जलवायु परिवर्तन का संकट दिनों दिन जानलेवा होता जा रहा है
0 ज्ञानेन्द्र रावत 0
जलवायु परिवर्तन का संकट अब दिनोंदिन जानलेवा होता जा रहा है। दरअसल दुनिया में ऊर्जा की जरूरत पूरा करने के लिए कोयला, तेल और गैस का जो बेतहाशा इस्तेमाल हो रहा है, उससे होने वाले उत्सर्जन से जलवायु लक्ष्यों की पूर्ति असंभव है। तापमान बढ़ोतरी डेढ़ डिग्री सीमित रखने के लिए 2030 तक अपने उत्सर्जन को आधा करने के लक्ष्य की दिशा में कोई कारगर पहल न होने के परिणाम दिनों दिन और भयावह होते जा रहे हैं। फिर जलवायु परिवर्तन की विभीषिका की रोकथाम के लिए बनी वैश्विक सहमति भी बीते सालों में कमजोर पड़ी है।
जलवायु परिवर्तन का संकट अब दिनोंदिन जानलेवा होता जा रहा है। दरअसल दुनिया में ऊर्जा की जरूरत पूरा करने के लिए कोयला, तेल और गैस का जो बेतहाशा इस्तेमाल हो रहा है, उससे होने वाले उत्सर्जन से जलवायु लक्ष्यों की पूर्ति असंभव है। तापमान बढ़ोतरी डेढ़ डिग्री सीमित रखने के लिए 2030 तक अपने उत्सर्जन को आधा करने के लक्ष्य की दिशा में कोई कारगर पहल न होने के परिणाम दिनों दिन और भयावह होते जा रहे हैं। फिर जलवायु परिवर्तन की विभीषिका की रोकथाम के लिए बनी वैश्विक सहमति भी बीते सालों में कमजोर पड़ी है।
इसके साथ-साथ वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के स्तर में हो रही बढ़ोतरी ने चुनौतियों को और बढ़ा दिया है। सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि धरती की गर्म सांसों के चलते ऋतुओं की लय बिगड़ती चली जा रही है। हालात इतने खराब हो गये हैं कि जलवायु परिवर्तन से न केवल मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, उसकी सेहत पर आयेदिन खतरा बढ़ता जा रहा है, बच्चों का भविष्य छिनता जा रहा है,
वह लोगों में अकेलापन बढ़ा रहा है, महिलाओं पर गंभीर असर डाल रहा है, दुनिया की बहुमूल्य धरोहरों के अस्तित्व के संकट को बढ़ा रहा है, साथ ही वह दुनिया की हजारों पौध-प्रजातियों के घर ही नहीं छीन रहा है बल्कि उन पर विलुप्ति का खतरा भी मंडराने लगा है। दुनिया के हालिया शोध और अध्ययन इसके जीते-जागते सबूत हैं। वैश्विक तापमान में लगातार हो रही वृद्धि आने वाले समय में आशंकित विकट परिस्थितियों को लेकर चिंतायें बढ़ाती जा रही हैं।
सबसे बड़ी चिंता इस बात की है और एक अध्ययन में इस बात का खुलासा भी हुआ है कि यदि तापमान वृध्दि की दर इसी तरह बढ़ती रही तो साल 2085 तक भूमि पर एक तिहाई से ज्यादा जीव आवास यानी एनिमल हैबिटेट जलवायु परिवर्तन के कारण हीटवेव ( लू ) या जंगल में आग लगने जैसी चरम घटनाओं की चपेट में आ सकते हैं। यही नहीं जलवायु परिवर्तन की रफ्तार यही बरकरार रही तो इस सदी के आखिर तक दुनिया की हजारों पौध-प्रजातियां अपने प्राकृतिक आवास के बड़े हिस्से से न केवल महरूम हो जायेंगी,
बल्कि बहुतेरी पौध-प्रजातियों का अस्तित्व ही समाप्त हे जायेगा। यह संकट तेजी से शून्य उत्सर्जन की दिशा में कदम उठाने से इन दुष्प्रभावों को काफी हदतक टाला जा सकता है। जर्मनी की पाट्सडैम इंस्टीट्यूट फार क्लाइमेट इंफैक्ट रिसर्च के शोधकर्ताओं का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और विशेष रूप से चरम घटनाओं संरक्षण योजना के संदर्भ में अभी भी बहुत कम आंका जा रहा है। यह केवल कई बरसों में तापमान का धीरे-धीरे बदलाव नहीं होगा।
कई चरम घटनायें संयुक्त प्रभाव डाल सकती हैं और जैव विविधता के लिए सहकारी खतरे का निर्माण कर सकती हैं। दरअसल दुनियाभर में बढ़ता तापमान अब सिर्फ इंसान और जानवरों के लिए ही नहीं, बल्कि ऋतुओं के लिए भी खतरनाक बनता जा रहा है। धरती के वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों का स्तर आज उस मुकाम पर आ पहुंच गया है जो मानव इतिहास में कभी नहीं रहा। यदि हमने समय रहते कड़े कदम नहीं उठाये, तो दुनिया के संवेदनशील क्षेत्रों को जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव से बचाना मुश्किल हो जायेगा और ऋतुचक्र जो मानव सभ्यता के फलने-फूलने का आधार था, पूरी तरह नष्ट हो जायेगा।
जहां तक भारत का सवाल है, हमारी पारंपरिक पहचान उसके विविध ऋतुचक्र से रही है। पर अब यह चक्र टूट रहा है। इसका अहम कारण जलवायु परिवर्तन है। दरअसल भारत अब एक ऐसे दौर में पहुंच चुका है जहां चरम मौसम कोई अपवाद नहीं है, बल्कि वह रोजमर्रा की हकीकत बन गया है।धरती की गर्म सांसों के चलते ऋतुओं की लय बिगड़ती जा रही है। मौसम का यह बदला हुआ मिजाज केवल आंकड़ों तक ही सीमित नहीं रह गया है,
बल्कि यह अब आम आदमी की जीवन शैली को भी गहरे तक प्रभावित कर बदल रहा है। मानसून का समय अनिश्चित है। बेमौसम वर्षा से फसलें बर्बाद हो रही हैं। नतीजतन कृषि घाटा बढ़ता जा रहा है। सच्चाई यह है कि जलवायु परिवर्तन ने भारत के भौगोलिक पैटर्न को ही बदल दिया है। जो घटनायें पहले बरसों में एक आध बार होती थीं, वे अब सामान्य यानी आयेदिन होने लग गयी हैं। राजस्थान और लेह जैसे शुष्क और रेगिस्तानी इलाकों में अब बाढ आना आम बात हो गयी है।
जबकि इसके विपरीत चेरापूंजी जैसे अधिक वर्षा वाले इलाकों में सूखे जैसे हालात दिखाई देने लगे हैं। पहाड़ी राज्यों और हिमालयी इलाकों में सालभर तापमान सामान्य से अधिक दर्ज किया जा रहा है। इसके दुष्परिणाम स्वरूप ग्लेशियरों के पिघलने और पारिस्थितिक तंत्र के बिगड़ने का खतरा पैदा हो गया है। निष्कर्ष यह कि अब देश में ऋतुओं का आपस में विलय हो रहा है। सर्दी, गर्मी और बारिश के बीच की स्पष्ट रेखायें अब धुंधली पड़ने लगी हैं।
दरअसल तापमान बढ़ोतरी की दर यदि 1.5 डिग्री तक न रोकी गयी तो इसकी सबसे ज्यादा बड़ी कीमत भारत को चुकानी होगी। भारत के लगभग 60 करोड़ लोगों को भीषण गर्मी का सामना करना पड़ेगा। तापमान बढ़ने से मिट्टी तेजी से सूखने लगेगी। उस दशा में मिट्टी की नमी बरकरार रखने के लिए अधिकाधिक तादाद में भूजल निकालना होगा। परिणामस्वरूप भूजल स्रोत सूखने के कगार पर पहुंच जायेंगे। चूंकि हमारा देश गेंहूं व धान का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, ऐसी स्थिति में भूजल के सूखने के चलते गेंहूं और धान की फसल पर बुरा असर पड़ेगा।
दरअसल तापमान बढ़ोतरी की दर यदि 1.5 डिग्री तक न रोकी गयी तो इसकी सबसे ज्यादा बड़ी कीमत भारत को चुकानी होगी। भारत के लगभग 60 करोड़ लोगों को भीषण गर्मी का सामना करना पड़ेगा। तापमान बढ़ने से मिट्टी तेजी से सूखने लगेगी। उस दशा में मिट्टी की नमी बरकरार रखने के लिए अधिकाधिक तादाद में भूजल निकालना होगा। परिणामस्वरूप भूजल स्रोत सूखने के कगार पर पहुंच जायेंगे। चूंकि हमारा देश गेंहूं व धान का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, ऐसी स्थिति में भूजल के सूखने के चलते गेंहूं और धान की फसल पर बुरा असर पड़ेगा।
यही नहीं मत्स्य पालन, बागवानी और पशुपालन पर भी असर पड़े बिना नहीं रहेगा। यहां इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि तापमान में एक फीसदी की बढ़ोतरी बादलों में सात फीसदी से ज्यादा पानी भर देगा। नतीजतन बादल फटेंगे और उस दशा में बाढ़ और भूस्खलन की भयावहता का खतरा बढ़ेगा। एक अनुमान के अनुसार भारत में हर साल बाढ़ और भूस्खलन के चलते तीन हजार के करीब लोग मौत के मुंह में चले जाते हैं।
तापमान बढ़ने से हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने का सिलसिला खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। इसके चलते ग्लेशियर पीछे खिसक रहे हैं। गंगोत्री ग्लेशियर की हालत तो और बुरी है। वह 15-20 मीटर प्रति वर्ष की दर से पिघल रहा है। बीते 30 सालों में वह तकरीबन 700 मीटर पिघल चुका है। कुछ दूसरे ग्लेशियरों की हालत तो और भी बुरी है। कुछ के तो पिघलने से बनी विशालकाय झीलें फटने से भीषण बाढ़ के खतरे की आशंका हमेशा बनी रहती है।
हमारे यहां लोहान्स्क और स्विट्ज़रलैंड के बर्च ग्लेशियर के टूटने से उसके नीचे बसे गांव ब्लाटन के दबने की घटना इसकी जीती जागती मिसाल है। वैज्ञानिकों की राय है कि ग्लेशियर के पिघलने से भूस्खलन का खतरा बना रहता है। इनके सूख जाने पर गंगा जैसी सदानीरा नदियों के बरसाती नदी के रूप में तब्दील होने और आसन्न जल संकट की विकरालता से कभी भी दो चार होना पड़ सकता है।
यदि बीते सालों में किये गये सर्वेक्षणों की मानें तो भारत के 85 फीसदी लोग जलवायु परिवर्तन से चिंतित हैं और 87 फीसदी चाहते हैं कि उसकी रोकथाम के शीघ्र उपाय किये जाने चाहिए। हमें यह भी जान-समझ लेना होगा कि जलवायु परिवर्तन कोई ऐसी जंग नहीं है जिसमें देश की सीमा पर सेना भेजकर जीत लिया जाये। बल्कि यह तो ऐसी विलक्षण जंग है जिसमें दुश्मन हमारे ही भीतर बैठा है। उसको निजी व्यवहार को बदले बिना नहीं जीता जा सकता।
दावे कुछ भी किये जायें हकीकत यह है और दुनियाभर के शोधों-अध्ययनों का निष्कर्ष यह भी है कि मौजूदा हालात को देखते हुए जलवायु परिवर्तन को रोकने की कोशिशें नाकाफी हैं और यह भी सच है कि जलवायु परिवर्तन का संकट दिनोंदिन विकराल होता जा रहा है। वैश्विक तापमान को अगले सौ वर्षों में डेढ डिग्री सेल्सियस से ऊपर नहीं बढ़ने देने का लक्ष्य हासिल कर लेने के बावजूद विश्व के संवेदनशील क्षेत्रों को जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से बचा पाना आसान नहीं होगा।
यदि बीते सालों में किये गये सर्वेक्षणों की मानें तो भारत के 85 फीसदी लोग जलवायु परिवर्तन से चिंतित हैं और 87 फीसदी चाहते हैं कि उसकी रोकथाम के शीघ्र उपाय किये जाने चाहिए। हमें यह भी जान-समझ लेना होगा कि जलवायु परिवर्तन कोई ऐसी जंग नहीं है जिसमें देश की सीमा पर सेना भेजकर जीत लिया जाये। बल्कि यह तो ऐसी विलक्षण जंग है जिसमें दुश्मन हमारे ही भीतर बैठा है। उसको निजी व्यवहार को बदले बिना नहीं जीता जा सकता।
दावे कुछ भी किये जायें हकीकत यह है और दुनियाभर के शोधों-अध्ययनों का निष्कर्ष यह भी है कि मौजूदा हालात को देखते हुए जलवायु परिवर्तन को रोकने की कोशिशें नाकाफी हैं और यह भी सच है कि जलवायु परिवर्तन का संकट दिनोंदिन विकराल होता जा रहा है। वैश्विक तापमान को अगले सौ वर्षों में डेढ डिग्री सेल्सियस से ऊपर नहीं बढ़ने देने का लक्ष्य हासिल कर लेने के बावजूद विश्व के संवेदनशील क्षेत्रों को जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से बचा पाना आसान नहीं होगा।
क्योंकि आर्कटिक और दक्षिण पूर्व एशियाई मानसून जैसे विश्व के क्षेत्रों को होने वाली अपरिवर्तनीय क्षति से रोक पाना बहुत ही दुष्कर कार्य है। ऐसी स्थिति में भारत को विभिन्न क्षेत्रों के लिए अपने उत्सर्जन लक्ष्य नये सिरे से तय करने की जरूरत है। जबकि क्लाइमेट ट्रांसपेरेंसी की रिपोर्ट की मानें तो 2030 तक भारत के ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भी करीब करीब दोगुने की बढ़ोतरी होने की आशंका है।
फिर जलवायु परिवर्तन से वेलकम ट्रस्ट और क्लाइमेट ओपिनियन रिसर्च के अध्ययन द्वारा सेहत पर होने वाले भयावह खतरे की चेतावनी ने चिंता को और बढ़ा दिया है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण की चिंता नहीं रह गया है, बल्कि यह अब लोगों के शरीर, उनकी सांस, उनके बच्चों की सेहत की चिंताओं तक पहुंच गया है। इसलिए जीवन शैली में बदलाव समय की महती आवश्यकता है तभी हम जलवायु परिवर्तन के दानव से कुछ हदतक मुकाबला कर पाने में कामयाब हो सकते हैं।
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