बिन तेरे मेरे प्रभु, नहीं मेरी पहचान

० सुषमा भंडारी ० 
 मातृभूमि , मातृभाषा मेरा है अधिकार
मैं इनसे और ये मुझसे करते देखो प्यार___

मातृभूमि की सेवा करके पाऊं मैं सम्मान
जब - जब मैं धरती को पूजूं आ जाए मुस्कान
संकट के बादल जब छाएं हो जाऊं तैयार
मातृभूमि की खातिर जन - जन मेरा है परिवार___
सच्ची सेवा मातृ भूमि की सह न सकूं अपमान
दुश्मन की खातिर तो मैं भी कर दूं बस ऐलान
मर जाऊं या मार गिराऊं मानूं कभी न हार
शांति और सत्य के पथ पर चलने को तैयार___

मातृभूमि की आन बान का रखूं हरदम ध्यान
तीन रंग का मेरा झंडा मातृभूमि की शान
मातृभूमि की रक्षा को समझूं कभी न भार
दुश्मन की खातिर बन जाऊं दोधारी तलवार__

आस-पास देखूं मैं जब भी फैला भ्रष्टाचार
फूलों की मैं रक्षा कर लूं फ़ेकूँ सारे खार
लालच को मैं कभी न सींचू ,झूठा जाए हार__

मातृभूमि, मातृभाषा मेरा है अधिकार
मैं इनसे और ये मुझसे करते देखो प्यार____
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 बालगीत -- नानी मेरी

नानी मेरी आँख का तारा
कहती मुझको राजदुलारा
मुझे नाचती मुझे हँसाती
झूम- झूम कर गीत सुनाती

रूठ कभी मैं जाता हूँ तो
प्यार से मुझको गले लगाती
कहती मुझको चाँद - सितारा
नानी मेरी आँख का तारा -----

जब नानी का चश्मा तोडूं
सर पर धर कर इत - उत दोडू
हँस - हँस कर मैं खूब रिझाता
मैं लगता नानी को प्यारा
नानी मेरी आँख का तारा-----
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" बचपन और बारिश की बूंदें"

बारिश की नन्हीं बूंदों से
भर जाते हैं ताल तलैया
उछल_कूद करते हैं इसमें
हम सब मिलकर ता- ता -थैया___

उमड़ घुमड़ कर बादल आते
अपने आंचल को लहराते
घटाएं काली करती गड गड
पात धरा को छूते झड़ झड___

सुखे वृक्ष हँसे खिल- खिल कर
डाल- डाल नहाती मल कर
धरती झूम रही मस्ती में
खुशियों का मेला बस्ती में___

बचपन की टोली है घूमे
बारिश की बूंदों को चूमे
बचपन होता सबसे प्यारा
न्यारा न्यारा राज दुलारा---------

पवन सुनाती गीत सनन सन
नाचूँ गाऊँ कहता है मन
बूंद-बूंद से भरते ताल
पानी रक्षण बड़ा सवाल-------
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है जिसमे तेरी रजा, उसमे मेरी शान ।
बिन तेरे मेरे प्रभु, नहीं मेरी पहचान।।

हिय हर्षित हो कह रहा, आओ बिराजो नाथ।
तुम्हरे ही आशीष से जीवन मे प्रभात।।

लिप्त हुआ संसार में, मोह माया का फेर।
सब कुछ तेरे हाथ में, हम माटी का ढेर।।

पूर्ण समर्पण हो जहाँ, वहीं आस- विश्वास।
जिस दिल मे राघव बसे, चहुँदिस है उल्लास।।

राघव तेरा द्वार हो, जब भी खोलूँ नैन।
तेरा सिमरन जब मिले,पाऊँ प्रभु जी चैन।।

मन का रावण हो स्वाह , मन में हों बस राम।
जितनी हों कठिनाइयां, जाऊं सीधे धाम।।

दीपों की सुंदर लड़ी , जगमग जगमग होय।
रात अमावस थी मगर, पूनम जैसी होय।।

मन के क्लेश मिट गए , मिटा है सब अंधियार।
सच्चाई की जीत है , गया झूठ अब हार।।
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 सांकल ने जब से धरा
ऑटोमैटिक रूप।
रस्ता भूली बावरी
उजली- उजली धूप ll

पाटा, पीढी, चौकियाँ
मिला इन्हे अब स्टोर।
सोफा- सैट भी पड़ा-पड़ा
होता है अब बोर।।

समया आभाव है बस
बाकी पूरी मौज़।
खुशी ढूंढता मन फिरे
नित - नित करता खोज।।

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हार्दिक धन्यवाद आरिफ जी

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