"मन के मनके" माहिया संग्रह में कहीं उलाहना कहीं कटाक्ष और कहीं श्रृंगार को पिरोया है

० सतेन्द्र धारीवाल 'धारी' ० 
अमरोहा, उत्तर प्रदेश : "मन के मनके" एक ऐसा साझा संग्रह जिसमें 61 रचनाकारों ने अपने मनोभावों की अभिव्यक्ति को माहिया छंद के रूप में व्यक्त किया सभी रचनाकारों का प्रयास अतुल्यनीय रहा। इस संग्रह की संपादिका डॉ. संतोष कुमारी संप्रीती ने निश्चित रूप से गहन निष्ठा और लगन के साथ इस संग्रह को संपादित किया।

 वह पूरी निष्ठा के साथ अपने इस संकल्पित कार्य में लगी रहीं और अंततः इसे पूरा किया। संतोष संप्रीती स्वयं साहित्यकार के रूप में बड़ा नाम है जो लगभग हर विधा में अपनी लेखनी को अनवरत चलाती रहती हैं। जहां तक रचनाकारों का प्रश्न आता है तो सभी रचनाकारों ने अपनी अहम् भूमिका निभाई और लेखन में पूरी निष्ठा के साथ लगे रहे और अपना श्रेष्ठ देने का प्रयास किया। 
सभी रचनाकारों ने अलग-अलग विषयों पर माहिया छंद लिखे इस माहिया संग्रह को संग्रहित करने में संतोष संप्रीती जी का अहम् योगदान रहा है मैंने सभी रचनाकारों के माहिया छंदों को, एक-एक शब्द को, एक-एक अक्षर को और उनके भावों को पढ़ा है। इसके साथ ही छंदों में मात्राओं के भार को भी सही करने में अपना अथक प्रयास किया। सबसे पहले मैं बात करता हूं निश्छल की जिन्होंने अपने माहिया छंदों में विभिन्न पहलुओं पर अपनी लेखनी को चलाया और समय-सामायिक शब्दों का प्रयोग सहज और सरल भाषा में किया जैसे

कल किसने देखा है
सोच समझकर पढ़
किस्मत का लेखा है ।
अपने आप में अतुल्यनीय है। हंस जैन के माहिया आत्म विभोर कर देते हैं जैसे

पाकर भी कुछ खोना
नदियों से सीखा
हमने सागर होना।

माहिया छंदों के भाव अंतर मन की गहराई तक उतरते चले जाते हैं। प्रज्ञा ने भी अपनी लेखनी में उत्कृष्टता दर्शायी है और छंदों में श्रृंगार रस का माधुर्य भी है। जैसे
तुम छतरी ले आना
घूमें बागों में
सुन कोयल का गाना।

इसी क्रम में सुषमा भंडारी हों या सरिता गुप्ता या उमंग जौली सरीन सभी ने अपनी अपनी शैली के साथ पूरा न्याय किया है। संतोष संप्रीती के माहिया छंद वाकई में अतुल्यनीय हैं। सुधी पाठक यह ना समझें कि वह संम्पादिका है तो मैं उनकी तारीफ कर रहा हूं लेकिन उनके माहिया विभिन्न शैलियों पर विभिन्न परिदृश्यों का चित्रण करते हैं जो अपने आप में अनूठा और आकर्षक है। जिसमें निर्धन मन की वेदना, मां की ममता, बचपन की यादें उनकी रचनात्मक शैली को दर्शाती हैं। जैसे

कांटों का बिछौना है
जीवन निर्धन का
सेठों का खिलौना है।

वहीं पुष्पा शर्मा हों या कुसुम लता पुंडोरा आपकी लेखनी भी कितने ही भाव लिए पन्नों पर उभरी है कहीं राष्ट्र के भाव कहीं ईश्वर में आस्था कहीं श्रृंगार की झलक आपकी लेखनी को और गरिमामई बनाती है। मैं अपने स्वयं के लिए तो कुछ नहीं कह सकता कि मेरा लेखन किस स्तर का है लेकिन मैं श्रृंगार रस और वीर रस का कवि हूं तो संभवतः मैंने संयोग श्रृंगार और वियोग श्रृंगार दोनों में अपने मनोभावों की अभिव्यक्ति को व्यक्त करने की कोशिश की है। जैसे

अपना जब माना है
सदियों तक तेरा
अब साथ निभाना है।

 हर रचनाकार ने अपनी क़लम में मन की चाहा, दिल का दर्द, सीमा पर खड़े जवानों का त्याग, बलिदान और मां जैसे शीर्षक पर अपने छंदों में अपने मनोभावों की अभिव्यक्ति को बहुत ही सुंदर तरीके से अभिव्यक्त किया है इस क्रम में अंजू क्वात्रा ने मां अम्बे पर अपने मनोभावों को अभिव्यक्त किया है। सतविंदर कौर, चित्रलेखा और देवेंद्र नारायण दास ने अपने माहिया छंदों में श्रृंगार रस को वरीयता प्रदान की जिसमें समर्पण त्याग और निष्ठा समाहित है। हिम्मत चौरडिया ने अपने मन के उद् गार कुछ इस तरह व्यक्त किये

दिल हार नहीं मानो
लाख घिरो आंधी
संकल्प हृदय ठानो।

हरदीप कौर ने अपने छंदों में मां, पिता और जीवनसाथी जैसे विषय पर अद्भुत छंदों का सृजन किया। नीता अवस्थी के छंदों में सावन की रिमझिम की बूंदे जन्मों के बंधन और एक मुस्कान जो दिल में उतर जाती है या घायल कर देती है यादों के एहसास दिलाती हुई खुशियों की बरसात तक का सफ़र तय किया है। राजपाल यादव ने अपने माहिया छंदों में देश को स्थान दिया, सरहद को स्थान दिया और उन वीर जवानों को स्थान दिया जो देश की सेवा में तत्पर लगे रहते हैं। आपके छंद मन में देशभक्ति का उन्माद जगाते हुए आंखों को नम कर जाते हैं जैसे

जब अंत समय आए
लिपट तिरंगे में
शव मेरा घर जाए।

नरेश चंद उनियाल की लेखनी प्राकृतिक परिदृश्यों और प्रेम पर खूब चली है। सुदर्शन शर्मा, पुनीता सिंह, धर्मपाल धर्म, और सुरेंद्र शर्मा सागर ने काली घटाओं के बीच बरसते मेघों और प्रियतम/प्रियतमा के लिए उभरते भाव जैसे सजीव चित्रण अपने छंदों में उकेरे हैं जो आपकी लेखनी को उत्कृष्टता प्रदान करते हैं। वंदना तिवारी ने अपने छंदों में अलग-अलग विधाओं को लिया है कहीं शिव की आराधना कई राधा और कृष्ण का प्रेम और कहीं अपने अंतर मन में प्रेम की अनुभूति जैसे चित्रण प्रतीत होते हैं। गुरचरन मेहता ने भी अपने छंदों में कहीं उलाहना कहीं कटाक्ष और कहीं श्रृंगार को पिरोया है। पूनम मनचंदा ने अपने माहिया छंदों में एक दो छंद को छोड़कर पूर्ण रूप से श्रृंगार रस को वरीयता दी है और अनुपम सृजन किया है जैसे

दिल मेरा प्यासा है
अखियां बरस रहीं
जैसे चौमासा है।

पारुल राज, रजनी बाला सहज, अन्नपूर्णा गुप्ता सरगम, सुरेंद्र कौर और रचना निर्मल के छंदों में ममता, मिट्टी की ख़ुशबू , वृंदावन के रंग, जमुना का तट, पिया मिलन की आस, साहस और नारी पर अपने भावों की अभिव्यक्ति दिखाई देती है। सुरेखा साहू, वंदना चौधरी, चंद्रमणि मणिका, कृष्ण राजपुरोहित, प्रमोद गोल्हानी, सोनम यादव, अलका जैन आनंदी, पूनम अरोड़ा और अंजू कालरा के माहिया छंदों में जहां दर्द को भूलने की बात होती है, सूखी धरती पर बरसात की बात होती है, देते हुए भाव जो धैर्य संयम और नैतिकता का सबक सिखाते हैं।

 किसी के माहिया छंदों में गुरु संगत पर चलने की प्रेरणा है तो कहीं पागल मन की बात होती है तो कहीं मनभावन फूल चुनने बागो में जाते दिखाई देते हैं। कोई प्रिया से प्रीत निभाने का आग्रह करता हुआ छंद तो कहीं होली के रंग तो कहीं मन की हर अभिलाषा को गीतों में भरने की चाहत तो कहीं नारी को संदेश देते शब्द, दीपक बनकर दुविधा को हर ले और बाती की तरह खिल जाना इस तरह की भावनाएं दिखाई देती हैं। कहीं मां सरस्वती से प्रार्थना के भाव तो कहीं प्रकृति का सुखद वर्णन तो कहीं अपने प्रियतम से मिलने की चाहत और कहीं पर कुछ पल जीने की चाहत संजोए पल-पल मरने की वेदना दिखाई देती है।

 यही तो विशेषता है रचनाकारों की, कलमकारों की जो अपने मन के भावों को जो उन्हें सामाजिक परिवेश में जगह-जगह बिखरे हुए दिखाई दे जाते हैं और वह अपने उत्कृष्ट लेखन से उन भावों को कुछ इस तरह पिरोते हैं जो सार्थक और यथार्थ बन जाते हैं। महेंद्र भट्ट, स्वीटी सिंघल, देवव्रत शर्मा, बिट्टू जैन, सुरेश चंद्र शर्मा जोशी, शालिनी खन्ना, संगीता चौधरी, बृजेश कुमार, स्नेहलता पांडे, सूफिया ज़ैदी इन सभी रचनाकारों के माहिया छंदों में गहनता का चोला ओढ़े शब्द जैसे

औकात नहीं तुझमें
झुक जाऊंगा मैं
वो बात नहीं मुझमें।

भावों की ओर सरिता बहाती हुई शब्दों की सटीकता तो कहीं मां के चरणों में धरती पर स्वर्ग और मां के आंचल में ममत्व की छांव के दर्शन होते हैं। तो कहीं पर कुछ तो तुम भी बोलो कब से मौन खड़े हो यह कहकर प्रेम रूप को दर्शाने वाले शब्द दिखाई देते हैं। कहीं-कहीं पर सूरज की गर्मी से अकुलाए हुए पंछी की मन वेदना और बादलों से प्रार्थना करते हुए शब्द जो तन को नमी दे जाते हैं। इस माहिया संग्रह में बेटी को दर्शाते शब्द जिसके बिना घर, घर नहीं लगता, आंगन सूना सा लगता है त्योहारों पर वह खुशियां नदारद होती हैं ऐसी भावनाओं को दर्शाते हुए यह माहिया छंद अनुपम है।

मधु पारख, हीरालाल यादव, नरेश तोमर, सुषमा चौरे, रवींद्र वर्मा, नवीना सोनी, सुमंगला सुमन ने भी अपने माहिया छंदों में झूठे वादे करके अपने ही दिल को बहलाती हुई पंक्तियां दिखाई देती हैं कहीं श्रृंगार की पराकाष्ठा जैसे फूलों का कानन भी आग लगाता है जैसे शब्द तो कहीं होली में खतों को जलाने की सलाह विरह की पराकाष्ठा को दर्शाता है कहीं भारत की महिमा, कहीं चिंतन, कहीं सावन की मस्त मल्हार, कहीं होली के रंग और साथ निभाने के वादे दिखाई देते हैं घर द्वारा सूना लगता है कहीं बंधन सदियों के प्रतीत होते हैं जैसे

यह दिल वीराना है
बारिश यादों की
ना ठौर ठिकाना है।

मोहिनी पांडे, प्रदीप भट्ट, शकुंतला मित्तल और श्री राम तिवारी के साथ मैं अपनी समीक्षा के पथ पर चलते हुए मंजिल की ओर अग्रसर हूं और मंजिल नज़दीक है यहां इन माहिया छंदों में जीवन की झलक, सांसों में सरगम, बोली में मिश्री और अपने अनुभवों को साझा करना जैसे गरिमामयी शब्द इन छंदों की शोभा बढ़ा रहे हैं जैसे मां के ऊपर लिखा ये छंद,,,

मन से मां को ध्याएं
विपदा सकल हरे
सुखचैन सभी पाएं।

बाबा भोलेनाथ पर लिखे हुए यह माहिया छंद अपने आप में बहुत कुछ कहते हुए प्रतीत होते हैं जैसे
मन कैलाशी है
पर इतना समझो
शिव घट-घट वासी है।

 इस तरह 61 माहिया रचनाकारों के 915 छंदो को पढ़कर और उनका अध्ययन करने के उपरांत मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि मन के मनके यह माहिया संग्रह अपने आप में मनोभावों का वह सागर है जो अपने अंदर कोटि-कोटि अनमोल रत्नों को सहेजे हुए है। संतोष संप्रीती ने इस माहिया संग्रह मन के मनके के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत के साथ इसका संपादन किया। मैं सभी रचनाकारों को उनके उत्कृष्ट लेखन के लिए भी बधाई देता हूं जिन्होंने अपने लेखन से इस माहिया संग्रह को उत्कृष्टता प्रदान की।

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