राजस्थान में गिग वर्कर्स के साथ दोहरा व्यवहार बंद हो,सामाजिक सुरक्षा और रोजगार की मांग

० आशा पटेल ० 
जयपुर,राजस्थान में ऐप-आधारित गिग वर्कर्स और डिलीवरी राइडर्स के साथ ई-कॉमर्स एवं प्लेटफॉर्म कंपनियों के व्यवहार पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। कंपनियां एक ओर गिग वर्कर्स को अपना कर्मचारी मानने से इनकार करती हैं, जिसके कारण उन्हें कर्मचारी अधिकारों, सामाजिक सुरक्षा और अन्य श्रम लाभों से वंचित रखा जाता है। 

वहीं दूसरी ओर, उन्हीं कामगारों को कंपनी के नियमों और अनुबंधों से बांधकर काम करने की स्वतंत्रता पर नियंत्रण रखा जाता है और नियमों का पालन नहीं करने पर उनकी आईडी बंद करने अथवा काम से हटाने की चेतावनी दी जाती है। गिग वर्कर्स को अक्सर independent worker या freelancer बताया जाता है। तर्क दिया जाता है कि वे अपनी सुविधा और उपलब्धता के अनुसार काम करते हैं तथा कंपनी के स्थायी कर्मचारी नहीं हैं।
लेकिन सवाल यह है कि यदि कोई कामगार वास्तव में पूरी तरह स्वतंत्र है, तो कंपनी उसके काम करने के तरीके और शर्तें क्यों निर्धारित करती है ? कंपनी उसके काम और प्रदर्शन की निगरानी क्यों करती है ? कंपनी रेटिंग, टारगेट और अन्य मानकों के आधार पर उस पर दबाव क्यों बनाती है ? कंपनी के निर्देशों का पालन नहीं करने पर उसकी आईडी बंद करने की चेतावनी क्यों दी जाती है ?

कंपनी अपने अनुबंध और प्लेटफॉर्म की शर्तों के माध्यम से उसके काम तक पहुंच को नियंत्रित क्यों करती है ? यह स्थिति गिग वर्क की उस वास्तविकता को सामने लाती है जिसमें कामगार को अधिकारों के मामले में स्वतंत्र और कंपनी के नियंत्रण के मामले में कर्मचारी जैसा व्यवहार झेलना पड़ता है।

गिग और प्लेटफॉर्म कंपनियां अपने व्यवसाय में हजारों कामगारों की मेहनत पर निर्भर हैं। डिलीवरी राइडर, कैब ड्राइवर, लॉजिस्टिक्स वर्कर और अन्य प्लेटफॉर्म वर्कर्स शहरों की अर्थव्यवस्था और रोजमर्रा की सेवाओं को चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन जब सामाजिक सुरक्षा, दुर्घटना सुरक्षा, न्यूनतम आय, पेंशन, बीमा, शिकायत निवारण और रोजगार की सुरक्षा की बात आती है, तो कंपनियां अक्सर उन्हें स्वतंत्र कामगार बताकर अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटती हैं।

एक तरफ कर्मचारी नहीं मानना और दूसरी तरफ अनुशासनात्मक नियंत्रण रखना—यह दोहरा मापदंड स्वीकार नहीं किया जा सकता। हाल ही में Zepto के कांवड़ यात्रा से संबंधित बैनर के संदर्भ में भी यही सवाल सामने आता है कि यदि प्लेटफॉर्म पर काम करने वाला व्यक्ति पूरी तरह स्वतंत्र है, तो कंपनी उसके काम और व्यवहार को अपने अनुबंध तथा प्लेटफॉर्म नियमों के माध्यम से किस सीमा तक नियंत्रित कर सकती है ? 

किसी भी धार्मिक, सामाजिक या व्यक्तिगत गतिविधि के दौरान यदि कामगार को कंपनी के निर्देशों, शर्तों या संभावित आईडी बंद होने के डर के बीच निर्णय लेना पड़े, तो यह केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सवाल नहीं है, बल्कि कामगार और प्लेटफॉर्म के बीच वास्तविक शक्ति-संबंध का सवाल भी है। यह जरूरी है कि कंपनियां स्पष्ट करें कि वे इन कामगारों को किस रूप में देखती हैं—स्वतंत्र कामगार या अपने व्यवसाय के लिए नियंत्रित श्रमशक्ति ?

राजस्थान वर्ष 2023 में “राजस्थान प्लेटफॉर्म आधारित गिग कर्मकार (पंजीकरण एवं कल्याण) अधिनियम” पारित करने वाला देश का पहला राज्य बना था। इस कानून का उद्देश्य प्लेटफॉर्म आधारित गिग वर्कर्स के पंजीकरण, कल्याण और सामाजिक सुरक्षा को सुनिश्चित करना है। लेकिन कानून बनने के बावजूद इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए आवश्यक नियमों और संस्थागत व्यवस्थाओं को लेकर अभी भी गंभीर सवाल बने हुए हैं।

राजस्थान सरकार को चाहिए कि वह कानून को कागज तक सीमित न रखकर तत्काल प्रभाव से लागू करे तथा गिग वर्कर्स के लिए प्रभावी सामाजिक सुरक्षा, शिकायत निवारण, दुर्घटना सुरक्षा, कल्याण व्यवस्था और पारदर्शी प्लेटफॉर्म व्यवस्था सुनिश्चित करे।

हमारी प्रमुख मांगें राजस्थान प्लेटफॉर्म आधारित गिग कर्मकार अधिनियम, 2023 को तत्काल प्रभावी रूप से लागू किया जाए। कानून के तहत आवश्यक नियमों का शीघ्र निर्माण कर उन्हें लागू किया जाए। गिग वर्कर्स के लिए प्रभावी गिग वर्कर्स वेलफेयर बोर्ड एवं कल्याण कोष को मजबूत किया जाए। कंपनियों द्वारा मनमाने ढंग से आईडी बंद करने और काम से हटाने की व्यवस्था पर स्पष्ट नियम बनाए जाएं। आईडी बंद करने से पहले कामगार को कारण बताओ नोटिस, जवाब देने का अवसर और अपील/शिकायत की व्यवस्था दी जाए।

एल्गोरिदम, रेटिंग, इंसेंटिव और भुगतान व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए। दुर्घटना, बीमारी, मातृत्व, वृद्धावस्था और अन्य सामाजिक जोखिमों के लिए प्रभावी सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
कंपनियों द्वारा बनाए गए अनुबंधों और वास्तविक कार्य-नियंत्रण की स्वतंत्र समीक्षा की जाए, ताकि कामगारों को केवल नाम के आधार पर “स्वतंत्र” बताकर श्रम अधिकारों से वंचित न किया जा सके।
गिग वर्कर्स की आवाज और प्रतिनिधित्व को कानून के तहत बनने वाली संस्थाओं में सुनिश्चित किया जाए।

 सवाल है कि अगर राइडर कर्मचारी नहीं है, तो उसकी आईडी बंद करने का अधिकार किस आधार पर ? अगर गिग वर्कर स्वतंत्र है, तो कंपनी का अनुबंध उसकी आजीविका को नियंत्रित क्यों करता है ?
अगर कंपनी को कामगार के काम पर नियंत्रण का अधिकार है, तो कामगार को सामाजिक सुरक्षा और सम्मान का अधिकार क्यों नहीं ? गिग वर्कर्स केवल ऐप पर दिखाई देने वाली एक आईडी नहीं हैं। वे मेहनतकश इंसान हैं, जिनके श्रम से शहरों की अर्थव्यवस्था चलती है।
 मांग है “रेटिंग नहीं, हक चाहिए! “आईडी बंद करने की धमकी नहीं, काम की सुरक्षा चाहिए!“जो शहर चलाते हैं, उनके जीवन की भी सुरक्षा हो!”

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