रावण का पश्चाताप,जो हमें अपने भीतर झाँकने के लिए विवश करता है
० श्याम कुमार कोलारे ० मैं रावण हूँ ! मुझे कौन नहीं जानता ? जी हाँ, मैं वही रावण हूँ, जिसे हर वर्ष दशहरे की रात बड़े धूमधाम से जलाया जाता है। मेरे पुतले के दहन के साथ ही लोग असत्य पर सत्य की विजय, अधर्म पर धर्म की विजय और बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाते हैं। मुझे दुराचारी, दुष्ट, कपटी और अहंकारी जैसे अनेक नामों से पुकारा जाता है। लोग मेरे दस सिरों को बुराइयों का प्रतीक मानते हैं और हर वर्ष मेरे पुतले को आग के हवाले करके यह विश्वास करते हैं कि उन्होंने बुराई पर विजय प्राप्त कर ली है। हाँ, मैं स्वीकार करता हूँ कि मैंने ऐसे कर्म किए, जिनके लिए मुझे कभी क्षमा नहीं मिल सकती। मेरा सबसे बड़ा अपराध माता सीता का अपहरण करना था। मैंने अपनी शक्ति, अपने सामर्थ्य और अपने अहंकार के मद में एक नारी की स्वतंत्रता, सम्मान और मर्यादा का अपमान किया। यही मेरी सबसे बड़ी भूल थी, जिसकी कीमत मुझे अपने जीवन, अपने परिवार और अपने स्वर्णिम साम्राज्य को खोकर चुकानी पड़ी। आज भी हर वर्ष मेरा पुतला जलाया जाता है और मैं मानो अपनी उसी भूल की सजा भुगत रहा हूँ। लेकिन आज मैं आपसे अपने मन की कुछ बातें कहना च...