जग जननी माँ तारिणी, तेरे रूप अनेक

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सुषमा भंडारी ० 
जग जननी माँ तारिणी, तेरे रूप अनेक।
जीवन ज्योति अम्बिके ,जाने है प्रत्येक।।

नौ रूपों में है अलग,देती तू संदेश।
माँ दुर्गा माँ चण्डिके ,तेरे लम्बे केश।।

खडगधारिणी मैं करूँ, शत-शत यूँ प्रणाम ।
तुझसे ही माँ आसरा, तुझसे बनते काम।।

शेर सवारी तू करे, करे रक्त का पान।
माँ मुझको तो दे सदा, होंठो पर मुस्कान।।

प्यार सदा तुझसे करूँ,ऐसा दे वरदान।
चर्चाओं में मैं तेरा ,सदा करूँ गुणगान।।

बहुत अंधेरों ने दिये,काले दिन और रात।
मैया मुझको चाहिए ,खुशियों का प्रभात।।

भोर गई , दिन भी गया,बची हुई है शाम।
लेकिन बाकी हैं अभी, मेरे सारे काम।।

तेरे अष्टम रूप पर,दुनिया हुई निहाल।
माँ मैं तेरी बालिका, कर दे मालामाल।।

मैया तेरे रूप पर,वारी- वारी जाऊँ।
मैं हूँ तेरी लाडली, हरदम मैं मुस्काऊँ।।

झूठा सर चढ़ बोलता, सच्चाई खामोश।
चला जरा अपना खड़ग,आ जाये सब होश।।

टिप्पणियाँ

बेनामी ने कहा…
हार्दिक आभार आरिफ जी
जय माता की

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