शैक्षिक यात्रा सीखने का घुमक्कड़ शास्त्र से NEP 2020 तक
० संवाददाता द्वारा ०
कोलकाता : शैक्षिक यात्रा सीखने का अनिवार्य अंग क्यों बन गई है घुमक्कड़ शास्त्र से NEP 2020 तक अनादि काल से ही यात्रा को सबसे बड़ी विद्या और सबसे कठिन तपस्या माना गया है। कक्षा और डिग्री से बहुत पहले, ज्ञान धरती पर पैदल चलकर ही अर्जित किया जाता था।चीन के ह्वेनसांग और फाह्यान, मोरक्को के इब्न बतूता, वेनिस के निकोलो कोंटी जैसे महान यात्रियों ने महाद्वीपों की यात्रा की और अपने विस्तृत संस्मरण लिखे। वे संस्मरण केवल कहानियां नहीं रहे; वे इतिहास का सबसे बड़ा स्रोत बन गए। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पहले महानिदेशक सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने अपनी सबसे महान खोजें - बोधगया, सारनाथ, नालंदा, कुशीनगर, लुम्बिनी और तक्षशिला - ह्वेनसांग और फाह्यान के यात्रा वृत्तांतों को ही अपना मार्गदर्शक बनाकर कीं, जिनका चीनी से फ्रेंच और फिर अंग्रेजी में अनुवाद हुआ था। महापंडित राहुल सांकृत्यायन, जिन्हें भारत के सबसे महान विद्वानों में से एक माना जाता है, वे ही इसके सबसे बड़े घुमक्कड़ भी थे। उनकी पुस्तक घुमक्कड़ शास्त्र यह तर्क देती है कि घुमक्कड़ी स्वयं में एक शास्त्र है - सीखने का एक अनुशासित विज्ञान। अपनी विद्वता के लिए महापंडित की उपाधि से सम्मानित, वे हिमालय पार कर तिब्बत जाने वाले पहले भारतीयों में से एक थे, और वहां से बौद्ध धर्म की सैकड़ों दुर्लभ पांडुलिपियां लेकर आए, जिनका उन्होंने तिब्बती से हिंदी और अंग्रेजी में अनुवाद किया।
रटने की पद्धति की जगह अब करके, देखकर और अनुभव करके सीखने ने ले ली है। शैक्षिक भ्रमण, फील्ड विजिट और शिक्षा के लिए यात्रा अब पाठ्येतर गतिविधियां नहीं रहीं - वे पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं।
क्यों ? क्योंकि भारत को केवल पाठ्यपुस्तक में नहीं समझा जा सकता। जब कोई छात्र यात्रा करता है, तो वह भारत की समृद्ध विरासत को एक अध्याय के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत वास्तविकता के रूप में खोजता है
कोलकाता : शैक्षिक यात्रा सीखने का अनिवार्य अंग क्यों बन गई है घुमक्कड़ शास्त्र से NEP 2020 तक अनादि काल से ही यात्रा को सबसे बड़ी विद्या और सबसे कठिन तपस्या माना गया है। कक्षा और डिग्री से बहुत पहले, ज्ञान धरती पर पैदल चलकर ही अर्जित किया जाता था।चीन के ह्वेनसांग और फाह्यान, मोरक्को के इब्न बतूता, वेनिस के निकोलो कोंटी जैसे महान यात्रियों ने महाद्वीपों की यात्रा की और अपने विस्तृत संस्मरण लिखे। वे संस्मरण केवल कहानियां नहीं रहे; वे इतिहास का सबसे बड़ा स्रोत बन गए। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पहले महानिदेशक सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने अपनी सबसे महान खोजें - बोधगया, सारनाथ, नालंदा, कुशीनगर, लुम्बिनी और तक्षशिला - ह्वेनसांग और फाह्यान के यात्रा वृत्तांतों को ही अपना मार्गदर्शक बनाकर कीं, जिनका चीनी से फ्रेंच और फिर अंग्रेजी में अनुवाद हुआ था। महापंडित राहुल सांकृत्यायन, जिन्हें भारत के सबसे महान विद्वानों में से एक माना जाता है, वे ही इसके सबसे बड़े घुमक्कड़ भी थे। उनकी पुस्तक घुमक्कड़ शास्त्र यह तर्क देती है कि घुमक्कड़ी स्वयं में एक शास्त्र है - सीखने का एक अनुशासित विज्ञान। अपनी विद्वता के लिए महापंडित की उपाधि से सम्मानित, वे हिमालय पार कर तिब्बत जाने वाले पहले भारतीयों में से एक थे, और वहां से बौद्ध धर्म की सैकड़ों दुर्लभ पांडुलिपियां लेकर आए, जिनका उन्होंने तिब्बती से हिंदी और अंग्रेजी में अनुवाद किया।
उनमें से कई ग्रंथ आज भी पटना संग्रहालय में सुरक्षित हैं, जो इस बात के जीवंत प्रमाण हैं कि यात्रा कैसे किसी सभ्यता की स्मृति को बचाती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने इस प्राचीन भारतीय ज्ञान को आधिकारिक रूप से पुनर्जीवित किया है। पहली बार, इसने अनुभवात्मक शिक्षा को शिक्षा के केंद्र में रखा है। NEP स्पष्ट रूप से कहती है कि सीखना कक्षा के अंदर से ज्यादा, कक्षा के बाहर होना चाहिए।
रटने की पद्धति की जगह अब करके, देखकर और अनुभव करके सीखने ने ले ली है। शैक्षिक भ्रमण, फील्ड विजिट और शिक्षा के लिए यात्रा अब पाठ्येतर गतिविधियां नहीं रहीं - वे पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं।
क्यों ? क्योंकि भारत को केवल पाठ्यपुस्तक में नहीं समझा जा सकता। जब कोई छात्र यात्रा करता है, तो वह भारत की समृद्ध विरासत को एक अध्याय के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत वास्तविकता के रूप में खोजता है
विरासत, कला और शिल्प: विष्णुपुर की टेराकोटा से लेकर पिंगला की पटचित्र तक, बनारस के बुनकरों से लेकर महाबलीपुरम के शिल्पकारों तक, शिल्प सबसे अच्छा कारीगर के आंगन में ही सीखा जाता है। कृषि और बागवानी: पंजाब का एक खेत, दार्जिलिंग का एक चाय बागान, केरल का एक मसाला बागान, या सुंदरबन के तैरते हुए बगीचे, किसी भी आरेख से ज्यादा कृषि, जलवायु और अर्थव्यवस्था के बारे में सिखाते हैं।
भूगोल और पारिस्थितिकी: थार का रेगिस्तान, पश्चिमी घाट, सुंदरबन के मैंग्रोव और हिमालय की घाटियां एक ही यात्रा में भूगोल, जैव विविधता और जलवायु परिवर्तन को समझा देती हैं। पुरातत्व और नृविज्ञान: नालंदा के खंडहरों में खड़े होना, धोलावीरा में चलना, या बस्तर में एक आदिवासी समुदाय के साथ रहना हमें हमारे गौरवशाली अतीत, हमारी वर्तमान विविधता और हमारे सामाजिक ताने-बाने के बारे में सिखाता है।
इस प्रकार शैक्षिक यात्रा तीन काल-रेखाओं को जोड़ती है: यह छात्रों को भारत के गौरवशाली अतीत से अवगत कराती है, उन्हें इसके संसाधनों और उद्योगों की वर्तमान स्थिति और संभावनाओं का आकलन करने में मदद करती है, और उन्हें देश के लिए भविष्य की संभावनाओं की कल्पना करने के लिए प्रेरित करती है।
गूगल के इस युग में, यात्रा वह देती है जो स्क्रीन नहीं दे सकती संदर्भ, सहानुभूति और जिया हुआ अनुभव। एक सच्चा घुमक्कड़ केवल किसी जगह को देखता नहीं है; वह उसे समझता है। इसीलिए ह्वेनसांग से लेकर राहुल सांकृत्यायन से लेकर NEP 2020 तक संदेश एक ही है: सच में सीखने के लिए, सच में घूमना जरूरी है।
भूगोल और पारिस्थितिकी: थार का रेगिस्तान, पश्चिमी घाट, सुंदरबन के मैंग्रोव और हिमालय की घाटियां एक ही यात्रा में भूगोल, जैव विविधता और जलवायु परिवर्तन को समझा देती हैं। पुरातत्व और नृविज्ञान: नालंदा के खंडहरों में खड़े होना, धोलावीरा में चलना, या बस्तर में एक आदिवासी समुदाय के साथ रहना हमें हमारे गौरवशाली अतीत, हमारी वर्तमान विविधता और हमारे सामाजिक ताने-बाने के बारे में सिखाता है।
इस प्रकार शैक्षिक यात्रा तीन काल-रेखाओं को जोड़ती है: यह छात्रों को भारत के गौरवशाली अतीत से अवगत कराती है, उन्हें इसके संसाधनों और उद्योगों की वर्तमान स्थिति और संभावनाओं का आकलन करने में मदद करती है, और उन्हें देश के लिए भविष्य की संभावनाओं की कल्पना करने के लिए प्रेरित करती है।
गूगल के इस युग में, यात्रा वह देती है जो स्क्रीन नहीं दे सकती संदर्भ, सहानुभूति और जिया हुआ अनुभव। एक सच्चा घुमक्कड़ केवल किसी जगह को देखता नहीं है; वह उसे समझता है। इसीलिए ह्वेनसांग से लेकर राहुल सांकृत्यायन से लेकर NEP 2020 तक संदेश एक ही है: सच में सीखने के लिए, सच में घूमना जरूरी है।



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