यूं ही किसी मोड़ पर ' जब कोई मिल जाता है,कोई बिछुड़ जाता है
० सुषमा भंडारी ०
यूं ही किसी मोड़ पर ' जब कोई मिल जाता है,कोई बिछुड़ जाता है या कुछ ऐसा घटित हो जाता है जो अविस्मरणीय हो,तब यह हृदय द्रवित होता है,भावनाएं उद्वेलित होती हैं और रचना का जन्म होता है , जो भाव हृदय से प्रस्फुटित होकर,
माँ की चप्पल से से जब
बाहर होने लगा
बेटी का पैर
तभी से लड़की उस घर के लिए
हो गई ग़ैर!
चिंता के दर्द में डूब गया परिवार
देखो भाई
जल्दी कोई घरबार !
सुन - सुन कर ऐसी बातें
लड़की की हो गई बेचैन रातें
क्या ये उसका नहीं है घर
क्या होगा?
लगा रहता था डर
क्या ?
झूठा प्यार था, जो अब तक इस घर में मिला !
कैसा है?
ये सिलसिला
कैसी ये विडंबना ?
कैसा ये प्रपंच ?
जीवन का कुछ नाटक
इस घर में किया है
अब ढूंढो दूसरा मंच!
( मॉड्यूलर किचन )
मॉड्यूलर किचन बनवाना है
ढूंढ रही हूँ कारीगर!
करती हूँ बात
दिन - प्रतिदिन!
पूछती हूँ दाम
लकड़ी का, सीमेंट का, स्टील का,
लगती हूँ हिसाब
पूरे दाम का
जो बताते हैं कारीगर!
ऊँचा - उँचा भाव .......
असमंजस में हूँ
कहाँ से लाऊँ
इतना रुपया
कैसे होगा ? सब
परन्तु
कभी - कभी
प्रश्न उठता है ज़ेहन में
आख़िर क्यों?
बनवाना चाहती हूँ
किचन को मॉड्यूलर
शायद!
बंद कर देना चाहती हूँ
हल्दी मिर्च के वे डिब्बे
जो रहते हैं अब
मेड के हाथ में!
सजाना चाहती हूँ
किचन को भी
अपनी ही भाँति
मेकअप से......
जिस प्रकार
उम्र की झुर्रियों को ढाँपती हूँ
फेशियल से .......
होंठों को रंगती हूँ लिपस्टिक से.....
बालों को रंगती हूँ मेंहदी से......
मगर __
क्या करूँ मैं
आज सजावट ही परिभाषा है
सभ्यता की!
यूं ही किसी मोड़ पर ' जब कोई मिल जाता है,कोई बिछुड़ जाता है या कुछ ऐसा घटित हो जाता है जो अविस्मरणीय हो,तब यह हृदय द्रवित होता है,भावनाएं उद्वेलित होती हैं और रचना का जन्म होता है , जो भाव हृदय से प्रस्फुटित होकर,
शब्द बनकर काग़ज़ पर उतरते हैं,वो ईश्वर - प्रदत्त साक्षात् रचना होती है, ठीक नवजात शिशु की भांति,मैं इस रचना क्रम से बहुत प्यार करती हूँ। यह काव्य संग्रह विभिन्न भावनाओं का ऐसा ही समुच्चय है। इस पुस्तक की कविताएं आपके समक्ष
माँ की चप्पल से से जब
बाहर होने लगा
बेटी का पैर
तभी से लड़की उस घर के लिए
हो गई ग़ैर!
चिंता के दर्द में डूब गया परिवार
देखो भाई
जल्दी कोई घरबार !
सुन - सुन कर ऐसी बातें
लड़की की हो गई बेचैन रातें
क्या ये उसका नहीं है घर
क्या होगा?
लगा रहता था डर
क्या ?
झूठा प्यार था, जो अब तक इस घर में मिला !
कैसा है?
ये सिलसिला
कैसी ये विडंबना ?
कैसा ये प्रपंच ?
जीवन का कुछ नाटक
इस घर में किया है
अब ढूंढो दूसरा मंच!
( मॉड्यूलर किचन )
मॉड्यूलर किचन बनवाना है
ढूंढ रही हूँ कारीगर!
करती हूँ बात
दिन - प्रतिदिन!
पूछती हूँ दाम
लकड़ी का, सीमेंट का, स्टील का,
लगती हूँ हिसाब
पूरे दाम का
जो बताते हैं कारीगर!
ऊँचा - उँचा भाव .......
असमंजस में हूँ
कहाँ से लाऊँ
इतना रुपया
कैसे होगा ? सब
परन्तु
कभी - कभी
प्रश्न उठता है ज़ेहन में
आख़िर क्यों?
बनवाना चाहती हूँ
किचन को मॉड्यूलर
शायद!
बंद कर देना चाहती हूँ
हल्दी मिर्च के वे डिब्बे
जो रहते हैं अब
मेड के हाथ में!
सजाना चाहती हूँ
किचन को भी
अपनी ही भाँति
मेकअप से......
जिस प्रकार
उम्र की झुर्रियों को ढाँपती हूँ
फेशियल से .......
होंठों को रंगती हूँ लिपस्टिक से.....
बालों को रंगती हूँ मेंहदी से......
मगर __
क्या करूँ मैं
आज सजावट ही परिभाषा है
सभ्यता की!


टिप्पणियाँ
कुछ हलचल
कलकल बहता जल
चल लेखनी चल
यूं ही पल - पल
कभी मन में कभी कागज़ पर