शिक्षा का वास्तविक अर्थ किसी बंद कमरे में दी जाने वाली किताबी सीख या ज्ञान का नाम नहीं है
० श्याम कुमार कोलारे ०
शिक्षा केवल किसी बंद कमरे में दी जाने वाली किताबी सीख या ज्ञान का नाम नहीं है, बल्कि यह जीवन को सुसज्जित, नैतिक और सार्थक ढंग से जीने की कला है। शिक्षा मनुष्य को समाज में अपनी अलग पहचान बनाने के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देने योग्य बनाती है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य क्या होना चाहिए और आज समाज में शिक्षा की स्थिति क्या है?
महात्मा गांधी के अनुसार, “साक्षरता न तो शिक्षा का अंत है और न ही प्रारंभ।” उनके लिए शिक्षा का अर्थ केवल पढ़ना-लिखना नहीं था, बल्कि मनुष्य के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास का समन्वित माध्यम था। हमारी पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था में लंबे समय तक बच्चों को केवल एक उत्पाद की तरह देखा गया, जिसका उद्देश्य भविष्य की नौकरी के लिए तैयार होना भर था। इस प्रक्रिया में उनकी प्राकृतिक प्रतिभा, रचनात्मकता और परिवेश को काफी हद तक नज़रअंदाज़ कर दिया गया।
शिक्षा केवल किसी बंद कमरे में दी जाने वाली किताबी सीख या ज्ञान का नाम नहीं है, बल्कि यह जीवन को सुसज्जित, नैतिक और सार्थक ढंग से जीने की कला है। शिक्षा मनुष्य को समाज में अपनी अलग पहचान बनाने के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देने योग्य बनाती है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य क्या होना चाहिए और आज समाज में शिक्षा की स्थिति क्या है?
भारत जैसे सांस्कृतिक, सामाजिक विविधताओं और लोकतांत्रिक मूल्यों वाले देश में शिक्षा का सही अर्थ क्या होना चाहिए? हमें यह समझना होगा कि शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं रह सकती। हमें विद्यालयी शिक्षा की वर्तमान कमियों, बच्चों की वास्तविक आवश्यकताओं और उन्हें बेहतर बनाने के उपायों पर गंभीरता से विचार करना होगा, ताकि शिक्षा वास्तव में समाज को सकारात्मक दिशा दे सके।
महात्मा गांधी के अनुसार, “साक्षरता न तो शिक्षा का अंत है और न ही प्रारंभ।” उनके लिए शिक्षा का अर्थ केवल पढ़ना-लिखना नहीं था, बल्कि मनुष्य के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास का समन्वित माध्यम था। हमारी पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था में लंबे समय तक बच्चों को केवल एक उत्पाद की तरह देखा गया, जिसका उद्देश्य भविष्य की नौकरी के लिए तैयार होना भर था। इस प्रक्रिया में उनकी प्राकृतिक प्रतिभा, रचनात्मकता और परिवेश को काफी हद तक नज़रअंदाज़ कर दिया गया।
शिक्षा परीक्षा और कक्षा-कक्ष की चारदीवारी तक सीमित होकर रह गई। जमीनी हकीकत यह है कि आज भी अनेक विद्यालयों में नीतियाँ केवल कागज़ों तक सीमित हैं। शिक्षक बच्चों को समझ विकसित करने के बजाय रटने पर अधिक जोर देते हैं और अच्छे अंकों की दौड़ में शामिल कर देते हैं। पूरा शिक्षा तंत्र, अभिभावक और समाज नौकरी तथा अंकों की प्रतिस्पर्धा में उलझे हुए दिखाई देते हैं।
इस दौड़ में चिंतनशीलता, संवेदनशीलता, सामाजिक उत्तरदायित्व और समाज से जुड़ाव जैसे महत्वपूर्ण मूल्य पीछे छूटते जा रहे हैं। विद्यालय, जो बच्चों के आनंदमय सीखने के केंद्र होने चाहिए, धीरे-धीरे भय और दबाव के स्थान बनते जा रहे हैं। कई बच्चे कक्षा की चारदीवारी के भीतर घुटन महसूस करते हैं और उनका विद्यालय के प्रति आकर्षण कम होता जा रहा है। इससे स्पष्ट होता है कि पारंपरिक शिक्षा बच्चों को वास्तविक अर्थों में शिक्षित करने के बजाय केवल साक्षर बना रही है।
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF) में शिक्षा के जिन नौ लक्ष्यों की चर्चा की गई है, वे रटने वाली शिक्षा के बजाय बच्चे के समग्र विकास पर बल देते हैं। इसका उद्देश्य बच्चों को उनके आसपास के वातावरण से जोड़ना, उनकी समझ विकसित करना और उन्हें आत्मज्ञान की ओर प्रेरित करना है। शिक्षा ऐसी हो जो बच्चों को स्वयं को पहचानने, अपनी क्षमताओं को समझने और जीवनभर सीखते रहने की प्रेरणा दे।
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF) में शिक्षा के जिन नौ लक्ष्यों की चर्चा की गई है, वे रटने वाली शिक्षा के बजाय बच्चे के समग्र विकास पर बल देते हैं। इसका उद्देश्य बच्चों को उनके आसपास के वातावरण से जोड़ना, उनकी समझ विकसित करना और उन्हें आत्मज्ञान की ओर प्रेरित करना है। शिक्षा ऐसी हो जो बच्चों को स्वयं को पहचानने, अपनी क्षमताओं को समझने और जीवनभर सीखते रहने की प्रेरणा दे।
मूल्य शिक्षा को अलग विषय के रूप में नहीं, बल्कि संपूर्ण शिक्षण प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। बच्चों में सांस्कृतिक विविधता के प्रति सम्मान, विभिन्न जीवन-शैलियों के प्रति संवेदनशीलता तथा लोकतांत्रिक मूल्यों का विकास होना चाहिए। प्रत्येक बच्चे की विशिष्ट प्रतिभा और क्षमता को पहचानकर उसे अभिव्यक्ति का अवसर दिया जाना चाहिए, ताकि समाज व्यक्तिगत भिन्नताओं के महत्व को स्वीकार कर सके।
ज्ञान के वैज्ञानिक और वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण के साथ-साथ साहित्य, कला और रचनात्मकता को भी शिक्षा का अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए। इससे सीखने-सिखाने का वातावरण अधिक सकारात्मक और जीवंत बन सकता है, जिसमें बच्चों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित हो। साथ ही बच्चों में देश के प्रति गर्व और जुड़ाव की भावना भी विकसित होनी चाहिए।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने शिक्षा को अधिक व्यावहारिक, समावेशी और बाल-केंद्रित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किए हैं। इसमें खेल आधारित और भयमुक्त शिक्षा पर विशेष बल दिया गया है। बच्चों की बुनियादी दक्षताओं को मजबूत करने के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा (ECCE) को प्राथमिकता दी गई है, ताकि बच्चे मजबूत आधार के साथ विद्यालयी जीवन में प्रवेश कर सकें।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने शिक्षा को अधिक व्यावहारिक, समावेशी और बाल-केंद्रित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किए हैं। इसमें खेल आधारित और भयमुक्त शिक्षा पर विशेष बल दिया गया है। बच्चों की बुनियादी दक्षताओं को मजबूत करने के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा (ECCE) को प्राथमिकता दी गई है, ताकि बच्चे मजबूत आधार के साथ विद्यालयी जीवन में प्रवेश कर सकें।
शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो बच्चों को केवल नौकरी पाने योग्य ही नहीं, बल्कि उद्यमी, नवाचारी और आत्मनिर्भर भी बनाए। शिक्षा का अंतिम लक्ष्य केवल साक्षर बनना या डिग्री प्राप्त करना नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और आत्मनिर्भरता होना चाहिए। स्वामी विवेकानंद के अनुसार, शिक्षा मनुष्य के अंतर्निहित गुणों का प्रकटीकरण करती है। उनके विचार में समस्त ज्ञान मनुष्य के भीतर निहित होता है और शिक्षा उस ज्ञान पर पड़े आवरण को हटाने का कार्य करती है।
जैसे न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत खोजा, वैसे ही प्रत्येक मनुष्य के भीतर असीम संभावनाएँ विद्यमान हैं। शिक्षा का कार्य उन संभावनाओं को पहचानना और विकसित करना है। शिक्षा जन-जन के लिए सुलभ होनी चाहिए। शिक्षक का कार्य शिक्षार्थी को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि उसके मार्ग की बाधाओं को दूर करना है। शिक्षण सेवा का कार्य है, इसलिए शिक्षकों को नाम, धन और यश से ऊपर उठकर निस्वार्थ भाव से अपना दायित्व निभाना चाहिए। स्वामी विवेकानंद का मानना था कि शिक्षण में स्वार्थ प्रवेश कर जाए तो उसके वास्तविक उद्देश्य की प्राप्ति नहीं हो सकती।
साथ ही, जिस प्रकार पुत्रों को शिक्षा देना आवश्यक है, उसी प्रकार पुत्रियों की शिक्षा भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। समाज अक्सर लड़कियों को प्रारंभ से ही दूसरों पर निर्भर रहने की मानसिकता देता है, जबकि उन्हें आत्मनिर्भर, विवेकशील और निर्णय लेने में सक्षम बनाया जाना चाहिए। उन्हें धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ भाषा, गणित, विज्ञान, इतिहास, गृह-व्यवस्था, शिल्प और जीवनोपयोगी कौशलों की शिक्षा भी मिलनी चाहिए, ताकि वे अपने जीवन की चुनौतियों का सामना आत्मविश्वास के साथ कर सकें।
शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि ऐसे जागरूक, संवेदनशील, नैतिक और आत्मनिर्भर नागरिकों का निर्माण करना है जो स्वयं के विकास के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के उत्थान में भी सक्रिय भूमिका निभा सकें। यही शिक्षा का वास्तविक अर्थ और उसका सर्वोच्च लक्ष्य है।

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