राज्यपाल ने विभिन्न क्षेत्रों की विशिष्ट विभूतियों को "राजस्थान गौरव" सम्मान से सम्मानित किया
जयपुर। राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने कहा कि राजस्थानी भाषा नहीं संस्कृति है। उन्होंने राजस्थानी भाषा में कन्हैया लाल सेठिया की "धरती धोरा री" और महाकवि सूर्यमल्ल मिश्रण की “इला न देणी आपणी, हालरिया हुलराय। पूत सिखावै पालणै, मरण बड़ाई माय पंक्तियां सुनाई और इनका अर्थ भी बताया।
राज्यपाल ने इससे पहले विभिन्न क्षेत्रों की विशिष्ट विभूतियों को "राजस्थान गौरव" सम्मान से सम्मानित किया। इस अवसर पर संस्कृति युवा संस्था के संस्थापक अध्यक्ष पंडित सुरेश मिश्रा, प्रख्यात विधिवेता एच.सी. गणेशिया, मुख्यमंत्री के विशेषाधिकारी गोविंद पारीक ने भी संबोधित किया।
राज्यपाल ने कहा कि राजस्थानी बहुत मीठी भाषा है। वह इसे प्यार करते हैं। उन्होंने बताया कि राजस्थान के बहुत से लोग महाराष्ट्र में रहते है, यहां भी मराठी भाषा के केंद्र खुलेंगे तो दोनों प्रदेशों में और निकटता आएगी। इस सम्बन्ध में ही प्रदेश में मराठी भाषा के केंद्र खोलने के लिए कहा गया। पर, मराठी भाषा अनिवार्य नहीं है ऐच्छिक है। उन्होंने कहा कि राजस्थानी तो राजस्थान की अपनी भाषा हैं।
राजस्थानी केंद्र खोलने का कहा गया तो हमने तुरंत सभी विश्वविद्यालयों में राजस्थानी केंद्र खोलने के लिए भी आदेश जारी किया। उन्होंने चुटकी भी ली और कहा अच्छी बात है, मराठी केंद्र खोलने के बाद यहां के लोगों का राजस्थानी केंद्र खोलने के लिए ध्यान गया। उन्होंने कहा कि इस पर तो बहुत पहले ही शुरुआत हो जानी चाहिए थी।
राज्यपाल "राजस्थान गौरव सम्मान समारोह" में संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भारत विश्वगुरु तभी बनेगा जब हमारी संस्कृति और नैतिक मूल्य बचे रहेंगे। उन्होंने कहा कि पेपर लीक के प्रकरण इसीलिए होते हैं कि नैतिकता से व्यक्ति विमुख होने लगे। उन्होंने नैतिक मूल्य और संस्कृति बचाए रखने में सभी की भागीदारी का आह्वान किया।
राज्यपाल ने महाराणा प्रताप के दरबार के लेखक चक्रपाणि मिश्र ने "विश्ववल्लभ" ग्रन्थ की भी चर्चा की और कहा कि कृषि और जल संरक्षण की यह महत्वपूर्ण पुस्तक है। उन्होंने भारत सरकार द्वारा संस्कृति से जुड़े संस्कृत और दूसरी भाषाओं के ग्रंथों के डिजिटलाइजेशन की पहल को महत्वपूर्ण बताया। प्राचीन काल में भारत का भूभाग बहुत बड़ा था। म्यांमार, अफगानिस्तान, नेपाल आदि सब भारत के ही भाग थे। उन्होंने कहा कि "संस्कृति युवा संस्था" का नाम बहुत अच्छा है।
भारतीय संस्कृति तो वास्तव में सदा सदा के लिए युवा ही है। उन्होंने कहा कि पश्चिम के देशों में आज भी भारत के दो महान ग्रंथों रामायण और महाभारत के प्रति सर्वाधिक आकर्षण है। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य है कि हमारी संस्कृति का बाहरी देश तो सम्मान करते हैं परंतु हमारे यहां बहुत से ऐसे हैं, जो इस संस्कृति का मजाक उड़ाते हैं।
राज्यपाल ने इससे पहले विभिन्न क्षेत्रों की विशिष्ट विभूतियों को "राजस्थान गौरव" सम्मान से सम्मानित किया। इस अवसर पर संस्कृति युवा संस्था के संस्थापक अध्यक्ष पंडित सुरेश मिश्रा, प्रख्यात विधिवेता एच.सी. गणेशिया, मुख्यमंत्री के विशेषाधिकारी गोविंद पारीक ने भी संबोधित किया।




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