" मैं सफ़र में हूँ "पुस्तक की दो गज़ल आपके समक्ष
० सुषमा भंडारी ० गज़ल का अपना अनुशासन अपनी बंदिशें होती हैं ये पंक्तियां देवेंद्र मांझी ने मेरी पुस्तक " मैं सफ़र में हूँ " की भूमिका में लिखा है। मैं अपने विषय में व्यक्तिगत रूप से कहूँ तो लेखन में मुझे स्वतंत्रता चाहिए मगर छंद तो छंद हैं जो लेखन की खूबसूरती को बढ़ाते हैं उनके श्रृंगार के समान हैं , हाँ ये जरूर कहूँगी गज़ल का मीटर बहुत ही मुश्किल है मुझे तख्ती हाथ में उठानी पड़ी। अब भी मुझसे त्रुटियां हो जाती हैं बहुत प्रयास करना पड़ता है यही कारण है अब तक दूसरा संग्रह तैयार नहीं हुआ है कोशिश जारी है। खैर इस संग्रह की सभी गज़ल मुझे प्रिय हैं मगर छोटी बहर 2122 2122 212 अति प्रिय है । पुस्तक की दो गज़ल आपके समक्ष सच कहा तो पत्थरों से दी सज़ा क्या यही है ज़िंदगी का आईना दिल मेरे से खेल कर न जाइए दिल मेरा नाज़ुक बहुत है कांच - सा अपने दिल में आप ग़र देते जगह क्या बिगड़ जाता बताओ आपका गुलशनों का है नहीं नामों - निशां दूर तक मंज़र है रेगिस्तान का झेलती ' सुषमा ' रही है हर समय हादसा - दर - हादसा - दर - हादसा कोई तूफ़ां सचमुच उससे हारा होगा नैया को तब जाकर मिला ...