आप लोगों का यहां सोसायटी में आना निषेध है

० सुषमा भंडारी ० 
सबसे पहले माँ की पूजा
माँ ने हमको जन्म दिया
तत्पश्चात पिता को वंदन
जिसने जीना सिखलाया ___

दादी- दादा उनके पूज्य
उनसे ही सब जाना था
संस्कार की सारी बातें
हर रिश्ता पहचाना था __

आशीर्वाद बात- बात पर
कथा- कहानी खूब सुनी
दादी- दादा जी के साथ
सपन चदरिया खूब बुनी___
फिर समय ने करवट ली
उथल - पुथल सब कर डाला
डिजिटल की दुनिया फिर
लेकर आई एक नई हाला___

अब रिश्तों की बात नहीं
संस्कार सौगात नहीं
अब होती है सौदेबाज़ी
खुशियों का प्रभात नहीं__

चुप्पी का माहौल बना है
हर व्यक्ति खुद से ही ठना है
खुशियों के लम्हे की तलाश में
समय का हर पल क्यूं ? अनमना है__
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माता- पिता अनमोल हैं,

हैं ईश्वर का रूप।
दें बरगद सी छांव ये ,
जब हो जीवन धूप।।

जीवन ये अनमोल है
समझो इसका मोल।
भीतर ही भगवान हैं,
बाहर बाजे ढोल।।

शब्द बड़े अनमोल हैं,
ये जीवन का सार।
इनसे ही व्यवहार है,
इनसे ही है प्यार॥
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 लघुकथा : सन्नाटा
कौन हो ? कहाँ जाना है ? किस से मिलना है ?
क्यूँ मिलना है ? सवालों की झडी लगाते हुए सोसायटी के गार्ड ने एक अजीब सी वेशभूषा पहने व्यक्ति से पूछा। वो कुछ जवाब देता उस से पहले ही गेट के सामने दो ऑटो रुके और धड़ -धड़ करते कुछ किन्नर बाहर निकले।

अपनी चिर-परिचित आवाज व अंदाज में ताली बजाने लगे , बोलने लगे। गार्ड समझ गया था उस ने सख्ती से साफ शब्दों में कहा " आप लोगों का यहां सोसायटी में आना निषेध है"। तभी किन्नरों के मध्य से एक दर्दभरी आवाज आई " हमारा इस दुनिया में आना निषेध नहीं है तो सोसायटी में क्यूँ ? कुछ पल को चारों और सन्नाटा पसर गया।

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