बिन तेरे मेरे प्रभु, नहीं मेरी पहचान
० सुषमा भंडारी ०
है जिसमे तेरी रजा, उसमे मेरी शान ।
बिन तेरे मेरे प्रभु, नहीं मेरी पहचान।।
हिय हर्षित हो कह रहा, आओ बिराजो नाथ।
तुम्हरे ही आशीष से जीवन मे प्रभात।।
लिप्त हुआ संसार में, मोह माया का फेर।
सब कुछ तेरे हाथ में, हम माटी का ढेर।।
पूर्ण समर्पण हो जहाँ, वहीं आस- विश्वास।
जिस दिल मे राघव बसे, चहुँदिस है उल्लास।।
राघव तेरा द्वार हो, जब भी खोलूँ नैन।
तेरा सिमरन जब मिले,पाऊँ प्रभु जी चैन।।
मन का रावण हो स्वाह , मन में हों बस राम।
जितनी हों कठिनाइयां, जाऊं सीधे धाम।।
दीपों की सुंदर लड़ी , जगमग जगमग होय।
रात अमावस थी मगर, पूनम जैसी होय।।
मन के क्लेश मिट गए , मिटा है सब अंधियार।
सच्चाई की जीत है , गया झूठ अब हार।।
है जिसमे तेरी रजा, उसमे मेरी शान ।
बिन तेरे मेरे प्रभु, नहीं मेरी पहचान।।
हिय हर्षित हो कह रहा, आओ बिराजो नाथ।
तुम्हरे ही आशीष से जीवन मे प्रभात।।
लिप्त हुआ संसार में, मोह माया का फेर।
सब कुछ तेरे हाथ में, हम माटी का ढेर।।
पूर्ण समर्पण हो जहाँ, वहीं आस- विश्वास।
जिस दिल मे राघव बसे, चहुँदिस है उल्लास।।
राघव तेरा द्वार हो, जब भी खोलूँ नैन।
तेरा सिमरन जब मिले,पाऊँ प्रभु जी चैन।।
मन का रावण हो स्वाह , मन में हों बस राम।
जितनी हों कठिनाइयां, जाऊं सीधे धाम।।
दीपों की सुंदर लड़ी , जगमग जगमग होय।
रात अमावस थी मगर, पूनम जैसी होय।।
मन के क्लेश मिट गए , मिटा है सब अंधियार।
सच्चाई की जीत है , गया झूठ अब हार।।

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