सैफ़ी युवाओं के दिलों की धड़कन थे इंजीनियर शमीम अहमद सैफ़ी
० इरफ़ान राही ०
नई दिल्ली। इंजीनियर शमीम अहमद सैफ़ी के 9 सितम्बर को इंतक़ाल की ख़बर से पूरे सैफ़ी समाज में शोक की लहर दौड़ गई। उनके निधन से समाज ने एक ऐसे कर्मठ समाजसेवी, संगठनकर्ता, मार्गदर्शक और समाज को जोड़ने वाली शख़्सियत को खो दिया, जिन्होंने अपनी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा तन, मन और धन से समाज की ख़िदमत के लिए समर्पित कर दिया।द्वारका निवासी कवि, पत्रकार एवं सोशल एक्टिविस्ट इरफ़ान राही ने शमीम अहमद सैफ़ी के निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि शमीम सैफ़ी केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि सैफ़ी समाज के लिए एक संस्था और प्रेरणा थे। उन्होंने समाज की एकता, पहचान और नई पीढ़ी के भविष्य के लिए जिस तरह लगातार काम किया, उसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा।शमीम अहमद सैफ़ी का नाम केवल दिल्ली ही नहीं, बल्कि पूरे देश में सैफ़ी समाज की पहचान को मज़बूत करने वाली प्रमुख हस्तियों में लिया जाता है। सैफ़ी सरनेम के प्रचार-प्रसार और समाज को एकजुट करने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।
नई दिल्ली। इंजीनियर शमीम अहमद सैफ़ी के 9 सितम्बर को इंतक़ाल की ख़बर से पूरे सैफ़ी समाज में शोक की लहर दौड़ गई। उनके निधन से समाज ने एक ऐसे कर्मठ समाजसेवी, संगठनकर्ता, मार्गदर्शक और समाज को जोड़ने वाली शख़्सियत को खो दिया, जिन्होंने अपनी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा तन, मन और धन से समाज की ख़िदमत के लिए समर्पित कर दिया।द्वारका निवासी कवि, पत्रकार एवं सोशल एक्टिविस्ट इरफ़ान राही ने शमीम अहमद सैफ़ी के निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि शमीम सैफ़ी केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि सैफ़ी समाज के लिए एक संस्था और प्रेरणा थे। उन्होंने समाज की एकता, पहचान और नई पीढ़ी के भविष्य के लिए जिस तरह लगातार काम किया, उसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा।शमीम अहमद सैफ़ी का नाम केवल दिल्ली ही नहीं, बल्कि पूरे देश में सैफ़ी समाज की पहचान को मज़बूत करने वाली प्रमुख हस्तियों में लिया जाता है। सैफ़ी सरनेम के प्रचार-प्रसार और समाज को एकजुट करने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।
उन्होंने नॉर्थ गोंडा में सैफ़ी हाउस का निर्माण कराया तथा सैफ़ी गाइड और सैफ़ी उजाला जैसे प्रकाशनों के माध्यम से समाज को जागरूक, संगठित और आपस में जोड़ने का काम किया।
इंजीनियर शमीम अहमद सैफ़ी का जन्म 30 सितम्बर 1963 को शाहपुर, मुज़फ़्फ़रनगर में हुआ। उन्होंने रुड़की यूनिवर्सिटी से बी.ई. की शिक्षा प्राप्त की। दिल्ली में सेवा के दौरान एम.टेक. में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए गोल्ड मेडल हासिल किया। इसके बाद उन्होंने एल.एल.बी. की डिग्री भी प्राप्त की
इंजीनियर शमीम अहमद सैफ़ी का जन्म 30 सितम्बर 1963 को शाहपुर, मुज़फ़्फ़रनगर में हुआ। उन्होंने रुड़की यूनिवर्सिटी से बी.ई. की शिक्षा प्राप्त की। दिल्ली में सेवा के दौरान एम.टेक. में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए गोल्ड मेडल हासिल किया। इसके बाद उन्होंने एल.एल.बी. की डिग्री भी प्राप्त की
शिक्षा और पेशेवर जीवन में सफलता हासिल करने के बावजूद उन्होंने सामाजिक सरोकारों को कभी पीछे नहीं छोड़ा। उनका मानना था कि समाज की तरक़्क़ी केवल व्यक्तिगत सफलता से नहीं, बल्कि सामूहिक प्रयास और संगठन से संभव है।
वर्ष 1992 में सैफ़ी वेलफेयर एसोसिएशन, दिल्ली की ज़िम्मेदारी संभालने के बाद उन्होंने समाज के लिए अनेक उल्लेखनीय कार्य किए। बाद में सैफ़ी वेलफेयर एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके सामाजिक और कल्याणकारी कार्यों की फेहरिस्त इतनी लंबी है कि उन पर एक पूरी पुस्तक लिखी जा सकती है।
वर्ष 1992 में सैफ़ी वेलफेयर एसोसिएशन, दिल्ली की ज़िम्मेदारी संभालने के बाद उन्होंने समाज के लिए अनेक उल्लेखनीय कार्य किए। बाद में सैफ़ी वेलफेयर एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके सामाजिक और कल्याणकारी कार्यों की फेहरिस्त इतनी लंबी है कि उन पर एक पूरी पुस्तक लिखी जा सकती है।
सैफ़ी समाज की पुरानी गाइडों, ‘सैफ़ी समाज का गौरव’ (1999) तथा विभिन्न समाचार-पत्रों में प्रकाशित सामग्री में उनके कार्यों और उपलब्धियों का उल्लेख मिलता है।
शमीम सैफ़ी विशेष रूप से युवाओं में लोकप्रिय थे। वह युवाओं को शिक्षा हासिल करने, संगठित होने, अपनी सामाजिक पहचान पर गर्व करने और समाज की बेहतरी के लिए आगे आने के लिए प्रेरित करते थे। यही कारण था कि उन्हें “सैफ़ी युवाओं के दिलों की धड़कन” कहा जाता था। शमीम सैफ़ी पिछले लगभग आठ वर्षों से अस्वस्थ चल रहे थे।
शमीम सैफ़ी विशेष रूप से युवाओं में लोकप्रिय थे। वह युवाओं को शिक्षा हासिल करने, संगठित होने, अपनी सामाजिक पहचान पर गर्व करने और समाज की बेहतरी के लिए आगे आने के लिए प्रेरित करते थे। यही कारण था कि उन्हें “सैफ़ी युवाओं के दिलों की धड़कन” कहा जाता था। शमीम सैफ़ी पिछले लगभग आठ वर्षों से अस्वस्थ चल रहे थे।
उन्हें फालिज का दौरा पड़ा था, जिसके बाद उनकी सेहत लगातार प्रभावित रही। बाद में किडनी की समस्या के कारण उन्हें सप्ताह में कई बार डायलिसिस भी कराना पड़ता था। लंबी बीमारी और शारीरिक परेशानियों के बावजूद उनके भीतर समाज के लिए कुछ करने का जज़्बा बना रहा।
इंजीनियर शमीम अहमद सैफ़ी को हज़रत निज़ामुद्दीन स्थित पंचपीरान कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया। उनकी अंतिम विदाई में सामाजिक कार्यकर्ता, राजनीतिक नेता, वकील समुदाय, न्यायिक क्षेत्र से जुड़े लोग, नगर निगम के अधिकारी, सैफ़ी संगठनों के पदाधिकारी, पत्रकार, रिश्तेदार, परिवारजन और उनके बड़ी संख्या में चाहने वाले उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचे। उनकी अंतिम यात्रा में उमड़ी भीड़ उनके प्रति समाज के प्रेम, सम्मान और आत्मीय संबंधों की गवाही दे रही थी।
शमीम अहमद सैफ़ी आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा किए गए सामाजिक कार्य, स्थापित संस्थाएँ, प्रकाशित सामग्री और समाज को जोड़ने की उनकी कोशिशें हमेशा याद की जाती रहेंगी। उन्होंने जिस पौधे को अपने जीवन में सींचा, उसे आगे बढ़ाना अब समाज की नई पीढ़ी की ज़िम्मेदारी है।
इंजीनियर शमीम अहमद सैफ़ी को हज़रत निज़ामुद्दीन स्थित पंचपीरान कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया। उनकी अंतिम विदाई में सामाजिक कार्यकर्ता, राजनीतिक नेता, वकील समुदाय, न्यायिक क्षेत्र से जुड़े लोग, नगर निगम के अधिकारी, सैफ़ी संगठनों के पदाधिकारी, पत्रकार, रिश्तेदार, परिवारजन और उनके बड़ी संख्या में चाहने वाले उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचे। उनकी अंतिम यात्रा में उमड़ी भीड़ उनके प्रति समाज के प्रेम, सम्मान और आत्मीय संबंधों की गवाही दे रही थी।
शमीम अहमद सैफ़ी आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा किए गए सामाजिक कार्य, स्थापित संस्थाएँ, प्रकाशित सामग्री और समाज को जोड़ने की उनकी कोशिशें हमेशा याद की जाती रहेंगी। उन्होंने जिस पौधे को अपने जीवन में सींचा, उसे आगे बढ़ाना अब समाज की नई पीढ़ी की ज़िम्मेदारी है।
ऐसे लोग दुनिया से चले जाते हैं, लेकिन अपने काम और विचारों के माध्यम से समाज के बीच हमेशा ज़िंदा रहते हैं। शमीम सैफ़ी का जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए यह संदेश देता रहेगा कि व्यक्तिगत सफलता के साथ समाज के लिए योगदान देना ही जीवन की सच्ची सार्थकता है।
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