आशाओं के दीप जलाऊँ
० सुषमा भंडारी ० आशाओं के दीप जलाऊँ मन - तूफ़ाँ के संग हो न जाए हादिसा कहीं हो न जाए जंग डोलती हैं सब दिशाएँ बोलती हैं माँ की आहें फीके हैं त्यौहार सारे फीके हैं सब रंग आशाओं के दीप जलाऊँ मन - तूफ़ाँ के संग हर कली घबराई - सी तुलसी भी कुम्हलाई - सी माली लूटे वाटिका को देखकर होती मैं दंग आशाओं के दीप जलाऊँ मन - तूफ़ाँ के संग महिमा है अब लूट की हिंसा की और झूठ की ऐसे में लोगों की जग में उड़ती आज पतंग आशाओं के दीप जलाऊँ मन - तूफ़ाँ के संग अधरों पे अब नहीं मिलता क्यों मनमीत नहीं वीणा भी खामोश है काँप रहा मृदंग आशाओं के दीप जलाऊँ मन - तूफ़ाँ के संग हो रहे गद्दार सब लूटते हैं प्यार सब रूप अपनों का धरें हैं आस्तीनों में भुजंग आशाओं के दीप जलाऊँ मन - तूफ़ाँ के संग दर्द है मुस्कान में भीड़ है शमशान में जीना है दुश्वार- सा अब रूठ बैठी है उमंग आशाओं के दीप जलाऊँ मन - तूफ़ाँ के संग दीप बन जा आस का सत्य का विश्वास का दूर हो आंधियार मन का हो कोई जीने का ढंग आशाओं के दीप जलाऊँ मन - तूफ़ाँ के संग हो न जाए हादिसा कहीं हो न जाए जंग