बच्चे पढ़ना अक्षरों से नहीं, बल्कि अर्थ और अनुभव से शुरू करते हैं

० श्याम कुमार कोलारे ० 
बच्चों की सीखने की प्रक्रिया उसके घर से ही शुरू ही जाती है एक वर्ष की उम्र से ही वह भाषा पहचानने लगता है एवं बोले हाए शब्दों को समझ कर उसका कुछ उत्तर या प्रतिक्रिया देना शुरू कर देता है, उसका यह प्रतिक्रिया हँसना, मुस्कुराना, पलके झपकना, या कुछ शब्दों या वर्णों में हो सकता है, समय के साथ बच्चों की समझ बढ़ते जाती है। विद्यालय आने से पहले ही बच्चा अपने घर, परिवार और आसपास के वातावरण से बहुत कुछ सीख चुका होता है।

 स्कूल उन सभी पूर्व अनुभवों को एक आकार प्रदान करता है। बच्चा लोगों की बातचीत सुनता है, शब्दों का अर्थ समझता है, अपनी बात कहता है, कहानी सुनता है, गीत गाता है, चित्र पहचानता है और अपने आसपास लिखी हुई कई चीजों को देखकर पहचानना शुरू कर देता है। इसलिए बच्चे को पढ़ना सिखाने की शुरुआत उसके पहले से मौजूद अनुभवों और समझ से ही होनी चाहिए।

पढ़ना केवल अक्षरों को पहचान लेना नहीं है, बल्कि लिखे हुए शब्दों और वाक्यों का अर्थ समझना है। जब बच्चा पढ़े हुए को अपने अनुभव से जोड़ पाता है, तभी पढ़ना उसके लिए अर्थपूर्ण बनता है। बच्चे पढ़ना कैसे सीखते हैं, इसे समझने के लिए सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि बच्चे की भाषा ही उसकी सीखने की पहली सीढ़ी है। घर में बच्चा जिस भाषा में बातचीत करता है, उसी भाषा के माध्यम से वह अपने आसपास की दुनिया को समझता है। 

वह जानता है कि पानी क्या है, खाना क्या है, गेंद क्या है, माँ कौन है, खेलना क्या है और स्कूल क्या है। हो सकता है कि वह इन चीजों के नाम हिन्दी में न जानता हो, लेकिन अपनी भाषा में उनका अर्थ और उपयोग अच्छी तरह समझता है। इसलिए जब उसे हिन्दी पढ़ना सिखाया जाता है तो शिक्षक को उसकी पहले से बनी समझ को हिन्दी के शब्दों और वाक्यों से जोड़ना चाहिए। बच्चे की भाषा को हटाकर नई भाषा सिखाने के बजाय उसकी भाषा को पुल बनाना अधिक प्रभावी तरीका है।

 पढ़ना सीखने की प्रक्रिया सुनने और बोलने से शुरू होती है। बच्चा पहले भाषा सुनता है, फिर उसे समझता है और धीरे-धीरे बोलना सीखता है। इसी तरह पढ़ते समय भी बच्चे को पहले शब्दों और वाक्यों का अर्थ समझने का अवसर चाहिए। यदि बच्चा किसी कहानी को सुनकर समझ चुका है, तो उसी कहानी को पढ़ने में उसके लिए आसानी होती है। उदाहरण के लिए, यदि शिक्षक बच्चों को “बंदर और टोपीवाला” जैसी परिचित कहानी पहले सुनाता है और बाद में उसी कहानी का छोटा पाठ बच्चों के सामने रखता है,
तो बच्चे पहले से कहानी जानते होने के कारण लिखे हुए शब्दों को अर्थ से जोड़ पाएँगे। इस तरह पढ़ना केवल अक्षर पहचानने का अभ्यास नहीं रह जाएगा, बल्कि अर्थ समझने की प्रक्रिया बन जाएगा।
बच्चे को पढ़ना सिखाते समय उसके आसपास के अनुभवों का उपयोग करना बहुत जरूरी है। छोटे बच्चे किसी बिस्किट के पैकेट, दुकान के बोर्ड, बस के नाम या किसी परिचित वस्तु को देखकर पहचान लेते हैं। वे हर अक्षर नहीं पढ़ पाते, फिर भी चित्र, रंग, आकार और अपने अनुभव के आधार पर समझ लेते हैं कि वह वस्तु क्या है। 

यह इस बात का संकेत है कि बच्चे लिखित भाषा को उसके संदर्भ के साथ समझना शुरू कर देते हैं। शिक्षक इस क्षमता को आगे बढ़ा सकता है। कक्षा में बच्चों के नाम, वस्तुओं के नाम, चित्रों के साथ शब्द, छोटे वाक्य और बच्चों के बनाए चित्र लगाए जा सकते हैं। जब बच्चा रोज इन्हें देखता है, सुनता है और इनके बारे में बातचीत करता है, तो धीरे-धीरे उसका शब्दों से परिचय बढ़ता है। प्रभावी पढ़ने के लिए कक्षा में ऐसा वातावरण होना चाहिए जहाँ बच्चे को पढ़ने की सामग्री लगातार दिखाई दे। इसे प्रिंट-रिच वातावरण कहा जाता है। लेकिन इसका अर्थ केवल दीवारों पर बहुत सारे शब्द लिख देना नहीं है।

 सामग्री ऐसी होनी चाहिए जो बच्चों के जीवन और अनुभवों से जुड़ी हो। जैसे कक्षा में “दरवाजा”, “खिड़की”, “किताब”, “कुर्सी”, “पानी” आदि शब्द चित्रों के साथ लगाए जा सकते हैं। बच्चों के नाम और उनके चित्र लगाए जा सकते हैं। बच्चे अपने बनाए चित्रों के नीचे एक-दो शब्द या वाक्य लिख सकते हैं। धीरे-धीरे बच्चे यह समझने लगते हैं कि लिखे हुए शब्द किसी अर्थ को व्यक्त करते हैं।

बच्चों को पढ़ना सीखने में कहानी, गीत, कविता, पहेली और खेल बहुत मदद करते हैं। बच्चा जिस भाषा में कहानी सुनता है, उस कहानी को बाद में लिखित रूप में पढ़ना उसके लिए आसान होता है। पढ़ना सीखने में चित्रों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। चित्र बच्चे को शब्द का अर्थ समझने में सहायता करते हैं। शिक्षक किसी चित्र को दिखाकर बच्चों से पूछ सकता है कि इसमें क्या दिखाई दे रहा है। बच्चे अपनी भाषा में उत्तर दे सकते हैं। इसके बाद शिक्षक उसी वस्तु का हिन्दी नाम बता सकता है और शब्द लिख सकता है।

 धीरे-धीरे बच्चे चित्र को शब्द से और शब्द को अर्थ से जोड़ना सीखते हैं। आगे चलकर चित्र की सहायता कम की जा सकती है और बच्चे स्वयं शब्द पढ़कर अर्थ समझने लगते हैं। शिक्षक की भूमिका इस पूरी प्रक्रिया में बहुत महत्वपूर्ण है। शिक्षक को बच्चों के लिए ऐसा वातावरण बनाना चाहिए जहाँ वे बिना डर के बोल सकें, पढ़ सकें और गलतियाँ कर सकें।

 शिक्षक को बच्चों के पूर्व ज्ञान को पहचानना चाहिए और उसी से आगे सीखने की प्रक्रिया बनानी चाहिए। पढ़ने के लिए केवल पाठ्यपुस्तक पर निर्भर रहने के बजाय कहानी, चित्र, स्थानीय सामग्री, बच्चों के अनुभव, लोकगीत और आसपास उपलब्ध लिखित सामग्री का उपयोग किया जा सकता है। बच्चे पढ़ना तब प्रभावी रूप से सीखते हैं जब पढ़ना उनके लिए केवल अक्षर और शब्द पहचानने का काम नहीं रहता, बल्कि उनके जीवन, अनुभव और समझ से जुड़ जाता है। बच्चे पहले सुनते और बोलते हैं, फिर अर्थ से परिचित होते हैं और धीरे-धीरे लिखे हुए शब्दों को उस अर्थ से जोड़कर पढ़ना सीखते हैं।

 इसलिए पढ़ना सिखाने की प्रक्रिया बच्चे की अपनी भाषा, पूर्व ज्ञान, अनुभव और रुचि से शुरू होनी चाहिए। जब कक्षा में बच्चों की भाषा का सम्मान, बोलने-सुनने के अवसर, रोचक पाठ, चित्र, कहानी, खेल और वास्तविक जीवन से जुड़ी सामग्री उपलब्ध होती है, तो बच्चे पढ़ने को बोझ नहीं बल्कि आनंद की गतिविधि के रूप में अनुभव करते हैं। यही वातावरण बच्चों को केवल पढ़ना ही नहीं, बल्कि समझकर पढ़ना, सोचकर पढ़ना और पढ़ी हुई बात को अपने जीवन से जोड़ना सिखाता है। यही प्रभावी भाषा सीखने और प्रभावी पढ़ने की वास्तविक प्रक्रिया है।

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