“पीयूष रंग महोत्सव” नाटकों के मंचन के साथ सम्मान समारोह

० योगेश भट्ट ० 
नई दिल्ली। मंडी हाउस स्थित श्रीराम सेंटर में स्वर्गीय पद्मभूषण पीयूष पांडे की 71वीं जयंती के अवसर पर आयोजित “पीयूष रंग महोत्सव” का समापन एक सशक्त नाट्य प्रस्तुति के साथ हुआ। इस अवसर पर रमा पांडे द्वारा लिखित एवं निर्देशित नाटक ‘ठाकुर ज़ालिम सिंह’ का मंचन किया गया। इस महोत्सव का आयोजन रतनव (रामा थिएटर नाट्य विद्या) द्वारा किया गया।
नाटक का मूल भाव भगवद्गीता के प्रसिद्ध संदेश—“कर्म करते जाओ, फल की इच्छा मत करो”—से प्रेरित है। यह कथा दर्शाती है कि सही कर्म का बीज बोना ही मनुष्य का धर्म है, जबकि परिणाम की लालसा अक्सर उसके पतन का कारण बनती है। ‘ठाकुर ज़ालिम सिंह’ एक सशक्त कथा है, जो राजस्थान के एक निर्दयी शासक के जीवन के माध्यम से लोभ, सत्ता और परिवर्तन की संभावनाओं को सामने लाती है। नायक करुणा, न्याय और संतुलन के मार्ग पर चलता है। यह प्रश्न नाटक के केंद्र में है—क्या एक खलनायक को आत्मपरिवर्तन का अवसर मिल सकता है, या वह अपने ही अंधकार में खो जाता है ?
महोत्सव के पहले दिन ‘दरख़्त-ए-आज़ाद-ए-हिंद’ का मंचन हुआ। इस अवसर पर दो विशिष्ट सम्मानों से भी गणमान्य व्यक्तियों को अलंकृत किया गया। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) के सदस्य सचिव सचिदानंद जोशी को भारतीय संस्कृति के संरक्षण में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए ‘संस्कृतश्री फॉर प्रेज़र्विंग कल्चर ऑफ इंडिया’ सम्मान प्रदान किया गया। वहीं, 99 वर्षीय पद्मश्री शीला झुनझुनवाला को उनके साहित्यिक अवदान के लिए ‘साहित्यश्री’ सम्मान से सम्मानित किया गया।
पीयूष रंग महोत्सव पर बोलते हुए रमा पांडे ने कहा “हर खूबसूरत पल अंततः अपनी पूर्णता तक पहुँचता है, और यह ‘पीयूष रंग महोत्सव’ भी आज एक मधुर स्मृति बनकर हमारे हृदयों में बस गया है। यह महोत्सव मेरे प्रिय भाई पीयूष पांडे की यादों, उनके विचारों और उनके सृजनात्मक दृष्टिकोण को समर्पित एक भावनात्मक यात्रा रहा। 
हम अगले वर्ष फिर इसी उत्साह और नई ऊर्जा के साथ ‘पीयूष रंग महोत्सव’ लेकर लौटेंगे, जहाँ हम मिलकर कला और संस्कृति के सुरों को एक करेंगे—‘मिले सुर मेरा तुम्हारा, तो सुर बने हमारा।’ हमारा प्रयास रहेगा कि ग्रामीण परंपराओं और लोक कथाओं को राष्ट्रीय रंगमंच तक लाकर उन्हें नई पहचान और सम्मान दिया जाए।

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