रेवती श्रीनिवासन की पुस्तक ‘क्रिएटिंग क्लासरूम्स व्हेयर एवरी चाइल्ड बिलॉन्ग्स’ का विमोचन

० आशा पटेल ० 
मुंबई। रेमंड लिमिटेड के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर गौतम हरि सिंघानिया ने गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने के अपने मिशन को आगे बढ़ाते हुए ‘क्रिएटिंग क्लासरूम्स व्हेयर एवरी चाइल्ड बिलॉन्ग्स’ पुस्तक का विमोचन किया। इस पुस्तक की लेखिका रेवती श्रीनिवासन, एसएमटी. सुलोचनादेवी सिंघानिया स्कूल की डायरेक्टर-एजुकेशन एवं प्रिंसिपल हैं। यह स्कूल रेमंड ग्रुप के जेके ट्रस्ट से संबद्ध है।
हार्पर कॉलिन्स इंडिया द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक सिंघानिया परिवार द्वारा 1968 में स्थापित स्कूल में तीन दशकों से अधिक समय से किए जा रहे कार्यों के अनुभवों को समेटती है। पुस्तक में 12 वास्तविक जीवन की कहानियों के माध्यम से भारतीय शिक्षा व्यवस्था में व्यापक समावेशन की जरूरत पर जोर दिया गया है। ये कहानियां उन बच्चों की हैं, जिन्होंने अपनी परिस्थितियों और चुनौतियों से जूझते हुए आगे बढ़ने का रास्ता बनाया।
 रेमंड ग्रुप के सीएमडी गौतम हरि सिंघानिया ने कहा, “रेमंड में शिक्षा हमेशा से हमारी उस जिम्मेदारी का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है, जो हम अगली पीढ़ी के प्रति महसूस करते हैं। प्रिंसिपल रेवती की यह पुस्तक एक शक्तिशाली याद दिलाती है कि बच्चे के जीवन में वास्तविक बदलाव अक्सर इतनी सरल चीज से शुरू होता है कि उसे देखा जाए, उसकी बात सुनी जाए और उसे अवसर दिए जाएं।
यही विश्वास मुझे अगले पांच वर्षों में पूरे भारत में 1 लाख बच्चों को शिक्षित करने की अपनी प्रतिबद्धता के लिए प्रेरित करता है। हर बच्चे को शिक्षा पाने का अधिकार है और यह 2047 तक विकसित भारत बनने के हमारे राष्ट्रीय लक्ष्य के अनुरूप भी है। एसएमटी. सुलोचनादेवी सिंघानिया स्कूल की डायरेक्टर-एजुकेशन एवं प्रिंसिपल रेवती श्रीनिवासन ने कहा, “कक्षा में कदम रखने वाला हर बच्चा मन ही मन एक सवाल पूछता है—क्या मैं यहां का हिस्सा हूं ?
यह पुस्तक उन बच्चों की सच्ची कहानियों पर आधारित है, जिन्होंने मुझे सिखाया कि जब हम इस सवाल का जवाब ‘हां’ में देने का विकल्प चुनते हैं, तो उसके बाद आत्मविश्वास, जिज्ञासा और अपने वास्तविक स्वरूप को पाने का साहस—सब कुछ आता है। ये केवल अलग-अलग बच्चों की कहानियां नहीं हैं, बल्कि शिक्षा की परिवर्तनकारी शक्ति को समर्पित एक श्रद्धांजलि हैं। हर कक्षा केवल अकादमिक शिक्षा का स्थान नहीं होती, बल्कि वह ऐसा मंच है जहां चरित्र, साहस और जुड़ाव का निर्माण होता है।

पुस्तक में एक गांव के 13 वर्षीय बच्चे की कहानी है, जो शहर में सामाजिक स्तर पर होने वाली बुलिंग का सामना करते हुए अपने परिवार में कक्षा 10 पास करने वाला पहला व्यक्ति बनता है। वहीं एक ऐसी किंडरगार्टन छात्रा की कहानी भी है, जो सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित है और ऐसे स्कूल में दाखिला लेती है, जिसके पास उसकी सहायता के लिए कोई स्पष्ट व्यवस्था या रोडमैप नहीं था।

उसकी मौजूदगी ही पूरे संस्थान को बदलाव की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। पुस्तक की सभी कहानियों में एक समान निष्कर्ष सामने आता है—जब लोगों को देखा, सुना और महत्व दिया जाता है, तभी वे अपनी वास्तविक क्षमता तक पहुंच पाते हैं।

शिक्षकों, अभिभावकों और बदलाव के लिए काम करने वाले लोगों को ध्यान में रखकर लिखी गई यह पुस्तक बच्चों को ऐसे विचारशील नेतृत्वकर्ताओं के रूप में प्रस्तुत करती है, जिन्हें अक्सर सबसे अधिक नजरअंदाज किया जाता है। 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

स्पेशल ओलंपिक्स यूनिफाइड बास्केटबॉल 3x3 वर्ल्ड कप भारत ने जीता ब्रॉन्ज मेडल

सांगानेर में सरकार की संवेदनहीनता से 87 कॉलोनियों पर संकट

इंडिया इंटरनेशनल हॉस्पिटैलिटी एक्सपो में ईपीसीएच पवेलियन ने भारतीय शिल्प कौशल का किया प्रदर्शन

IFWJ के पत्रकारों का सिस्टम के विरुद्ध अनिश्चितकालीन धरना

प्रभात पोस्ट के 12वें वार्षिक समारोह में इंडियन ऑइकानिक अवार्ड प्रदान

पेंशनर सोसाइटी ने पेंशनर्स समस्या हल करने हेतु राज्यपाल से लगाई गुहार

नई जेनरेशन को मालूम ही नहीं,आज़ादी कैसे मिली