पलायन रोका जा सकता है,धरती सोना उगल सकती है यदि हाथ सबल हों



विजय सिंह बिष्ट
उत्तराखंड की धरती में यदि काम करने वाले परिश्रमी हों तो धनार्जन के लिए शहरों की ओर उन्मुख होना आवश्यक नहीं है।उत्तराखंड की धरती में नकदी फसलों के रूप में मिर्च,चौलाई, और सोयाबीन को प्रमुखता से पैदा किया जाय तो, छः माह में आदमी हजारों रुपए कमा सकता है।


वेदीखाल*क्षेत्र बीरोंखाल ग्राम भरपूर छोटा में श्रीमती हिमानी रावत एक कुशल गृहिणी है।वह अपने परिवार में सास ससुर के साथ घर में खेती पाती करती है। ड्राइवर मोहन सिंह अपनी टैक्सी चलाते थे और अब अपनी खेती पाती में जुड़ गए हैं। ऐसा इसलिए कि जितना ड्राइवरी में नहीं निकलता अपने खेतों में मेहनत करके निकल आता है। इनके खेत में मिर्चो की लहलहाती फसल को देखकर कितने आनंद की अनुभूति होती है। ऐसे यदि इनके चार खेतों में मिर्ची लगी हो और सुखाने पर वह एक क्विटल निकल आए तो तीन सौ रुपए किलो बिकने वाली मिर्ची से कितना लाभ होगा।


ऐसे ही सोयाबीन भी  पिछले सालों अस्सी रुपए किलो के भाव गया था अब बढ़कर ही जायेगा। चौलाई का भाव भी चालीस रुपए किलो के लगभग होता है। ये सारी फसलें बरसाती फसलें है। इसमें छोटा सा छोटा किसान वर्ष भर में पच्चास हजार रुपए कमा सकता है। उत्तराखंड की मिर्चे देश के अन्य भागों की मिर्च से तीखी होती हैं, इसलिए इनका उपयोग अश्रुगैस के रूप में किया जाता है अथवा अरब देशों में इसकी मांग अधिक होती है।


हमारी उत्तराखंड सरकार यदि वन्य जीवों बंदरों और सुअरों की रोक थाम के कारगर उपाय करने में सहायता करे तो उत्तराखंड की हजारों हजार कीमती फसलों से किसानों को लाभ पहुंचाया जा सकता है और नवयुवकों का रुझान किसानी की ओर आकर्षित कर पलायन को स्वत:रोका जा सकता है। इसका जीता जागता उदाहरण श्रीमती हिमानी रावत की कार्यप्रणाली से लिया जा सकता है। उससे भी आगे कुछ लोग प्रचुर मात्रा में खेती से जुड़े हैं।


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