"स्वर मौन के" ( हाइकु )
० सुषमा भंडारी ०
गैर कानूनी
कुछ नहीं है अब
खोजें तरीके
मौका परस्त
व्यक्ति ही तो करता
व्यवस्था ध्वस्त
ढर्रे - ढर्रे में
घुसा है भ्रष्टाचार
जर्रे - जर्रे में
शैताँ हो गए
मायावी लोग यहाँ
इंसाँ हो गए
धर्म का नाम
लेकर कराते हैं
लोग फसाद
गूंगी बहरी
सरकार हमारी
चिल्लाते रहो
दीप धर्म का
जला जिस समय
हुआ उजाला
स्वर मौन के
हिला देते हैं नींव
लगता डर
सीना तान के
खड़े हैं सीमा पर
वीर सपूत
हर पहर
कंटकों की डगर
फौजी सफ़र
गैर कानूनी
कुछ नहीं है अब
खोजें तरीके
मौका परस्त
व्यक्ति ही तो करता
व्यवस्था ध्वस्त
ढर्रे - ढर्रे में
घुसा है भ्रष्टाचार
जर्रे - जर्रे में
शैताँ हो गए
मायावी लोग यहाँ
इंसाँ हो गए
धर्म का नाम
लेकर कराते हैं
लोग फसाद
गूंगी बहरी
सरकार हमारी
चिल्लाते रहो
दीप धर्म का
जला जिस समय
हुआ उजाला
स्वर मौन के
हिला देते हैं नींव
लगता डर
सीना तान के
खड़े हैं सीमा पर
वीर सपूत
हर पहर
कंटकों की डगर
फौजी सफ़र

टिप्पणियाँ
सुनते ही बदले
मन स्वभाव