मुझको तन्हा - सा कर जाए....
० सुषमा भंडारी ०
दूर बहुत है मेरी मंज़िल.....
जब - जब मैने दीप बलाये है
उँगली के सब पोर जलाये
अंधियारा ज्यूँ का त्यूं बाकी
हुई फ़िज़ा फिर भी ना झिलमिल
दूर बहुत है मेरी मंज़िल......
तूफ़ाँ में भी रह तलाशी
हासिल लेकिन हुई उदासी
खुशियाँ सारी रौंद के मेरी
तन - मन पर हावी हो मुश्किल
दूर बहुत है मेरी मंज़िल.....
जाने ये कैसी है कश्ती
के जाती ख़्वाबों की बस्ती
जज़्बातों ने लूटा मुझको
जो भी मिला वही संगदिल
दूर बहुत है मेरी मंज़िल.....
जंजीरों से जुड़ न पाऊँ
पंख बिना मैं उड़ न पाऊँ
अपने सब अरमान जलाकर
आज बनी मैं क़ातिल
दूर बहुत है मेरी मंज़िल.....
लहू पाँव का अगर दिया है
रस्तों को पहचान लिया है
साजिश ने जो घेरा मुझको
संगे - मील थे उसमें शामिल
दूर बहुत है मेरी मंज़िल.....
ये नदिया ये बहता पानी
रोज सुनाते प्रेम - कहानी
जब भी याद तेरी आ जाए
एक तड़प मन में भर जाए
सुध बुध दुनिया की भूलूँ
ज़ुल्फ़ प्रेम की बस लहराये
लाज - शर्म से होती फिर मैं
खुद ही पानी - पानीये नदिया ------
जाने क्या - क्या ये समझाये
प्रेम नगर में ये भटकाए
इसमें कैसा जादू है ये
मुझको तन्हा - सा कर जाए
तुझको अपना दिल देकर क्या
रोज सुनाते प्रेम - कहानी
जब भी याद तेरी आ जाए
एक तड़प मन में भर जाए
सुध बुध दुनिया की भूलूँ
ज़ुल्फ़ प्रेम की बस लहराये
लाज - शर्म से होती फिर मैं
खुद ही पानी - पानीये नदिया ------
जाने क्या - क्या ये समझाये
प्रेम नगर में ये भटकाए
इसमें कैसा जादू है ये
मुझको तन्हा - सा कर जाए
तुझको अपना दिल देकर क्या
कर बैठी हूँ मैं नादानी
ये नदिया --------
क्या मुझको हर रोज़ छलेगा
या तू मुझसे आन मिलेगा
एक विरह की आग में आखिर
कब तक मेरा खून जलेगा
साफ़ बता दे आज कहानी
क्या है तूने दिल में ठानी
ये नदिया ये बहता पानी
रोज़ सुनाते प्रेम - कहानी
ये नदिया --------
क्या मुझको हर रोज़ छलेगा
या तू मुझसे आन मिलेगा
एक विरह की आग में आखिर
कब तक मेरा खून जलेगा
साफ़ बता दे आज कहानी
क्या है तूने दिल में ठानी
ये नदिया ये बहता पानी
रोज़ सुनाते प्रेम - कहानी
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किधर से बताओ ये डर आ रहे हैं...
उजाले पसीने से तर आ रहे हैं
सभी अक्स धुंधले नज़र आ रहे हैं
चेहरे सफेद लिए हैं सभी की
किधर से बताओ ये डर आ रहे हैं
गई है कहाँ खो छवि वो पुरानी
मुखौटों की दुनिया हुई है दीवानी
ज़रा दिल के दर्पण में सूरत निहारें
बहुत देर से हमको भरमा रहे हैं
आदम का बच्चा बिलखता है भूखा
ये उपवन तो खिलने से पहले ही सूखा
चहुँ ओर भूखे से बाज़ों की टोली
परिंदे परों को कुतर खा रहे हैं
व्याकुल हुई गाँव की माटियाँ अब
तपन दे रही सरहदी घाटियां सब
इंसाँ मशीनों में ऐसे ढले हैं
अजब खेल नित रोज़ दिखला रहे हैं
आँखों के अँधे हैं कानों के बहरे
कालिख पुते ख़्वाब लगते सुनहरे
ज़माने को मुट्ठी में करने का दावा
अपाहिज को पर्वत पे ले जा रहे हैं
सभी अक्स धुंधले नज़र आ रहे हैं
चेहरे सफेद लिए हैं सभी की
किधर से बताओ ये डर आ रहे हैं
गई है कहाँ खो छवि वो पुरानी
मुखौटों की दुनिया हुई है दीवानी
ज़रा दिल के दर्पण में सूरत निहारें
बहुत देर से हमको भरमा रहे हैं
आदम का बच्चा बिलखता है भूखा
ये उपवन तो खिलने से पहले ही सूखा
चहुँ ओर भूखे से बाज़ों की टोली
परिंदे परों को कुतर खा रहे हैं
व्याकुल हुई गाँव की माटियाँ अब
तपन दे रही सरहदी घाटियां सब
इंसाँ मशीनों में ऐसे ढले हैं
अजब खेल नित रोज़ दिखला रहे हैं
आँखों के अँधे हैं कानों के बहरे
कालिख पुते ख़्वाब लगते सुनहरे
ज़माने को मुट्ठी में करने का दावा
अपाहिज को पर्वत पे ले जा रहे हैं
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दूर बहुत है मेरी मंज़िल....
तपती रेत पे चल के आया
ख़ाक़ ग़मों की मलकर आया
पाँव के छाले बता रहे हैं
तपती रेत पे चल के आया
ख़ाक़ ग़मों की मलकर आया
पाँव के छाले बता रहे हैं
दूर बहुत है मेरी मंज़िल.....
जब - जब मैने दीप बलाये है
उँगली के सब पोर जलाये
अंधियारा ज्यूँ का त्यूं बाकी
हुई फ़िज़ा फिर भी ना झिलमिल
दूर बहुत है मेरी मंज़िल......
तूफ़ाँ में भी रह तलाशी
हासिल लेकिन हुई उदासी
खुशियाँ सारी रौंद के मेरी
तन - मन पर हावी हो मुश्किल
दूर बहुत है मेरी मंज़िल.....
जाने ये कैसी है कश्ती
के जाती ख़्वाबों की बस्ती
जज़्बातों ने लूटा मुझको
जो भी मिला वही संगदिल
दूर बहुत है मेरी मंज़िल.....
जंजीरों से जुड़ न पाऊँ
पंख बिना मैं उड़ न पाऊँ
अपने सब अरमान जलाकर
आज बनी मैं क़ातिल
दूर बहुत है मेरी मंज़िल.....
लहू पाँव का अगर दिया है
रस्तों को पहचान लिया है
साजिश ने जो घेरा मुझको
संगे - मील थे उसमें शामिल
दूर बहुत है मेरी मंज़िल.....
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हम को लोग कहें दीवाना
भूले जब से हम मुस्काना
चाँद तो आखिर ठहरा चाँद
चाँद को भी क्या चमकाना
महफ़िल में रौनक ही रौनक
अपना दिल ही था बेगाना
बाँटी हमने सदा बहारें
फिर भी दीखे क्यूँ वीराना
सन्नाटों की गूँज बहुत है
चुप्पी को भी क्या उकसाना
शमा की खातिर मिटे पतंगा
सीखा नहीं है शोर मचाना
हम को लोग कहें दीवाना
भूले जब से हम मुस्काना
चाँद तो आखिर ठहरा चाँद
चाँद को भी क्या चमकाना
महफ़िल में रौनक ही रौनक
अपना दिल ही था बेगाना
बाँटी हमने सदा बहारें
फिर भी दीखे क्यूँ वीराना
सन्नाटों की गूँज बहुत है
चुप्पी को भी क्या उकसाना
शमा की खातिर मिटे पतंगा
सीखा नहीं है शोर मचाना
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मोबाइल ने बदली दुनिया
बदल गया इंसान
खेल कूद सब पीछे छूटे
ये ही अब भगवान
बचा लो बचपन यारो
कहे ये पचपन यारो
गूगल ही माता पिता है
इसकी बातें सच्ची
मात पिता कुछ समझाएं तो
बातें लगती कच्ची
बचा लो बचपन यारो
कहे ये पचपन यारो
रिश्ते नाते और भावना
फीके फीके लगते
नन्ही गुड़िया चुन्नू मुन्नू
सबको चैनल ठगते
बचा लो बचपन यारो
कहे ये पचपन यारो
खेल खेल में हमने सीखी
थी जीवन की बातें
आज ये बचपन सीख रहा
नित नई आघातें
बचा लो बचपन यारो
कहे ये पचपन यारो
गलत नहीं है ये तकनीक
लेकिन हो उपयोग ठीक
भूल गए सब कागज़ पैन
कैसे आये बोलो चैन
बचा लो बचपन यारो
कहे ये पचपन यारो
बदल गया इंसान
खेल कूद सब पीछे छूटे
ये ही अब भगवान
बचा लो बचपन यारो
कहे ये पचपन यारो
गूगल ही माता पिता है
इसकी बातें सच्ची
मात पिता कुछ समझाएं तो
बातें लगती कच्ची
बचा लो बचपन यारो
कहे ये पचपन यारो
रिश्ते नाते और भावना
फीके फीके लगते
नन्ही गुड़िया चुन्नू मुन्नू
सबको चैनल ठगते
बचा लो बचपन यारो
कहे ये पचपन यारो
खेल खेल में हमने सीखी
थी जीवन की बातें
आज ये बचपन सीख रहा
नित नई आघातें
बचा लो बचपन यारो
कहे ये पचपन यारो
गलत नहीं है ये तकनीक
लेकिन हो उपयोग ठीक
भूल गए सब कागज़ पैन
कैसे आये बोलो चैन
बचा लो बचपन यारो
कहे ये पचपन यारो


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