जंतर मंतर पर युवतियों की भाषा अगर यह नहीं होती तो क्या होती ?

० नीलम गुप्ता ० 
कोकरोच जनता पार्टी के धरना-प्रदर्शन में इंस्टाग्राम और पोस्टर्स में मोदी सरकार और खासतौर से खुद प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ इस्तेमाल की गई अश्लील भाषा पर मिलेनियल्स और अंध भक्तों द्वारा आपत्तिया उठाई जा रही है। उनकी मुख्य चिंता यह है कि प्रदर्शन में शामिल युवतियों ने भी इस भाषा का इस्तेमाल किया और यह समाज के हित में नहीं है। 
आप यह सोचते रहिए पर करीब डेढ़ महीना दिल्ली के जंतर मंतर पर चले इस प्रदर्शन से साफ हो गया है कि आज की बेटियां पांच हजार साल से उन पर लादी गई समाजिक व आर्थिक जंजीरों को स्वीकार करने को तैयार नहीं। दूर दराज गांवों तक से वे अकेली आईं। घर में बिना बताए आई। और कितने ही पिता उनकी बात को मानते हुए खुशी-खुशी खुद उन्हें यहां लेकर आए। वे इस बात से मुतमइन थे कि आंदोलन उनके बच्चों व देश के सुरक्षित भविष्य के लिए है और अगर उनकी बेटी इसमें भागीदारी करना चाहती हैं तो उसे यह मौका दिया जाना चाहिए।

बात भाषा की करें तो सबसे पहले तो अश्लील भाषा या तरीकों का इस्तेमाल पिछले 12 साल में खुद मोदी जी ने किया जो उनके प्रधानमंत्री पद की गरिमा के बिल्कुल भी अनुकूल नहीं था। प.बंगाल में चुनावों के दौरान जिस लहजे में वे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को ‘दीदी ओ दीदी’ कहकर संबोधित करते थे, लगता था नुक्कड़ पर खड़ा कोई मनचला सड़क पर जा रही किसी लड़की को छेड़ रहा है।

‘सोनिया गांधी कांग्रेस की विधवा’, ओलंपिक जीत कर आई खिलाड़ियों का यौन शोषण करने वाले बृजभूषण को संरक्षण, बिलकिस बानू के अपराधियों को जेल से बाहर निकाल उनके गले में हार डलवाना, विवाहित होने के बावजूद मिडिया के पोल खोलने तक अपने को कुंवारा बताते रहना और इटली की प्रधानमंत्री मिलौनी को प्रधानमंत्री के रूप में बतौर गिफ्ट मैलोडी का पैकेट पकड़ाना। ये कुछ उदाहरण हैं जो बताते हैं कि मोदी जी को न तो महिलाओं के लिए सम्मानजनक भाषा बोलनी आती है और न ही देश का सम्मान करना।

मिलौनी को मैलोडी देते हुए जिस तरह वे खी खी कर हंस रहे थे उसे देख बहुत से संस्कारी अंधभक्तों को भी शायद उन पर गुस्सा आया होगा। तो जंतर मंतर पर उनकी ही भाषा में प्रदर्शकारियो ने उन्हें जवाब दिया। उनमें महिलाएं भी थीं। मैं खुश हूं कि उन्होंने सभ्य समाज में अब तक उनके लिए वर्जित तौर-तरीकों और भाषा का परित्याग कर उस भाषा का खुलकर इस्तेमाल किया जो अब तक पुरूष समाज, बलात्कारी या मनचले उसके खिलाफ करते आ रहे थे। 

और सबसे बड़ी बात, यह किसी रणनीति के तहत नहीं किया गया। यह जेन जी का पिछले 12 सालों का दबा हुआ गुस्सा था जो बाहर निकला। खुलकर निकला। मोदी के तरीकों से ही निकला। मोदी तो रणनीति के तहत तैयारी करके बोलते हैं। पर यहां तो सब कुछ इंस्टैंट है। इंस्टाग्राम। कुछ भी फिल्टर्ड नहीं। उधर मोदी ने रात के 12 बजे जेन जी को खुश करने के लिए आठ सैकेंड की रील चलाई, इधर हाथों-हाथ देश भर से इंस्टाग्राम पर उसकी धज्जियां उड़ा दी गई। 12-15 साल की किशोरियों के वीडियों तक सामने आ गए।
20 July को पुलिस ने महिलाओं पर यौन हमले किए और एक सिपाही ने तो एक महिला के गुप्तांग में डंडा तक घुसा दिया। छात्रों की रील में पकड़ा गया पर छात्रों ने क्या किया। अगले ही दिन ठीक वैसा ही अश्लील पोस्टर मोदी जी का बना दिया। इसे छात्राओं ने भी अपने हाथ में उठाया और मौजूद भीड़ ने, मीडिया ने उसे देखा। मेरे हिसाब से तो पुलिस के यौन हमलों के खिलाफ 20 तारीख के बाद अगर जंतर मंतर पर अश्लील पोस्टर व मीम बने और छात्राओं ने अपने हाथों में उठाकर उसे लोगों को दिखाया तो यह स्वाभाविक ही था।

अपनी अस्मिता पर सरकार द्वारा बर्बर हमले का इससे ज्यादा मारक जवाब और क्या हो सकता था। और वह उन्हीं की तरफ से दिया जाना चाहिए था। इसलिए यहां इस्तेमाल भाषा को स्त्री-पुरुष के खांचों में बांट कर देखना ठीक नहीं होगा। कारण, यह जनेरेशन खुद ऐसे खांचों को नहीं मानती। उन्हें अपने व्यवहार से ध्वस्त करती जा रही है। कोकरोच जनता पार्टी के जंतर मंतर पर प्रदर्शन को इतिहास में इस बात के लिए याद रखा जाएगा।

साहस की कहानियां प्रदर्शन मोदी सरकार की अस्मिता पर भाषाई हमले का तो बेमिसाल उदाहरण बना ही। महिलाओं की दृष्टि से यह उनकी स्वतंत्रता, पहचान, आत्मविश्वास और साहस का भी अप्रितम उदाहरण था। 23 दिन तक आमरण अनशन पर रही नेहा शर्मा ने साबित कर दिया कि नारी की कहानी अब ‘अबला जीवन हाय तुम्हार यही कहानी। आंचल में है दूध और आंखों में पानी की नहीं रही। जरूरत पड़ने पर अब वह ‘खूब लड़ी मर्दानी’ का रूप धारण कर भी सामने आ खड़ी हो विरोधी को ललकारने में टाइम नहीं लगाती।

 मुंबई की सड़क पर 22 जुलाई को कोकरोच आंदोलनकारियों को कैद कर ले जाती पुलिस बस को सामने आ एक हाथ से रोक देने वाली 27 वर्षीय युवती रहिया अहीर की तस्वीर को कौन भुला सकेगा।
जंतर मंतर और देश भर में हुए कोकरोच प्रदर्शनों से बाहर रहते हुए भी किस तरह महिलाओं ने अपनी उपस्थिति बेहद प्रभावी ढंग से इसके भीतर दर्ज करवा ली इसका बहुत ही सुंदर उदाहरण है कवि मंजर भोपाली की प्रसिद्ध कविता-‘मुझको अपने बैंक की किताब दीजिए, देश की तबाही का हिसाब दीजिए।’

 का रिमक्स जिसे महिला रैप सिंगर्स ने इतनी खूबसूरती से गाया है कि सुनते हुए रगों का ठंडा खून अपने आप दौड़ने लगता है और आप उसकी धुन के साथ बहते हुए झूमते चले जाते हैं। 20 जुलाई के बाद यह गीत जंतर मंतर पर लगातार बजता रहा। 20 जुलाई से पहले घरों में बैठी महिलाओं ने सरकार के विरोध और शिक्षा, देश का भविष्य और अकाउंटेबिलिटी की मांग को लेकर कई वीडियों बनाए और 20 जुलाई के बाद उनकी आवाज से सरकार के प्रति, पुलिस की दरिंदगी के प्रति जो रोष व गुस्सा निकला वह भी इस आंदोलन और मोदी सरकार के इतिहास में दर्ज हो गया।

 महिलाओं पर पुलिस के यौन हमलों के अगले दिन ज्यादा बड़ी संख्या में महिलाएं जंतर मंतर पर पहुंचने लगीं। सरकार व पुलिस के खिलाफ गुस्से में नहीं, आदोलनकारियों के समर्थन में। नीट पेपर लीक और 22 बच्चों की आत्महत्या की सरकार की अकाउंटीबिल्टी संबंधी उनकी मांगों के समर्थन में। अब उनमें मात्र युवतियां ही नहीं थी। बुजुर्ग और बच्चियां भी थीं। एक महिला की बाजुओं में शादी का लाल चूड़ा था।

 एक मां अपनी एक साल की बच्ची को अपनी गोद में लेकर वहां आई थी। उसके शब्दों में-‘इस बच्ची के भविष्य के लिए। देश के भविष्य के लिए। और हां। ये दृश्य अपवाद नहीं थे। प्रदर्शन का नेतृत्व भले ही कोकरोच जनता पार्टी के तीन युवकों ने किया हो पर इसे सफल बनाने में महिलाओं की भी बड़ी भूमिका रही।

टिप्पणियाँ

Udbhrant ने कहा…
बिल्कुल सही विश्लेषण

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