"ख़ुशबू तो बचा ली जाए" एक विश्लेषण
० सुषमा भंडारी ०
डॉ लक्ष्मीशंकर वाजपेयी मंचीय कवि के रूप में ख्यात हैं लेकिन वे मंच की फूहड़ और चुटकुला प्रवृति से दूर उस परंपरा के कवि हैं जिन्होंने मंच पर साहित्यिक रचनाओं के माध्यम से मंच की गरिमा को बनाए रखा । इन्होंने देश भर में अनेक अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों एवं मुशायरों में न सिर्फ़ शिरकत की बल्कि कवि सम्मेलनों और मुशायरों का सफल संचालन भी किया।
डॉ लक्ष्मीशंकर वाजपेयी मंचीय कवि के रूप में ख्यात हैं लेकिन वे मंच की फूहड़ और चुटकुला प्रवृति से दूर उस परंपरा के कवि हैं जिन्होंने मंच पर साहित्यिक रचनाओं के माध्यम से मंच की गरिमा को बनाए रखा । इन्होंने देश भर में अनेक अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों एवं मुशायरों में न सिर्फ़ शिरकत की बल्कि कवि सम्मेलनों और मुशायरों का सफल संचालन भी किया।
भारतीय प्रतिनिधि के रूप में इन्होंने ब्रिटेन , पोलैंड , त्रिनिनाड, टुबैको और सूरीनाम जैसे देशों में जाकर काव्यपाठ किया और अपनी कविताओं गीतों और शायरी से वहां भी भारतीयता के झंडे को बुलंद किया। इन्होंने " सार्क सम्मेलन " में भी भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए हिंदी कविता को वैश्विक पहचान दिलवाई ।
डॉ हरीश अरोड़ा के प्रोत्साहन और वाजपेयी जी की अद्भुत और अंतस तक उतर जाने वाली रचनाओं ने मुझे इनकी पुस्तक " ख़ुश्बु तो बचा ली जाए" पर शोध कार्य करने के लिए दृढ़ निश्चय प्रदान किया। चूँकि डॉ लक्ष्मीशंकर वाजपेयी पर यह पहला ही शोध कार्य है तो सामग्री जुटाना भी आसान नहींलेकिन बाजपेयी जी से अक्सर विभिन्न गोष्ठियों के दौरान मिलने के कारण उनकी ग़ज़लों , गीतों , लेखन उनके व्यक्तित्व को जानने समझने का अवसर उन्हीं के मुख से मिला इसलिए इस शोध कार्य के लिए इस से उपर्युक्त विषय कोई लगा ही नहीं। स्वयं वाजपेयी एवं इनकी धर्मपत्नी ममता किरण ने समय - समय पर यूँ कहूँ समय दिया तो अतिशयोक्ति नहीं होगी ,क्योंकि सबके पास नहीं है तो समय नहीं है।
अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से प्रस्तुत लघु शोध प्रबंध को चार भागों में विभाजित किया गया है । पहले अध्याय में ' संवेदना और शिल्प एक सैद्धांतिक अध्ययन ' के अंतर्गत संवेदना और शिल्प की सैद्धांतिक पृष्ठभूमि पर विचार किया गया है। दूसरे अध्याय में ' लक्ष्मीशंकर वाजपेयी: व्यक्तित्व एवं कृतित्व ' के अंतर्गत शायर के जीवन व व्यक्तित्व से संबंधित सभी पहलुओं का अध्ययन किया गया है। साथ ही उनके रचना संसार पर भी प्रकाश डाला गया है।
तीसरे अध्याय ' ख़ुश्बु तो बचा ली जाए ' : संवेदना के धरातल पर ' के अंतर्गत संवेदना के विविध धरातलों का इस कृति को आधार बनाकर उनका विश्लेषण किया गया है। चौथे अध्याय 'ख़ुश्बु तो बचा ली जाए': शिल्प के धरातल पर ' के अंतर्गत प्रस्तुत संग्रह को शिल्प के विभिन्न पक्षों को आधार बनाकर उनका विश्लेषण किया गया है। इस शोध कार्य में मेरे मार्गदर्शक विधिवत रूप से डॉ हरीश अरोड़ा रहे।
विशेष : इनकी पुस्तक के गीतों वो ग़ज़ल को मैने वाजपेयी जी की आज्ञा से दोहों और हाइकु में परिवर्तित किया । जिनके विषय में अलग से बताया जा सकता है ।
अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से प्रस्तुत लघु शोध प्रबंध को चार भागों में विभाजित किया गया है । पहले अध्याय में ' संवेदना और शिल्प एक सैद्धांतिक अध्ययन ' के अंतर्गत संवेदना और शिल्प की सैद्धांतिक पृष्ठभूमि पर विचार किया गया है। दूसरे अध्याय में ' लक्ष्मीशंकर वाजपेयी: व्यक्तित्व एवं कृतित्व ' के अंतर्गत शायर के जीवन व व्यक्तित्व से संबंधित सभी पहलुओं का अध्ययन किया गया है। साथ ही उनके रचना संसार पर भी प्रकाश डाला गया है।
तीसरे अध्याय ' ख़ुश्बु तो बचा ली जाए ' : संवेदना के धरातल पर ' के अंतर्गत संवेदना के विविध धरातलों का इस कृति को आधार बनाकर उनका विश्लेषण किया गया है। चौथे अध्याय 'ख़ुश्बु तो बचा ली जाए': शिल्प के धरातल पर ' के अंतर्गत प्रस्तुत संग्रह को शिल्प के विभिन्न पक्षों को आधार बनाकर उनका विश्लेषण किया गया है। इस शोध कार्य में मेरे मार्गदर्शक विधिवत रूप से डॉ हरीश अरोड़ा रहे।
विशेष : इनकी पुस्तक के गीतों वो ग़ज़ल को मैने वाजपेयी जी की आज्ञा से दोहों और हाइकु में परिवर्तित किया । जिनके विषय में अलग से बताया जा सकता है ।




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