दोहा 13-11 की मात्राओं में बंधा एक ऐसा छंद जो अपना अस्तित्व जन्मों से लिए
० सुषमा भंडारी ०
मेरी पसंदीदा विधाओं में से एक है दोहा 13-11 की मात्राओं में बंधा एक ऐसा छंद जो अपना अस्तित्व जन्मों से लिए है हमारे पुरखों ने भी पढ़ा , गुनगुनाया और आगे आनेवाली पीढ़ियाँ भी इस पर चिंतन , मनन करती रहेंगी । " दोहा " हमारी संस्कृति और सभ्यता से जुड़ा है । हम सब कबीर , बिहारी ,रहीम को पढ़कर बड़े हुए है ,शोध होते आ रहे हैं और होते रहेंगे ।
मेरी पसंदीदा विधाओं में से एक है दोहा 13-11 की मात्राओं में बंधा एक ऐसा छंद जो अपना अस्तित्व जन्मों से लिए है हमारे पुरखों ने भी पढ़ा , गुनगुनाया और आगे आनेवाली पीढ़ियाँ भी इस पर चिंतन , मनन करती रहेंगी । " दोहा " हमारी संस्कृति और सभ्यता से जुड़ा है । हम सब कबीर , बिहारी ,रहीम को पढ़कर बड़े हुए है ,शोध होते आ रहे हैं और होते रहेंगे ।
मुझे तो वैसे ही संक्षिप्तता में लिखना बहुत पसंद है यूं कहें " गागर में सागर " दो पंक्तियों में जीवन का सार दोहा ही दे सकता है जैसे रहीम कहते हैं अपने दोहे में " रहिमन धागा प्रेम का ,मत तोड़ो चटकाय।टूटे से फिर न जुड़े , जुड़े गांठ पड़ जाय।।
कबीर कहते हैं " बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर ।
पंछी को छाया नहीं , फल लागे अति दूर ।।
रीतिकाल के महान कवि बिहारी को तो दोहा सम्राट कहा गया । उनकी भाषा शैली और शब्दों के भाव का कोई दूसरा नहीं उनके दोहों को देखें बिहारी सतसई से " सतसइया के दोहरा , ज्यों नाविक के तीर। देखन में छोटे लगें , घाव करें गम्भीर।।
" कहत , नटत , रीझत , खिझत ,
मिलत , खिलत , लजियात ।
भरे भौन में करत है, नैननु ही सब बात ।।" ये दोहा भक्ति भाव से भरा कृष्ण जी के बालपन को दर्शाता है खैर मेरी पुस्तक " मेरे दोहे मेरे गीत " हिंदी अकादमी से 2009 में प्रकाशित हुई इस पुस्तक में दोहे और गीत शामिल हैं। इस पुस्तक से विविध रंग के दोहे
जब से भीतर हो गए,दुनिया के सब ठाठ।
तब से बाहर हो गई , माँ - बाबा की खाट ।।
है आँगन के बीच में , अनबन की दीवार ।
अपने ही मुँह मोड़ते , बुरा लगे दीदार ।।
किस्मत तो उस ने लिखी, करनी अपने हाथ। अंधियारे में भी दिखे , तारों की बारात।।
जीवन के पल चार हैं , जीत समझ या हार ।
चाहे तो यूं ही गँवा , चाहे कर साकार।।
कंकर - पत्थर पूजता , फिरता है दिन रात ।
ढूँढ सके तो ढूंढ ले , भीतर ही सौगात ।।
लकड़ी बदली राख में , बदल गया है रूप।
भीतर इतनी आग है , क्या कर लेगी धूप।।
मन मेरा पुलकित हुआ , पाकर अपना मीत।
सात सुरों में बँध गए , खुद ही मेरे गीत ।।।
सटे - सटे से घर यहाँ , कटे - कटे से लोग ।
भीतर टूटन है बहुत , फिर भी छप्पन भोग ।।
जाने किस रँग में रँगे , देखो बाल - किशोर ।
जब से कच्ची हो गई , रस्मों की ये डोर।।
बेटी हूँ तो क्या हुआ , मेरा अपना गीत ।
मुझ बिन थम ही जाएगा, सृष्टि का संगीत ।।
और मेरा सबसे प्रिय दोहा " दह जाऊँ तो आग हूँ, बह जाऊँ तो नीर।
ढह जाऊँ तो रेत हूँ, सह जाऊँ तो पीर ।।।
कबीर कहते हैं " बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर ।
पंछी को छाया नहीं , फल लागे अति दूर ।।
रीतिकाल के महान कवि बिहारी को तो दोहा सम्राट कहा गया । उनकी भाषा शैली और शब्दों के भाव का कोई दूसरा नहीं उनके दोहों को देखें बिहारी सतसई से " सतसइया के दोहरा , ज्यों नाविक के तीर। देखन में छोटे लगें , घाव करें गम्भीर।।
" कहत , नटत , रीझत , खिझत ,
मिलत , खिलत , लजियात ।
भरे भौन में करत है, नैननु ही सब बात ।।" ये दोहा भक्ति भाव से भरा कृष्ण जी के बालपन को दर्शाता है खैर मेरी पुस्तक " मेरे दोहे मेरे गीत " हिंदी अकादमी से 2009 में प्रकाशित हुई इस पुस्तक में दोहे और गीत शामिल हैं। इस पुस्तक से विविध रंग के दोहे
जब से भीतर हो गए,दुनिया के सब ठाठ।
तब से बाहर हो गई , माँ - बाबा की खाट ।।
है आँगन के बीच में , अनबन की दीवार ।
अपने ही मुँह मोड़ते , बुरा लगे दीदार ।।
किस्मत तो उस ने लिखी, करनी अपने हाथ। अंधियारे में भी दिखे , तारों की बारात।।
जीवन के पल चार हैं , जीत समझ या हार ।
चाहे तो यूं ही गँवा , चाहे कर साकार।।
कंकर - पत्थर पूजता , फिरता है दिन रात ।
ढूँढ सके तो ढूंढ ले , भीतर ही सौगात ।।
लकड़ी बदली राख में , बदल गया है रूप।
भीतर इतनी आग है , क्या कर लेगी धूप।।
मन मेरा पुलकित हुआ , पाकर अपना मीत।
सात सुरों में बँध गए , खुद ही मेरे गीत ।।।
सटे - सटे से घर यहाँ , कटे - कटे से लोग ।
भीतर टूटन है बहुत , फिर भी छप्पन भोग ।।
जाने किस रँग में रँगे , देखो बाल - किशोर ।
जब से कच्ची हो गई , रस्मों की ये डोर।।
बेटी हूँ तो क्या हुआ , मेरा अपना गीत ।
मुझ बिन थम ही जाएगा, सृष्टि का संगीत ।।
और मेरा सबसे प्रिय दोहा " दह जाऊँ तो आग हूँ, बह जाऊँ तो नीर।
ढह जाऊँ तो रेत हूँ, सह जाऊँ तो पीर ।।।


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