केन्द्र सरकार जातिगत जनगणना के उद्देश्य को विफल करना चाहती है : देवेन्द्र यादव

० संवाददाता द्वारा ० 
जयपुर। देश में पिछले कुछ समय से सरकारी संसाधन सीमित लोगों पर ही व्यय किए जा रहे है, देश में अमीर और अमीर हो रहा है और गरीब व्यक्ति गरीब होता जा रहा है, अमीर-गरीब के बीच की खाई बढ़ रही है, क्योंकि सरकारी संसाधनों का लाभ चुनिंदा लोगों को मिल रहा है और देश के अधिकांश नागरिक इससे वंचित हो रहे है। 
सामाजिक संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा लगातार यह आवाज उठायी जा रही थी कि सरकारी योजनाओं एवं सरकारी संसाधनों का लाभ देश के वंचित वर्ग को भी मिले किन्तु केन्द्र सरकार लगातार इसकी अनदेखी कर रही है इस पर लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गाँधी ने इस मुद्दें को प्रमुखता से उठाया और सरकार को नींद से उठाने का कार्य किया, दबाव के कारण केन्द्र सरकार को मजबूरी में जातिगत जनगणना करवाने की घोषणा करनी पड़ी।
जातिगत जनगणना का फैसला उस वक्त आया जब पहलगाम में एक बड़ा हादसा हुआ था और देश के निर्दोष नागरिकों की जान गई थी और भारतीय जनता पार्टी के विरूद्ध जनमत बनना शुरू हो गया था। नेता विपक्ष राहुल गाँधी जातिगत जनगणना के मुद्दे को लगातार सडक़ से संसद तक उठा रहे थे किन्तु सरकार द्वारा अनदेखी की जा रही थी परन्तु पहलगाम में हुई दु:खद घटना के पश्चात् सरकार ने आनन-फानन में जातिगत जनगणना करवाने की घोषणा तो कर दी।
जिससे देश के पिछड़े वर्ग के लोगों को एक उम्मीद मिली कि अब देश के विकास की योजनाओं का लाभ उन्हें मिल सकेगा। सरकार द्वारा अपने पितृ संस्था आरएसएस के मंशा के विरूद्ध जाकर जातिगत जनगणना करवाने की घोषणा तो कर दी किन्तु सरकार के इस फैसले के पूरे होने तक सभी को आशंका प्रारम्भ से थी। उक्त विचार राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी मुख्यालय में आयोजित एआईसीसी की विशेष प्रेस वार्ता को सम्बोधित करते हुए दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेशाध्यक्ष देवेन्द्र यादव ने व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि जातिगत जनगणना का जब नोटिफिकेशन जारी हुआ तो भाजपा की केन्द्र सरकार की मंशा साफ तौर पर नजर आ रही थी क्योंकि माँग यह थी कि जातिगत जनगणना में नागरिकों से उनके वर्ग और जाति की जानकारी ली जाएगी किन्तु 22 जनवरी, 2026 को जारी नोटिफिकेशन में बिंदु संख्या 12 में यह पूछा गया कि क्या घर का मुखिया अनुसूचित जाति, जनजाति व अन्य वर्ग से है इसी से यह शक यकीन में बदल गया कि केन्द्र सरकार जातिगत जनगणना के उद्देश्य को विफल करना चाहती है।

 नेता विपक्ष राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने इस विषय पर केन्द्र सरकार को अनेक पत्र लिखे और आपत्ति दर्ज करवायी कि नोटिफिकेशन में कहीं भी यह दर्ज नहीं है कि व्यक्ति किसी जाति या वर्ग से है उसकी जानकारी किस प्रकार ली जाएगी और जाति की जानकारी देने के संबंध में कोई प्रावधान नहीं किया गया है किन्तु सरकार द्वारा अपने चिर-परिचित तरीके को अपनाते हुए मुद्दे की जवाबदेही से बचने के लिए मौन धारण कर लिया गया और कोई जवाब इन पत्रों का नहीं दिया गया।

 जब ज्यादा दबाव बना तो सरकार ने यह कहा कि अभी केवल घरों की गणना हो रही है अगले चरण में जाति के संबंध में घर-घर जाकर सवाल पूछ कर जानकारी ली जाएगी, यह मात्र मुद्दे को भटकाने के लिए कहा गया जिसका कांगे्रस पार्टी पूरी तरह से विरोध करती है। जनगणना पूर्णतया डिजीटल तरीके से हो रही है जिसमें किसी भी प्रकार का बदलाव बहुत ही आसानी से किया जा सकता है, प्रश्नावली को समाहित करने व जोडऩे के लिए किसी बड़ी कवायद की आवश्यकता नहीं है यह कार्य आसानी से होता है।

 जनसंख्या की गणना फरवरी, 2027 से प्रारम्भ होनी है किन्तु सरकार द्वारा यह आभास करवाया जा रहा है कि सरकार की मंशा वास्तविक जातिगत डाटा इस जनगणना में प्राप्त करने की नहीं है, अन्यथा एक कॉलम और ड्रापडाउन मेन्यू डिजीटल गणना में इस प्रकार का हो सकता है कि व्यक्ति की जाति उसमें लिखी आ जाए और दूसरे कॉलम में वह किस वर्ग से संबंधित है इसकी जानकारी लिखी हो और उसे वह सलेक्ट कर लेवें क्योंकि अलग-अलग राज्यों में एक ही जाति भिन्न नामों से जानी जाती है

 ऐसे में यदि एक ही नाम यदि आये तो वास्तविक डाटा उस जाति का मिल सकता है उदाहरणत: सैनी भी अपनी जाति बताते है और कई स्थानों पर माली भी बताया जाता है इसी प्रकार यादव जाति के कुछ लोग अहीर लिखते है किन्तु इस तरह से एकरूप डाटा यदि ड्रापडाउन कॉलम हो तो ही मिल सकता है। सरकार चाहे तो यह प्रावधान इसके तहत् दो कॉलम सूचना एकत्रित करने में जोड़े जा सकते है प्रथम कॉलम में व्यक्ति किस वर्ग से आता है उस वर्ग का नाम लिखा हो और दूसरे कॉलम में सभी जातियों का नाम दर्ज हो जिसे जनगणना में भाग ले रहे व्यक्ति द्वारा सलेक्ट किया जा सके।

 कांग्रेस पार्टी की यही माँग है कि सरकार जनगणना डिजीटल तरीके से करवा रही है उसमेें आवश्यक रूप से दो कॉलम ड्रापडाउन मेन्यू सम्मिलित किए जाए किसी भी व्यक्ति से जब प्रश्न पूछा जाए तो पहले कॉलम में वर्ग का नाम हो और दूसरे कॉलम में जाति का नाम दर्ज हो, अन्य पिछड़ा वर्ग कमीशन के पास इस वर्ग की सभी जातियों का डाटा है जिससे जातियों के नाम डालना बहुत आसान है। केन्द्र और राज्य सरकार की सूचियों में जो भिन्नता है उसे भी इस माध्यम से निस्तारित किया जा सकता है क्योंकि हर राज्य में अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक वर्ग का आयोग है।

 यदि जनगणना में व्यक्ति के वर्ग और वास्तविक जाति की जानकारी समाहित नहीं हुई तो उसका मकसद ही समाप्त हो जाएगा और जिस रूप में जनगणना करवायी जा रही है जातियों के विभिन्न नाम आने से वास्तविक स्थिति की सूचना नहीं प्राप्त हो सकेगी। जब इन सभी आयोग से जातियों का डाटा लेकर ड्रापडाउन मेन्यू तैयार किया जा सकता है तो केन्द्र सरकार इसकी अनदेखी क्यों कर रही है यह प्रश्न पूरा देश पूछ रहा है और सरकार की जातिगत जनगणना करवाने की मंशा पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा हो रहा है कि सरकार किसी भी प्रकार से जातिगत जनगणना को कामयाब नहीं होने देना चाहती है।

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