समझ न लेना अबला इसको नारी है शक्ति का रूप

० Sushma Bhandari ० 
विजय .....आज आकाश की बहुत याद आ रही है ,तुझे याद है न ---- मैं ,तुम ,दीपक ,राहुल सब उसके साथ मिलकर शरारत करते थे ..... मगर डाट सिर्फ उसको खानी पड़ती थी ,और एक दिन ऐसा भी आया हमारे जीवन में ,जब आकाश स्कूल छोडकर ना जाने कहाँ चला गया | सपरिवार | “ तू बता अजय ..... मैं कैसे ढूंढू....जितने भी ठौर-ठिकाने थे सब जगह हम लोगों ने तलाशने की कोशिश की है, बावजूद हमारी पढाई और कैरियर के | हाँ ये तो है दीपक कंप्यूटर इंजीनयर हो गया है उससे कहेंगे वो शायद ढूँढ सके अपने यार को |
अजय अध्यापक है | रविवार अवकाश होता है ,दीपक मल्टीनेशनल कम्पनी में हो मगर आज उसने भी छुट्टी की | राहुल प्रोपर्टी डीलर है | अपने पुराने यार के लिए वह भी सब काम छोड़ लकर दोस्तों के पास आया और विजय तो संगीत अध्यापक है ,घर में ही कोचिंग सेंटर खोल रखा है सो छुट्टी नहीं करनी पड़ी अपितु उसी के घर में सब लोग मिले | ढेरों नई –पुरानी बातें हुई और दीपक ने आकाश को ढूँढने की जिम्मेदारी ली |

आज रात दीपक की आँखों में नीद नहीं थी | वो कम्पूटर पर सर्च करता रहा , करता रहा .......करता रहा | जाने कितने आकाश दीपक के कम्पूटर पर उतर आये थे ,अभी हार मानने ही वाला था दीपक को एक चेहरा कुछ कुछ जाना पहचाना सा लगा | जहाँ दीपक को आकाश के मिलने की अपार खुशी थी वही आकाश का बायोडाटा पढकर हैरानगी भी थी |

आकाश कृषि वैज्ञानिक बन चुका था और आज दो एकड़ में उसका फार्म हाउस था ,जिसके एक बड़े हिस्से में उसने स्टडी सेंटर खोला हुआ था | दीपक को तो बातचीत के दौरान यकीन करना ही पड़ा किन्तु बाकी सभी दोस्त विस्मित थे और जल्द से जल्द आकाश से मिलना चाहते थे |

आगामी रविवार को आकाश के पास जाना निश्चित हुआ | उसका फार्म हाउस हरिद्वार से पचास - पचपन किलोमीटर दूर था | राहुल के पास कई गाडियां थी,एक बड़ी गाडी और ड्राइवर को साथ लेकर प्रात: चल पड़े, नींद ही कहाँ आई सबको |
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समझ न लेना अबला इसको
नारी है शक्ति का रूप
मानो जैसे उजली धूप
न थकती न रुकती है
कर्मक्षेत्र की है ये भूप
समझ न लेना अबला इसको __

माँ बन कर सुख दुःख सहना
कभी पत्नी कभी बहना
हर रिश्ते को खूब निभाती
नदिया जैसे बहते रहना
समझ न लेना अबला इसको____

फूल बनकर घर को महकाए
तितली बन आकाश में जाए
सहनशीलता का है सागर,
पढ़ लिख ज्ञान में वृद्धि लाए
समझ न लेना अबला इसको ___

लक्ष्मी बन समृद्धि लाती
दुर्गा बन अन्याय मिटाती
नारी है वरदान ईश का
देश की माटी ये कहलाती
समझ न लेना अबला इसको____
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 कोहरा
सर्दी की ठिठुरन कहे
मुझको आग पसंद
धुंधली-धुंधली शीत में
भीनी - भीनी गंध

सर्दी की ये होलिका
जल- जल कर मुस्काय
प्यार करें इस से सभी
ममता का पर्याय

रूई जैसी गोलियाँ
वृक्षों पर लद जायें
मोती के समकक्ष ये
सुंदर रूप दिखायें

कोहरे की चादर पड़ी
धरा लगे आकाश
झीनी- झीनी धूप में
सोने - सा प्रकाश

रसभीनी- सी धुंध है
श्वेतवर्णीय रूप
पशु- पक्षी सब जीव ही
तुम्हे पुकारे धूप

कृष्णा जैसे साँवरे
मेघ हुए घनघोर
धुंध सरीखी राधिका
कहे किशन चितचोर----

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शुक्रिया जी

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