रावण का पश्चाताप,जो हमें अपने भीतर झाँकने के लिए विवश करता है

० श्याम कुमार कोलारे ० 
मैं रावण हूँ ! मुझे कौन नहीं जानता ? जी हाँ, मैं वही रावण हूँ, जिसे हर वर्ष दशहरे की रात बड़े धूमधाम से जलाया जाता है। मेरे पुतले के दहन के साथ ही लोग असत्य पर सत्य की विजय, अधर्म पर धर्म की विजय और बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाते हैं। मुझे दुराचारी, दुष्ट, कपटी और अहंकारी जैसे अनेक नामों से पुकारा जाता है। लोग मेरे दस सिरों को बुराइयों का प्रतीक मानते हैं और हर वर्ष मेरे पुतले को आग के हवाले करके यह विश्वास करते हैं कि उन्होंने बुराई पर विजय प्राप्त कर ली है।

 हाँ, मैं स्वीकार करता हूँ कि मैंने ऐसे कर्म किए, जिनके लिए मुझे कभी क्षमा नहीं मिल सकती। मेरा सबसे बड़ा अपराध माता सीता का अपहरण करना था। मैंने अपनी शक्ति, अपने सामर्थ्य और अपने अहंकार के मद में एक नारी की स्वतंत्रता, सम्मान और मर्यादा का अपमान किया। यही मेरी सबसे बड़ी भूल थी, जिसकी कीमत मुझे अपने जीवन, अपने परिवार और अपने स्वर्णिम साम्राज्य को खोकर चुकानी पड़ी।

आज भी हर वर्ष मेरा पुतला जलाया जाता है और मैं मानो अपनी उसी भूल की सजा भुगत रहा हूँ। लेकिन आज मैं आपसे अपने मन की कुछ बातें कहना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि मेरी कहानी को केवल एक पौराणिक कथा समझकर भुला न दिया जाए, बल्कि उससे कुछ सीखा जाए। क्योंकि मेरी हार में छिपी सीख आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी मेरे समय में थी।

मेरे पास किस चीज की कमी थी? - आज जब मैं अपने बीते हुए जीवन को याद करता हूँ, तो मन में एक ही प्रश्न उठता है- आखिर मेरे पास किस चीज की कमी थी, जो मुझे उस अपराध की ओर ले गई? मेरे पास सोने की लंका थी, जिसकी समृद्धि और वैभव की चर्चा दूर-दूर तक होती थी। मेरे पास महाबली भाई कुंभकर्ण था, जो मेरे लिए अपने प्राणों तक की परवाह नहीं करता था। 

विभीषण जैसा विवेकशील भाई था, जो सदैव मुझे सही मार्ग दिखाने का प्रयास करता था। मेघनाद जैसा पराक्रमी पुत्र था, जिसने अपनी वीरता से देवताओं तक को चुनौती दी थी। मेरी पत्नी मंदोदरी बुद्धिमती थी, जो समय-समय पर मुझे अनुचित कार्यों से बचने की सलाह देती थी। मैं स्वयं भगवान शिव का परम भक्त, वेदों और शास्त्रों का ज्ञाता, महान विद्वान, तपस्वी और शक्तिशाली राजा था। मैंने अपनी तपस्या और परिश्रम से अनेक उपलब्धियाँ प्राप्त की थीं। मेरे पास ज्ञान था, शक्ति थी, संपत्ति थी, प्रतिष्ठा थी और एक विशाल साम्राज्य भी था।

फिर भी मैं हार गया!- क्योंकि मेरे पास सब कुछ था, लेकिन अपने अहंकार पर नियंत्रण रखने का विवेक नहीं था। मैं दूसरों पर विजय प्राप्त करना जानता था, लेकिन अपने मन की बुराइयों पर विजय प्राप्त करना भूल गया था। मैं अपनी शक्ति को अपनी सफलता का आधार समझता रहा, लेकिन यह नहीं समझ पाया कि शक्ति के साथ विनम्रता और ज्ञान के साथ विवेक का होना भी आवश्यक है। मुझे पता ही नहीं चला कि मेरा आत्मविश्वास कब अहंकार में बदल गया और मेरा अभिमान कब मेरी बुद्धि पर पर्दा डालने लगा। सच ही कहा गया है—विनाशकाले विपरीत बुद्धि। मेरे साथ भी यही हुआ। जिस ज्ञान पर मुझे गर्व था, वही ज्ञान मुझे मेरे पतन से नहीं बचा सका।

बहन का स्नेह और मेरी सबसे बड़ी भूल- मेरे जीवन में एक ऐसा समय आया, जब मेरी बहन शूर्पणखा की बातों ने मेरे विवेक को प्रभावित किया। मैंने उसकी बातों को सुना, लेकिन परिस्थितियों की सच्चाई को समझने का प्रयास नहीं किया। मैंने क्रोध और बदले की भावना में निर्णय लिया। अपने विवेक का उपयोग करने के बजाय मैंने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना उचित समझा। मैं यह भूल गया कि किसी अपने के प्रति प्रेम और स्नेह का अर्थ उसकी हर बात को बिना सोचे-समझे सही मान लेना नहीं होता।

 सच्चा स्नेह वह है, जो हमें सत्य का साथ देना सिखाए, न कि किसी की गलती को छिपाकर दूसरे का अहित करने के लिए प्रेरित करे। आज मुझे समझ आता है कि किसी की बात सुनकर बिना सत्यता की जाँच किए निर्णय लेना कितना घातक हो सकता है। क्रोध में लिया गया एक गलत निर्णय वर्षों की मेहनत, प्रतिष्ठा और संबंधों को नष्ट कर सकता है। किसी के साथ छल-कपट करके हम दूसरों के लिए ही नहीं, बल्कि अपने लिए भी विनाश का रास्ता तैयार करते हैं।

 काश! उस समय मैंने अपने क्रोध को नियंत्रित किया होता।  काश! मैंने अपने विवेक की आवाज सुनी होती। काश! मैंने यह समझ लिया होता कि किसी भी परिस्थिति में नारी का अपमान करना उचित नहीं है। लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया और मेरी यही भूल मेरे संपूर्ण विनाश का कारण बनी।

अहंकार ने मुझसे सब कुछ छीन लिया- मैं स्वयं को अत्यंत बुद्धिमान और शक्तिशाली समझता था। मुझे अपने ज्ञान, तपस्या और उपलब्धियों पर गर्व था। इसमें कोई संदेह नहीं कि मैंने अपनी शक्ति और सामर्थ्य को प्राप्त करने के लिए कठोर परिश्रम किया था। मैंने तपस्या की, साधना की और अपने पुरुषार्थ से ऊँचा स्थान प्राप्त किया था। लेकिन धीरे-धीरे मेरा अभिमान इतना बढ़ गया कि मैं स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगा। मुझे लगने लगा कि मेरी शक्ति के सामने कोई टिक नहीं सकता और मेरी इच्छा के विरुद्ध कोई कुछ नहीं कर सकता।

यही मेरी सबसे बड़ी भूल थी - मैं यह समझ ही नहीं पाया कि शक्ति का अर्थ दूसरों को झुकाना नहीं, बल्कि कमजोर और असहाय लोगों की रक्षा करना है। ज्ञान का अर्थ दूसरों को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि सही और गलत के बीच अंतर समझना है। और राजा होने का अर्थ केवल शासन करना नहीं, बल्कि अपने राज्य के प्रत्येक व्यक्ति के अधिकारों और सम्मान की रक्षा करना है। मैंने अपनी शक्ति का उपयोग दूसरों पर अधिकार जमाने के लिए किया। 

मैंने अपनी बुद्धि का उपयोग अपने गलत निर्णय को सही साबित करने के लिए किया। जब मुझे समझाने वाले लोगों की बात सुननी चाहिए थी, तब मैंने उनकी सलाह को अनदेखा कर दिया। मेरे भाई विभीषण ने मुझे समझाया। मेरी पत्नी मंदोदरी ने मुझे चेताया। अनेक अवसरों पर मुझे अपनी गलती सुधारने का मौका मिला, लेकिन मैंने अपने अहंकार के कारण किसी की बात नहीं मानी। आज मैं स्वीकार करता हूँ कि जिस व्यक्ति को अपनी गलती स्वीकार करने में शर्म आती है, उसका पतन उसी दिन शुरू हो जाता है। गलती करना मनुष्य का स्वभाव हो सकता है, लेकिन गलती पर अड़े रहना उसके विनाश का कारण बन सकता है।

नारी का अपमान ही मेरे विनाश का कारण बना- मैंने सीता का अपहरण करके केवल एक नारी का अपमान नहीं किया, बल्कि अपनी मर्यादा, अपने ज्ञान और अपने सामर्थ्य को भी कलंकित किया। मैं यह भूल गया कि किसी नारी को उसकी इच्छा के विरुद्ध अपने अधिकार में रखना उसकी स्वतंत्रता और सम्मान का हनन है। मुझे लगता था कि मेरी शक्ति मुझे हर कार्य करने का अधिकार देती है। लेकिन मैं गलत था। कोई भी व्यक्ति कितना ही शक्तिशाली, धनवान, विद्वान या प्रतिष्ठित क्यों न हो, उसे किसी दूसरे व्यक्ति की गरिमा को ठेस पहुँचाने का अधिकार नहीं है।

 मेरा साम्राज्य सोने का था, लेकिन मेरे विचारों पर अहंकार का अंधकार छा गया था। मेरी लंका वैभव से भरी थी, लेकिन मेरे निर्णयों में विवेक का अभाव था। मेरे पास अपार संपत्ति थी, लेकिन मैं उस नैतिक संपदा को खो चुका था, जो मनुष्य को वास्तव में महान बनाती है। मेरी कहानी आज भी यही संदेश देती है कि नारी का सम्मान किसी समाज की सभ्यता और संस्कारों की पहचान है। बेटी हो, बहन हो, पत्नी हो या माँ- हर नारी को सम्मान, सुरक्षा और स्वतंत्रता के साथ जीने का अधिकार है।

 किसी भी नारी के साथ दुर्व्यवहार, उत्पीड़न या अन्याय को उसकी वेशभूषा, व्यवहार या परिस्थिति के आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता। यदि मेरे पतन से समाज यह सीख ले कि नारी का अपमान करने वाला व्यक्ति चाहे कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, उसका अहंकार एक दिन उसे विनाश की ओर ले जा सकता है, तो शायद मेरे जीवन की त्रासदी से कोई सार्थक संदेश निकलेगा।

आज के रावणों से मेरा एक प्रश्न- मैं तो अपने कर्मों के कारण इतिहास में बुराई का प्रतीक बन गया। मेरी गलती स्पष्ट थी और उसका परिणाम भी सामने आया। लेकिन आज मैं जब इस संसार को देखता हूँ, तो मेरे मन में एक प्रश्न उठता है। आज जो लोग श्रीराम का नाम लेकर मेरे पुतले का दहन करते हैं, क्या वे वास्तव में श्रीराम के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाते हैं? क्या वे सत्य, मर्यादा, करुणा, न्याय और नारी सम्मान के मार्ग पर चलते हैं? या फिर वे केवल एक परंपरा निभाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं?

 आज समाज में अनेक ऐसे लोग दिखाई देते हैं, जो बाहर से धर्म और नैतिकता की बातें करते हैं, लेकिन अपने व्यवहार में दूसरों के अधिकारों का सम्मान नहीं करते। कहीं महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार होता है, कहीं बेटियों के सपनों को दबाया जाता है, कहीं कमजोर व्यक्ति का शोषण किया जाता है और कहीं धन, पद तथा शक्ति के अहंकार में दूसरों को अपमानित किया जाता है।

समाचार पत्रों और समाचार चैनलों में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों, छल-कपट, भ्रष्टाचार और अन्याय की घटनाएँ सामने आती रहती हैं। इन घटनाओं को देखकर प्रश्न उठता है कि आखिर हर वर्ष रावण का पुतला जलाने के बाद भी हमारे समाज में ये बुराइयाँ क्यों बनी हुई हैं? मैंने तो अपने अहंकार और गलत निर्णयों से अपना सब कुछ खो दिया था। लेकिन आज कुछ लोग दूसरों को कष्ट पहुँचाकर भी अपनी गलती स्वीकार करने को तैयार नहीं होते।

 वे दूसरों को उपदेश देते हैं, लेकिन स्वयं अपने आचरण में सुधार नहीं करते। ऐसे में मेरा प्रश्न है-क्या केवल मेरा पुतला जला देने से रावण समाप्त हो जाएगा? क्या आग की लपटें हमारे भीतर छिपे क्रोध, अहंकार, लालच, छल, अन्याय और नारी के प्रति अपमानजनक सोच को भी जला सकती हैं? नहीं! ऐसा तभी संभव है, जब हम अपने भीतर झाँकने का साहस करें।

अपने भीतर के रावण का दहन कीजिए- मैं चाहता हूँ कि इस दशहरे पर आप केवल मेरे पुतले को जलाने तक सीमित न रहें। एक बार अपने मन में झाँककर देखें। क्या आपके भीतर भी अहंकार का कोई सिर है? क्या आप कभी क्रोध में आकर अपनों को अपमानित करते हैं? क्या आप अपनी शक्ति, पद या धन के बल पर किसी कमजोर व्यक्ति का अधिकार छीनते हैं? क्या आप दूसरों की गलतियों को तो देखते हैं, लेकिन अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं करते?

 क्या आप महिलाओं का सम्मान केवल शब्दों में करते हैं, या अपने व्यवहार में भी उसे स्थान देते हैं? यदि इन प्रश्नों में आपको अपने जीवन की कोई कमी दिखाई देती है, तो यही आपके लिए आत्मचिंतन का अवसर है। रावण के दस सिरों को प्रतीकात्मक रूप से काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष, अन्याय और असत्य जैसी बुराइयों से जोड़कर देखा जा सकता है। इन बुराइयों का अंत केवल बाहरी प्रदर्शन से नहीं, बल्कि अपने विचारों और व्यवहार में परिवर्तन लाने से होगा।

आइए, इस दशहरे पर संकल्प लें कि हम क्रोध के स्थान पर धैर्य, अहंकार के स्थान पर विनम्रता, छल के स्थान पर ईमानदारी और द्वेष के स्थान पर प्रेम को अपनाएँगे। हम किसी कमजोर व्यक्ति का शोषण नहीं करेंगे, किसी नारी का अपमान नहीं करेंगे और अन्याय होते देखकर मौन रहने के बजाय न्याय का साथ देने का प्रयास करेंगे। मैं रावण हूँ। 

मेरी कहानी का अंत हो चुका है, लेकिन मेरी गलतियों से मिलने वाली सीख आज भी जीवित है। मेरी पराजय को उत्सव के साथ-साथ आत्मचिंतन का अवसर बनाइए, ताकि आने वाली पीढ़ियों को मेरे जैसे अहंकार, अन्याय और पश्चाताप की कहानी दोहरानी न पड़े। यही मेरे पश्चाताप का संदेश है और यही दशहरे की सच्ची सार्थकता है।

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