभा के लिए चुने गये काफी सदस्यों को 50% से अधिक मत प्राप्त हुए हैं।



उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने कहा कि एक प्रबुद्ध जनमत स्वस्थ लोकतंत्र की आवश्यक शर्त है। उन्होंने जन शिक्षा के लिए मीडिया तथा राजनीतिक दलों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए खेद जताया कि दोनों ही संस्थाओं ने अपनी भूमिका का पूरी तरह से निर्वहन नहीं किया है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों को सतत जनसंपर्क के माध्यम से जनचेतना बढ़ानी चाहिए - जनअपेक्षाओं को विधायी कार्य में प्रतिबिंबित करना चाहिए। उन्होंने सतत जनचेतना और जनशिक्षण में मीडिया की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।


उपराष्ट्रपति भारत में विधायी निकायों पर दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा अरुण जेटली की स्मृति में आयोजित व्याख्यानमाला का प्रथम व्याख्यान दे रहे थे।


     उपराष्ट्रपति ने कहा कि यद्यपि वर्ष 1952 से ही निरंतर चुनावों में मतदाताओं की संख्या में वृद्धि हो रही है, तथापि पुरातनपंथी पहचान आधारित राजनीति से हटकर विकासवादी राजनीति को प्राथमिकता देने के लिए नव जनचेतना की आवश्यकता है। उन्होंने विधायी निकायों तथा जनता के बीच सतत द्विपक्षीय संपर्क और संवाद स्थापित करने के लिए नई सूचना प्रौद्योगिकी का कारगर प्रयोग करने का सुझाव भी दिया।


     संविधान संशोधन के लिए संसद में निहित शक्तियों का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि विधायिका और न्यायपालिका के बीच लंबे असहज विमर्श के बाद वर्ष 1973 में केशवानंद भारती केस में उच्चतम न्यायालय की पूर्ण पीठ ने संविधान के मूल चरित्र को अक्षुण्ण रखे जाने के पक्ष में अपना फैसला सुनाया था। यद्यपि उच्चतम न्यायालय ने मूल चरित्र को परिभाषित नहीं किया था, लेकिन डीडी बसु जैसे संविधान विशेषज्ञों ने संविधान के 20 ऐसे तत्व इंगित किये थे जो उसके मूल चरित्र को परिभाषित करते हैं। कुछ वर्गों द्वारा राष्ट्रपति प्रणाली की वकालत किये जाने का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि जरूरी यह है कि सभी भागीदार संसदीय निकायों को सुचारु रूप से सफलतापूर्वक चलने दें और सुनिश्चित करें कि इसके लाभ आम जनता तक पहुंचे।


     उपराष्ट्रपति ने कहा कि लोकतांत्रिक प्रणाली की सफलता के लिए चार तत्व आवश्यक हैं - बहुमत का शासन, अल्पमत के अधिकारों का संरक्षण, संवैधानिक प्रशासन तथा सौहार्दपूर्ण गंभीर विचार-विमर्श। उन्होंने कहा कि विधायी निकायों पर जनता का विश्वास तभी बढ़ता है जब ये संस्थाएं उनकी अपेक्षाओं के प्रति उत्तरदायी होती हैं। जनता जनप्रतिनिधियों के आचरण को भी देखती है।


     संसदीय लोकतंत्र के सामने मौजूद चुनौतियों का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने सदन की घटती बैठकों, बढ़ते व्यवधानों, बहस के गिरते स्तर, आपराधिक रिकॉर्ड वाले जन प्रतिनिधि, महिलाओं के सीमित प्रतिनिधित्व, चुनाव में धनबल और बाहुबल के बढ़ते इस्‍तेमाल, राजनीतिक दलों में आतंरिक लोकतंत्र की कमी पर चिंता व्यक्त की।


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