सत्तावन में जब चली, मन्नू की तलवार.....

० सुषमा भंडारी ० 
बारिश की नन्हीं बूंदों से
भर जाते हैं ताल तलैया
उछल_कूद करते हैं इसमें
हम सब मिलकर ता- ता -थैया___
उमड़ घुमड़ कर बादल आते
अपने आंचल को लहराते
घटाएं काली करती गड गड
पात धरा को छूते झड़ झड___

सुखे वृक्ष हँसे खिल- खिल कर
डाल- डाल नहाती मल कर
धरती झूम रही मस्ती में
खुशियों का मेला बस्ती में___

बचपन की टोली है घूमे
बारिश की बूंदों को चूमे
बचपन होता सबसे प्यारा
न्यारा न्यारा राज दुलारा---------

पवन सुनाती गीत सनन सन
नाचूँ गाऊँ कहता है मन
बूंद-बूंद से भरते ताल
पानी रक्षण बड़ा सवाल-------
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कभी गंगा कभी यमुना कभी हों कुम्भ की बातें
सनातन रंग हो गहरा प्यार की हों मुलाकातें
राम घट घट में है सबके यही बस आस्था अपनी
सुनहरी धूप हो जीवन , प्यार से हों भरी रातें।।
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शब्द जख्मी हैं मेरे सब, क्यूँ हुये मजबूर से
क्या लिखूँ कैसे लिखूँ ,हैं भाव भी मगरूर से-----

साजिशों से हैं घिरे चहुँ ओर देखो हर विषय
टूटती ही जा रही है प्यार के गीतों की लय
द्वार - देहरी पर उदासी , चुप है घर का आंगना
घर में रहते चार जन पर , रहते सब हैं दूर से

शब्द जख्मी हैं मेरे सब___
वक्त इतना है कठिन, अपने ही आकर लूटते
न्याय की तो क्या कहेंगे, बेवजह ही रूठते
रिश्ते सब व्यापार, सौदों से होता सामना
हैं कुटिल रातें यहाँ पर, दिन हैं मद मे चूर से

शब्द जख्मी हैं मेरे सब____
कालिमा लालच की, बढ़ती जा रही दीखे न कुछ
मूल्य और आदर्श के ,दीपक रहे हैं देखो बुझ
नींव हिलती जा रही, चाहे न कोई थामना
रो रहा पचपन यहाँ नव पीढ़ी के गुरूर से

शब्द जख्मी हैं मेरे सब____
फूल मुरझाने लगे हैं रोज कलियाँ टूटती
खुशियाँ अपने ही घरों से दूर होकर रूठती
अब सुनहरी ख्वाब चाहता नहीं है पालना
हो गये क्यूँ नापसंद से ख्वाब भी मंजूर से
शब्द जख्मी हैं मेरे सब___
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श्याम सखा तू छेड़ बांँसुरी,
भूलूं सुधबुध सारी मैं
प्यार तेरा है जीवन मेरा
ये जीवन तो हारी मैं
भूलूं -----------

श्याम सखा तू छेड़ बाँसुरी-----
मधुर तान ह्र्दय में बाजे,
सुर भी लहरे खावें हैं
रूप तेरा मुझमे ही साजे ,

सखियांँ गीत सुनावें हैं
हो गई श्याम सखा सी मैं भी
तुझ पर ही बलिहारी मैं
भूलूं __

श्याम सखा तू छेड़ बाँसुरी___
रूप बासुंरी का धर पाऊं
काश तेरे अधरों को सजाऊं
हरपल अपनी रीत निभाऊं
बादल बन तू झर झर बहना

तू ही मेरे मन का गहना
तेरा नाम हो कंठ हार सा
तुझ पर जाऊँ वारी मैं
भूलूं सुध बुध सारी मैं
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एक पुराना पेड़ हूँ, देता सबको छाँव।
नन्ही पौध है मिरी, मेरा पूरा गाँव।।
माँ है गहरी छाँव तो, पिता गुनगुनी धूप ।
बच्चों का मन जान ले, इनसे निखरे रूप।।

मात-पिता के मान से, बच्चों का सम्मान।
इनकी ममता प्यार से, हो इनकी पहचान।।
पिता है घर की नींव तो, माता बंदनवार।
इक दूजे के प्यार से, चलता है परिवार।।

मात- पिता का प्यार तो, किस्मत से मिल पाय।
रिश्ता ये अनमोल है,कभी टूट न पाय ।।
मात- पिता की छाप ही , बच्चों में दिख जाय।
जब बच्चे सीढ़ी चढें , मात- पिता मुस्काय।।

मात-पिता के रूप तो , ईश्वर के समकक्ष ।
आशिषों की छांव दे , बनकर ये वटवृक्ष ।।
मधुर सुगन्धित गंध है, ये रिश्तों की डोर ।
नाज़ुक रेशम की तरह इनसे सुंदर भोर ll
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सत्तावन में जब चली, मन्नू की तलवार
शोणित बहती धार ने ,किये वार पर वार।
                              
दुश्मन की छाती फटी, झेल न पाये वार
रानी लक्ष्मीबाई की, खूब चली तलवार
क़दम सदा आगे बढ़े, दिखलाई न पीठ
गौरे करते योजना, कैसे पायें पार।

दुल्हन जैसा रूप था ,शौर्य भरा श्रृंगार 
काँप, फिरंगी डोलते, होकर के लाचार
कुटिल नीति बेईमानियाँ , थी गौरों के संग
नन्हा बालक पीठ पर, किये बहुत प्रहार।

तेज! बरसाता ही रहा, देशप्रेम का ज्वार
जब तक घट में प्राण थे,मानी न थी हार
रग-रग देश भक्ति के अहसासों से पूर्ण
ब्रिटिश भी हैरान था, थी ऐसी ललकार।

आज़ादी का बिगुल बजा, खिलने लगी बयार
एक अकेली सिंहनी ,शक्ति का अवतार
दुश्मन पर फटकारती ,जैसे इक तूफ़ान
दुर्गा, अम्बा, कालिका, मन्नू इक हुंकार।

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