कैट ने एमनेस्टी स्कीम लाने का आग्रह किया

अनाधिकृत कालोनियों के नियमितीकरण की तर्ज पर सरकार एक कट ऑफ तिथि के साथ एक एमनेस्टी स्कीम ला सकती है जिसमें कटऑफ डेट पर यथास्थिति बनाए रखने का प्रावधान हो और इस तिथि के अंतर्गत आने वाले व्यापारियों पर कोई भी कार्रवाई  हो बल्कि यदि कोई कार्रवाई हुई है तो उसको ठीक कर कट ऑफ़ डेट की वास्तविक स्तिथि पर लाया जाए 



एमनेस्टी स्कीम के अंतर्गत आने वाली ऐसी दुकान / क्षेत्रों के लिए विकास मानदंड अलग से तय किए जा सकते हैं और एमनेस्टी स्कीम का लाभ उठाने के लिए उचित शुल्क भी निर्धारित किए जा सकते हैं  पहले से ही सील की गई दुकानों को दिल्ली के कारोबार में सामान्य स्थिति में लाने के लिए डी-सीलिंग की अनुमति दी जा सकती है।सरकार का यह कदम निश्चित रूप से दिल्ली के व्यापारियों को एक बड़ी राहत देगा और सरकार को कोई राजस्व नुकसान नहीं होगा तथा किसी कानून का उल्लंघन नहीं होगा और व्यापारी सीलिंग के जबड़े से मुक्त हो सकेंगे !


केंद्रीय शहरी विकास मंत्री हरदीप पुरी को भेजे गए एक पत्र में कन्फेडरेशन ऑफ़ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट ) ने दिल्ली के व्यापारियों को सीलिंग की मार से बचाने के लिए एक एमनेस्टी योजना के लिए आग्रह किया है।कैट ने अपने पत्र में  ने दिल्ली में व्यापार के सुनियोजित विकास की विफलता के लिए पिछली सरकारों द्वारा पूर्व मास्टर प्लान के विभिन्न प्रावधानों के समय पर कार्यान्वयन न करने एवं  में अधिकारियों के लापरवाह रवैय्ये को जिम्मेदार ठहराया है जिसके कारण दिल्ली के व्यापारी सीलिंग के दुष्चक्र में फंस गए है !


कैट के राष्ट्रीय महामंत्री प्रवीन खंडेलवाल ने कहा कि दिल्ली के व्यापारियों को वर्ष 2006 से सीलिंग का बड़ा सामना करना पड़ रहा है, हालांकि केंद्र सरकार ने सीलिंग मुद्दे को सुलझाने के लिए वर्ष 2014 से हर प्रयास किया और काफी विषय बहुत हद तक हल हो गए किन्तु दिल्ली के सभी हिस्सों के व्यापारियों पर सीलिंग की तलवार हमेशा लटकी रहती है। पहले के मास्टर प्लान्स को समय पर लागू न करने और अधिकारियों और पिछली सरकारों के ढुलमुल रवैये के कारण दिल्ली के व्यापारियों ने दिल्ली के लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपने स्तर पर ही व्यापार का विकास किया जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण शहरी विकास मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव द्वारा वर्ष  2008 में सुप्रीम कोर्ट में दिया गया एक हलफनामा है जिसमें स्वीकार किया गया था कि विभिन्न एजेंसियां पिछले चार दशकों में दिल्ली में केवल 16% वाणिज्यिक स्थान विकसित कर सकी है और इसलिए बचे   84% वाणिज्यिक स्थान दिल्ली के बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए व्यापारियों द्वारा अपने दम बनाया है । बेहद आश्चर्य है की  दिल्ली के विकास में व्यापारियों के योगदान को महसूस किए बिना दुकानों की सीलिंग की प्रक्रिया वर्ष 2006 में शुरू हुई और जो अभी भी जारी है। दिल्ली का व्यापार बहुत नष्ट हो गया है। मॉनिटरिंग कमेटी के बहुत ही अड़ियल और मनमाने रवैये के कारण हजारों दुकानें अभी भी सील हैं और उनकी  सील खुलने की उम्मीद न के बराबर है। दिल्ली का पूरा व्यापार चौपट हो गया है । यहां तक कि पिछले वर्षों में केंद्र सरकार  द्वारा दी गई विभिन्न राहतें भी समय-समय पर लागू नहीं की गई हैं क्योंकि हर बार निगरानी समिति ने अधिकारियों को केंद्र सरकार के आदेश को पालन करने से रोका है ! सीलिंग के कारण दिल्ली के बाजारों में अत्यधिक अस्त-व्यस्ततता के कारण व्यापारियों को बहुत नुकसान हो रहा है।


 


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