धरती थी जो स्वर्ग सी,आजादी में लीन,मानव इसको कर रहा,दिन-दिन ही ग़मगीन

० Sushma Bhandari ० 
समय का सदुपयोग
महत्व समय का जानिए
मत करिए बेकार।
गया वक्त न आयेगा
जीवन नहीं बिसार।।

समय का सदुपयोग ही
जीवन सफल बनाय।
काँटो में भी फूल सम
सदा वही मुसकाय।।
मान समय का जो करे
समय उसी के संग ।
बेशक क्षण क्षण कर रहा
मनुआ खुद से जंग ।।

पाता है सम्मान वो
चलता समय अनुरूप ।
जीवन का मतलब यही
कभी छाँव कभी धूप ।।

समय कभी रुकता नहीं
इसकी अपनी चाल।
सदुपयोग इसका करे
रहता वो खुशहाल ।।

कर्म करे चलता रहे
समय यही सिखलाय।
आलोकित पथ सूरज करे
जल कर भी मुसकाय ।।

सुखी सफल जीवन वही
समय से ले जो सीख।
मानव जीवन है मिला
कुछ तो लिख तारीख।।
===================
कोना -कोना छान के देखा
गैर को अपना मान के देखा
देश है मेरा सबसे प्यारा
सब कुछ मैने ध्यान से देखा____

सर्वश्रेष्ठ है मेरा भारत
इसकी पूजा करना आदत
तीन रंग का अपना झंडा
जन - जन की हो यही इबादत____

छोड़ के अपने देश जा रहे
नवपीड़ी को स्वप्न भा रहे
मात _ पिता जो देव तुल्य हैं
गीत वही पीड़ा के गा रहे____

जिस बुद्धि पर पड़े हैं ताले
उनको तो भगवान सम्भाले
बूढ़े माता -पिता अकेले
कौन खिलाये उन्हें निवाले____

कल-कल छल-छल नदियाँ बहती ,
सुंदर देश यही है कहती
हरी - भरी मैं धरा निराली
कूड़ा _ करकट सब कुछ सहती___

स्वच्छ सरोवर निर्मल जल हो
जीवन में फिर तो मंगल हो
निस्वार्थ जो करे सुकर्म
खुशियां जीवन में हर - पल हो____

सुख-दुख के सब ही हों साथी
उड़ती चिड़िया गीत सुनाती
आज़ादी के सब दीवाने
आज़ादी सब को ही भाती __
====================
 बालगीत
रंगों में है रंग निराला
दुनिया का ये देखा भाला
हरइक भारती इस पर मरता
शीश पे इसको अपने धरता

केसरिया शक्ति देता है
सबको ही जीवन देता है
हरा रंग खुशियाँ बरसाता
बच्चा - बच्चा जश्न मनाता

धवल रंग शांति भर देता
आत्मबल सब में भर देता
ऊँचा - ऊँचा ये लहराता
घर - घर से है इसका नाता

देश है इक पूरा परिवार
करते हम सब देश से प्यार
आजादी का नाम तिरंगा
अपना तो है धाम तिरंगा
====================
धरती संग आकाश भी, सिसक रहा है आज।
वृक्ष, धरा , जल , जानवर , मद्धिम है परवाज।।
धरती थी जो स्वर्ग सी,आजादी में लीन।
मानव इसको कर रहा,दिन-दिन ही ग़मगीन।।

शुद्ध हुआ अशुद्ध अब,केमिकल की मार।
नदियाँ सब नाले हुए , लागें सब लाचार।।
कृत्रिमता के बोझ में , दबे जा रहे लोग।
वायु , जल और साँस का, कृत्रिम करते भोग।।

खुली हवा और छाँव को , तरसें नित -नित लोग।
जंगल पथरीले हुए , करें रोज प्रयोग।।
मैला नदियाें को किया , पूजन का दे नाम।
व्यापार फूले - फले , लगते हैं बस दाम।

योजनाओं के दौर में , गंगा अश्क बहाय ।
संस्कार रोते दिखे , जब- जब कटती गाय।।
विपदा बड़ी न कीजिये , जल्दी संभलो यार।
गर कोविड फिर आ गया, कैसे होंगे पार।।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

स्पेशल ओलंपिक्स यूनिफाइड बास्केटबॉल 3x3 वर्ल्ड कप भारत ने जीता ब्रॉन्ज मेडल

सांगानेर में सरकार की संवेदनहीनता से 87 कॉलोनियों पर संकट

इंडिया इंटरनेशनल हॉस्पिटैलिटी एक्सपो में ईपीसीएच पवेलियन ने भारतीय शिल्प कौशल का किया प्रदर्शन

IFWJ के पत्रकारों का सिस्टम के विरुद्ध अनिश्चितकालीन धरना

प्रभात पोस्ट के 12वें वार्षिक समारोह में इंडियन ऑइकानिक अवार्ड प्रदान

पेंशनर सोसाइटी ने पेंशनर्स समस्या हल करने हेतु राज्यपाल से लगाई गुहार

नई जेनरेशन को मालूम ही नहीं,आज़ादी कैसे मिली